मांस की जगह खा सकेंगे जहरीली हवा, 1 किलो की कीमत लगभग 400 रुपए

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फिनलैंड में कार्बन डाइऑक्साइड से प्रोटीन तैयार करने की कोशिश हो रही है

भुखमरी (hunger) की समस्या को देखते हुए दुनियाभर के देश इसे दूर करने की कोशिश कर रहे हैं. इसी सिलसिले में फिनलैंड (Finland) को बड़ी कामयाबी मिली है, जहां कार्बन डाइऑक्साइड (carbon dioxide) से प्रोटीन (protein) तैयार करने की कोशिश हो रही है.

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लगभग साढ़े 7 अरब की वैश्विक आबादी (global population) में 11.3 करोड़ से ज्यादा ऐसे लोग हैं जो खाने की तंगी से जूझ रहे हैं. इनमें 70 करोड़ बच्चों में एक तिहाई या तो कुपोषित (malnutrition) हैं या मोटापे (obesity) से जूझ रहे हैं. ये बच्चे 5 साल या कम उम्र के हैं. ऐसे में लगातार बढ़ती आबादी को खाना मयस्सर कराना सबसे बड़ी चिंता है. इसी चिंता का हल निकालने की कोशिश कर रहे हैं फिनलैंड (Finland) के वैज्ञानिक. हालांकि कोरोना (corona) के कारण फिलहाल काम पर विराम लगा है.

क्या है तैयारी
उत्तरी यूरोप के इस देश में सोलर फूड्स (Solar Foods) नाम की कंपनी हवा से खाना बनाने की कोशिश कर रही है. इस खाने को तैयार करने में हवा की नुकसानदेह मानी जाने वाली गैस कार्बन डाइऑक्साइड (carbon dioxide) इस्तेमाल होगी , साथ में पानी और सोलर बिजली का उपयोग होगा. हवा, पानी और बिजली के इस मेल से सोलेन (solein) नाम का प्रोटीन पाउडर बनने जा रहा है. वैज्ञानिकों का कहना है कि यह पौधों से मिलने वाले प्रोटीन से 10 गुना ज्यादा फायदेमंद और पशुओं से प्राप्त प्रोटीन से लगभग 70 गुना ज्यादा बेहतर होगा. खासकर पर्यावरण के लिहाज से देखें तो ये एनिमल प्रोटीन का काफी अच्छा विकल्प हो सकता है.

ये पौधों से मिलने वाले प्रोटीन से 10 गुना ज्यादा फायदेमंद और पशुओं से प्राप्त प्रोटीन से लगभग 70 गुना ज्यादा बेहतर होगा




ऐसे बनेगा प्रोटीन


बनाने के लिए हवा से कार्बन डाइऑक्साइड लिया जाएगा. इसके लिए कार्बन कैप्चर टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाएगा. इसके बाद इसमें पानी, विटामिन्स और न्यूट्रीएन्ट्स मिलाए जाएंगे. इसके बाद सोलर एनर्जी के इस्तेमाल से सोलेन बनाया जाएगा. इसे बनाने की प्रक्रिया नेचुरल फरमेंटेशन की तरह होगी, जिस तरह से यीस्ट और लैक्टिक एसिड बैक्टीरिया बनाया जाता है. ये खाना यानी प्रोटीन एक फरमेंटेशन टैंक के भीतर तैयार होगा. मजे की बात ये है कि सोलेन भी दूसरे प्रोटीन्स की तरह ही स्वादरहित और गंधरहित होगा.

क्या है खासियत
हवा से बनने वाला सोलेन प्रोटीन पाउडर दिखने में आटे जैसा होगा. हाई प्रोटीन वाले इस फूड में 50 फीसदी प्रोटीन, 5 से 10 फीसदी फैट और 20 से 25 फीसदी कार्ब कंटेट्स होंगे. कंपनी का दावा है कि ये दिखने में भी आटे जैसा होगा और इसका टेस्ट भी आटे जैसा होगा. फिनलैंड की कंपनी हवा से बनाए जाने वाले इस फूड के लिए मार्केट तलाश रही है. इससे कई तरह का खाना बनाया जा सकता है. सबसे अच्छी बात ये है कि चूंकि इसे सीधे हवा से बनाया जा रहा है तो इसका कार्बन फुटप्रिंट छोटा होगा. इससे पर्यावरण को कम से कम नुकसान किए बगैर पूरी आबादी का पेट भरा जा सकेगा.

इसके लिए कार्बन कैप्चर टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया जाएगा


नासा की देन
कहा जा रहा है कि सोलेन नासा (NASA) का आइडिया है, लेकिन इस पर अब फिनलैंड की कंपनी Solar Foods काम कर रही है. इसके लिए कंपनी यूरोपियन स्पेस एजेंसी के साथ मिलकर काम कर रही है. ये अंतरिक्ष यात्रियों के लिए बड़े काम की साबित हो सकती है. इससे उस क्षेत्र में खाना मिलना आसान हो जाएगा, जहां पर खेती की संभावना नामुमकिन है.

कॉर्बन न्यूट्रल प्रक्रिया
इसे साइंस के क्षेत्र में बड़ी उपलब्धि के तौर पर देखा जा सकता है. कंपनी का कहना है कि पहले पहल मार्केट में इसे प्रोटीन शेक और योगर्ट के तौर पर उतारा जाएगा. हवा से मिलने वाले फूड सोलेन बनाने का प्रोसेस कॉर्बन न्यूट्रल होगा. कंपनी का कहना है कि दुनिया में पहले से ही ग्रीन हाउस गैसेज़ की वजह से समस्याएं पैदा हो रही हैं. क्यों न इसके इस्तेमाल की बात सोची जाए. सोलेन बनाने की प्रक्रिया इसी दिशा में एक कदम है.

कब तक आएगा मार्केट में
Solar Foods नाम की फीनिश कंपनी इस दिशा में लगी हुई है. कंपनी के सीईओ सीईओ पासी वैनिक्का के अनुसार हवा से खाना तैयार करने का कमर्शियल लाइसेंस 2021 तक पाने की कोशिश है. इससे पहले यूरोपियन यूनियन से फूड लाइसेंस भी लिया जाएगा. इसके बाद जल्द ही पूरी दुनिया में इसके जरिए खाने की आपूर्ति पूरी करने की कोशिश की जाएगी. The Guardian में छपी एक खबर के मुताबिक इसके प्रतिकिलो की कीमत €5 (लगभग 390 रुपए) होगी.

फिलहाल कोरोना की वजह से प्रयोग रुका हुआ है लेकिन उम्मीद की जा रही है कि 2021 में ये सामने आएगा


कार्बन डाइऑक्साइड का इस्तेमाल
ग्लोबल वार्मिंग में कार्बन डाइऑक्साइड की भूमिका को देखते हुए कोशिश की जा रही है कि इसका ज्यादा से ज्यादा उपयोग किया जा सके ताकि ये पर्यावरण को कम नुकसान करे. अभी ही ये गैस ईंधन बनाने, खाद तैयार करने जैसे कामों में इस्तेमाल हो रही है. बैंगलोर में रिसर्च टीम एक ऐसा आर्टिफिशियल फोटोसिंथेसिस प्रोसेस तैयार कर रही है, जिससे इस गैस को मेथेनॉल में बदला जा सकता है. मेथेनॉल से दवाइयां, इत्र और ईंधन बन सकता है.

चीन के Suzhou शहर में कार्बन डाइऑक्साइड से बायो कंपोजिट बनाने पर प्रयोग हो रहे हैं. वहीं टेक्सास की William Marsh Rice University के वैज्ञानिक इस खोज में लगे हुए हैं कि कार्बन डाइऑक्साइड का दोबारा इस्तेमाल हो सके ताकि पर्यावरण को कम से कम नुकसान हो. इसके तहत कैटेलिक रिएक्टर की मदद से कार्बनडाइऑक्साइड (carbon dioxide) के यूज के बाद वह उसे शुद्ध और गाढ़े फॉर्मिक एसिड में बदल देगा. इसी एसिड से बिजली बनाई जाएगी.

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