Coronavirus टेस्ट किट का बंगाल के एक लोकप्रिय जासूस से क्या है संबंध?

कोरोना संक्रमण के बढ़ते आंकड़ों के बीच टाटा ग्रुप ने एक नई टेस्ट किट बनाई है- सांकेतिक फोटो (Photo-pixabay)
कोरोना संक्रमण के बढ़ते आंकड़ों के बीच टाटा ग्रुप ने एक नई टेस्ट किट बनाई है- सांकेतिक फोटो (Photo-pixabay)

टाटा ने कोरोना की जांच के लिए एक टेस्ट किट (coronavirus test kit by TATA) बनाई है, जिसे फेलुदा (Feluda) नाम दिया गया. ये नाम बंगाली पाठकों के लिए जाना-पहचाना है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: September 21, 2020, 3:21 PM IST
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कोरोना संक्रमण के बढ़ते आंकड़ों के बीच टाटा ग्रुप ने एक नई टेस्ट किट बनाई है. इस किट को ड्रग कंट्रोलर जनरल ऑफ इंडिया (DCGI) से मंजूरी भी मिल चुकी है. बिल्कुल प्रेगनेंसी किट की तर्ज पर काम करने वाली ये किट 2 घंटे में नतीजे दे सकती है. साथ ही ये काफी किफायती भी होगी और इसके नतीजे लगभग 96 प्रतिशत सही होंगे. इस जांच किट को फेलुदा (Feluda) नाम दिया गया है. फेलुदा कोई ग्रीक या जापानी शब्द नहीं, बल्कि महान फिल्मकार सत्यजीत रे (Satyajit Ray) की कहानियों और फिल्मों का कैरेक्टर है. जानिए, कोरोना जांच का सत्यजीत रे की फिल्म से क्या मतलब है.

भरोसेमंद होने के कारण दिया ये नाम
भारतीय सिनेमा को पाथेर पांचाली, अपराजितो, चारुलता और द वर्ल्ड ऑफ जैसी शानदार फिल्में देने वाले फिल्मकार सत्यजीत रे का ये चरित्र फेलुदा असल में एक जासूसी कैरेक्टर है. फेलुदा का खासियत ये थी कि वो बिजली की तेजी से सोचता और एक्शन लेता था. मुश्किल से मुश्किल मामलों को वो आसानी से पता लगा लेता था. यही वजह है कि इस कोरोना की इस किट को भी ये नाम दिया गया.

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टाटा का दावा है कि किफायती होने के बाद भी ये किट काफी भरोसेमंद होगी और ज्यादातर मामलों में सही रिजल्ट देगी कि संदिग्ध कोरोना पॉजिटिव है या नहीं. यानी कुल मिलाकर भरोसेमंद और सटीक रिजल्ट देने को पक्का करने के लिए इस कोरोना जांच किट का नाम ही फेलुदा रख दिया गया.



फिल्मकार सत्यजीत रे ने जासूसी चरित्र फेलुदा की रचना की


क्या है किट की खासियत
टाटा सीआरआईएसपीआर (Tata CRISPR) की बनाई गई इस किट में जांच के लिए खास तकनीक का इस्तेमाल किया गया है. ये स्वदेशी तकनीक है जो लगभग दो घंटों के भीतर ही केस के पॉजिटिव या निगेटिव होने का पता लगा लेती है. माना जा रहा है कि ये कोरोना टेस्‍ट सबसे ज्‍यादा विश्‍वसनीय माने जाने वाले RT-PCR टेस्‍ट के बराबर ही सटीक नतीजे देगा, वो भी कम समय में. प्रेगनेंसी टेस्ट की तर्ज पर कागज की पट्टी पॉजिटिव होने पर रंग बदलती है. लगभग 500 रुपए में किट मिल सकेगी, जिससे काफी सारे लोगों का कोरोना टेस्ट हो सकेगा. इसके मायने होंगे कि जल्दी से जल्दी उन्हें इलाज मिलेगा और इस तरह से मामले घटेंगे.

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कौन था ये बंगाली जासूसी चरित्र
फेलुदा या प्रदोश चंद्र मित्‍तर मशहूर फिल्‍म‍ निर्देशक और लेखक सत्‍यजीत रे के काल्‍पनिक पात्र का नाम था. महज 27 साल का ये जासूस बड़ी से बड़ी गुत्थी चुटकियों में सुलझा देता था. फेलुदा का एक असिस्टेंट भी था, जिसकी उम्र थी साढ़े तेरह साल. तपेशरंजन बोस नाम का ये असिस्टेंट काफी भोला-भाला लगता था और जासूसी घटना का खोज के दौरान अपने बॉस से सीखने की बात करता. ये बच्चा वैसे फेलुदा का कजिन था, जो अक्सर कहानियां सुनाने वाले की भूमिका में रहता.

फेलुदा अपने भाई और असिस्टेंट तपेशरंजन के साथ


पाठक पता पूछते आने लगे
रे का यह जासूसी करेक्‍टर सबसे पहले साल 1965 में एक बांग्ला मैग्जीन संदेश में दिखा. इस कहानी का नाम था फेलुदार गुंडागिरी, जिसे सत्यजीत रे और सुभाष मुखोपाध्याय ने मिलकर लिखा था. फेलुदा को वास्तविक दिखाने के लिए रे ने उसके रहने की जगह से लेकर कई चीजें वास्तविक जैसी ही दिखाई थीं. जैसे फेलुदा 21 रजनी सेन रोड पर रहता था. ये वाकई में एक जगह थी. फेलुदा के लोकप्रिय होने के बाद बहुत से रीडर इस जगह फेलुदा के बारे में पूछते आने लगे. हालांकि सच्चाई तो यही थी कि ये रे के दिमाग की उपज था.

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पूरा बैकग्राउंड असली लगता था
बंगाली भाषी पाठकों से जोड़ने के लिए सत्यजीत रे ने फेलुदा के जीवन को भी उसी तरह से डिजाइन किया था. जैसे फेलुदा के पेरेंट्स की एक दुर्घटना में मौत हो गई, तब उसकी उम्र केवल 9 साल थी. उसे चाचा ने पाला-पोसा. पढ़ाई के बाद फेलुदा एक बैंक में क्लर्क की नौकरी करने लगा. इसके साथ ही उसने जासूसी का काम शुरू किया. रे के एक सच्चे लगने वाले पात्र को पान चबाने और चारमीनार सिगरेट पीने की लत थी. हालांकि वो योग और पढ़ने-लिखने का भी शौकीन था. कुल मिलाकर सारा ताना-बाना इस तरह से रचा गया कि भावुक बंगाली समाज इससे जुड़ जाए. और हुआ भी ऐसा ही.

बाद में फेलुदा को लेकर कई फिल्में भी बनीं. खुद सत्यजीत रे ने इसपर सोनार केला और जय बाबा फेलुनाथ नाम से फिल्में बनाई थीं.
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