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मिल्खा सिंह को टक्कर देने वाले इस पाकिस्तानी धावक को भारत ने बना लिया था युद्धबंदी

अब्दुल खालिक़ (पहली फोटो एथलीट की ड्रेस में दूसरी आर्मी की ड्रेस में)

अब्दुल खालिक़ (पहली फोटो एथलीट की ड्रेस में दूसरी आर्मी की ड्रेस में)

इस खिलाड़ी के साथ दौड़ने के लिए मिल्खा सिंह को पाकिस्तान आमंत्रित किया गया था और मिल्खा सिंह ने पाकिस्तान जाकर इस खिलाड़ी को हराया था.

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    पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के चकवाल जिले से 40 किमी उत्तर-पूर्व में जंद अवां गांव है. हालांकि इस गांव से बाहर ज्यादा लोग नहीं जानते कि कभी 'एशिया का सबसे तेज इंसान' माने जाने वाले अब्दुल खालिक़ इसी गांव से आते थे. अब्दुल खालिक़ की एक बार फ्लाइंग सिख मिल्खा सिंह के साथ भी पाकिस्तान में रेस हुई थी, जिसमें मिल्खा सिंह ने बाजी मारी थी. यह बात आज भी लोगों को याद है लेकिन लोग यह भूल चुके हैं कि कभी यही अब्दुल खालिक़ भारत के युद्धबंदी भी रहे थे. बहरहाल वह किस्सा जानने से पहले पढ़ें कैसे एक साधारण कबड्डी प्लेयर से खालिक़ एशिया के सबसे तेज इंसान बने-

    धावक बनने से पहले कबड्डी खिलाड़ी थे खालिक़
    खालिक़ 23 मार्च, 1933 को पाकिस्तान में पैदा हुए थे और बड़े होने पर पाकिस्तान में कबड्डी के एक प्रसिद्ध खिलाड़ी बने थे. एक कबड्डी मैच के दौरान पाकिस्तान आर्मी स्पोर्ट्स कंट्रोल बोर्ड के तत्कालीन प्रमुख ब्रिगेडियर सीएचबी रॉड्हम की नज़र उन पर पड़ी. रॉड्हम ने उन्हें आर्मी की ब्वॉयज कंपनी के लिए सेलेक्ट कर लिया. उनका काम पाकिस्तान के लिए बेहतरीन खिलाड़ी तैयार करना था और खालिक़ ने रॉड्हम के फैसले को सही साबित किया.

    मिल्खा सिंह पाकिस्तान जाने से कतरा रहे थे
    मिल्खा सिंह ने खुद एक इंटरव्यू में बताया था कि कैसे वे अब्दुल खालिक़ के खिलाफ एक दोस्ताना दौड़ में शामिल होने के लिए पाकिस्तान नहीं जाना चाहते थे. इसके पीछे पाकिस्तान से जुड़ी उनकी यादें थीं. लेकिन जब भारत के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने खुद उनसे इसके लिए आग्रह किया तो वे पाकिस्तान जाने को तैयार हो गए.

    मिल्खा सिंह बताते हैं कि यहां ऐसा वाकया हुआ, जिससे उनकी आंखों में आंसू आ गए. हालांकि वे खुशी के आंसू थे. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि 1960 में उन्होंने पाकिस्तान में दौड़ में अब्दुल खालिक़ को हरा दिया. मिल्खा सिंह ने बताया था कि इस दौड़ के पीछे एक रोचक कहानी थी. जब पाकिस्तान की ओर से इसके लिए न्यौता आया. मैंने तुरंत ही जाने से मना कर दिया. लेकिन बाद में जब मुझे जवाहरलाल नेहरू ने विभाजन की यादों को भुलाने के लिए कहा तो मैं राजी हो गया. उस वक्त मिल्खा सिंह को 1958 के कॉमनवेल्थ खेलों में अपने प्रदर्शन के लिए पद्मश्री पुरस्कार मिल चुका था.

    मिल्खा को अयूब खान से तो खालिक़ को जवाहरलाल नेहरू से मिला था नाम
    पाकिस्तानी अख़बारों में लिखने वाले जावेद चौधरी लिखते हैं मिल्खा सिंह उस रेस में दौड़े नहीं थे बल्कि उड़े थे. मिल्खा सिंह के अब्दुल खालिक़ को हरा देने से पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति फील्ड मार्शल अयूब खान बहुत प्रभावित हुए और उन्होंने मिल्खा सिंह को फ्लाइंग सिख कहा. मिल्खा सिंह को मिला यह टाइटल बहुत फेमस हुआ.

    1954 में मनीला एशियन गेम्स में अब्दुल खालिक़ ने मात्र 10.6 सेकेंड में अपनी दौड़ पूरी कर ली थी. जिसके बाद वहां मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित पहले भारतीय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने 'द फ्लाइंग बर्ड ऑफ एशिया' कहा था.

    हालांकि पाकिस्तानी अख़बार डॉन का कहना था कि मिल्खा सिंह 200 मीटर की दौड़ के खिलाड़ी थे, जबकि खालिक़ 100 मीटर की दौड़ के. और पाकिस्तान में हुआ मुकाबला 200 मीटर का था जिससे मिल्खा सिंह को इसका फायदा मिला.

    अपने ही रिकॉर्ड बनाकर तोड़ते थे खालिक़
    अब्दुल खालिक़ की मौत 10 मार्च, 1988 को रावलपिंडी में हुई. वे अकेले एथलीट थे, जो मेलबर्न ओलंपिक (1956) और रोम ओलंपिक (1960) में पाकिस्तान के लिए पदक लेकर आए.

    खालिक़ ने राष्ट्रीय खेलों में 100 स्वर्ण पदक जीते थे. इसके अलावा उन्होंने अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भी 26 स्वर्ण पदक (गोल्ड) और 23 रजत पदक (सिल्वर) जीते थे.

    इसके अलावा मनीला में हुए एशियन गेम्स 1954, टोक्यो में हुए एशियन गेम्स 1958 या दिल्ली में हुई फर्स्ट इंडो-पाक मीट 1956 सभी में अब्दुल खालिक़ ने न सिर्फ गोल्ड जीता बल्कि इन सभी रेस में नए रिकॉर्ड भी बनाए.

    अब्दुल खालिक़ को हराते मिल्खा सिंह


    जब खालिक़ बने युद्धबंदी और उन्हें छोड़ने की बात चली
    हालांकि जब 1971 में जब बांग्लादेश मुक्ति संग्राम के योद्धा पाकिस्तान के खिलाफ विद्रोह का बिगुल फूंक रखा था और इंदिरा गांधी के नेतृत्व में भारत ने हस्तक्षेप कर पाकिस्तान के 93,000 सैनिकों से आत्मसमर्पण कराया था. उस दौरान खालिक़ भी वहीं थे. उन्होंने भी आत्मसमर्पण किया, लेकिन जितने वक्त वे भारतीय सैनिकों के संरक्षण में रहे, सैनिकों ने उन्हें पूरी इज्जत दी.

    पाकिस्तान के अख़बार डॉन से बातचीत में एक बार खालिक़ के भाई अब्दुल मलिक ने बताया था कि तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने खालिक़ को रिहा करने का मन बना लिया था, लेकिन खालिक़ ने इसके लिए मना कर दिया और कहा कि वे अपने देशवासियों के साथ ही छोड़ जाना पसंद करेंगे.

    उनके भाई ने डॉन अख़बार से ही कहा था कि पाकिस्तान सरकार ने उनके भाई के लिए कुछ नहीं किया और वे मिल्खा सिंह की एक महान व्यक्ति के तौर पर बहुत इज्जत करते हैं, लेकिन उन्हें मिल्खा सिंह पर बनी फरहान अख्त़र की फिल्म देखते हुए दर्द महसूस हुआ था. उन्होंने यह भी कहा था कि मिल्खा सिंह पर फिल्म बनाकर भारत ने उन्हें अमर कर दिया, लेकिन क्या खालिक़ (की सफलता) व्यर्थ चले जाएंगे.

    यह भी पढ़ें: मसूद अज़हर के बाद ये आतंकी बन सकता है जैश सरगना!

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