देश की पहली महिला कैबिनेट मंत्री, जिसने लड़ी थी महामारी के खिलाफ जंग

एम्स की स्थापना के पीछे प्रमुख रहीं राजकुमारी अमृत कौर.

एम्स की स्थापना के पीछे प्रमुख रहीं राजकुमारी अमृत कौर.

Rajkumari Amrit kaur Birth Anniversary : नेहरू (Jawaharlal Nehru) नहीं चाहते थे कि कौर को पहली महिला स्वास्थ्य मंत्री के रूप में जगह मिले, लेकिन गांधीजी (Mahatma Gandhi) की मर्ज़ी के आगे उनका मत टिका नहीं. जानिए AIIMS की संस्थापक कौर को कैसे याद किया जाए.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 2, 2021, 6:52 PM IST
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राजकुमारी अमृत कौर का नाम कई यादों और कीर्तिमानों के साथ जुड़ा है, जैसे किसी को वो महात्मा गांधी की सेक्रेट्री के तौर पर याद होंगी तो किसी को पंजाब के कपूरथला के राजघराने (Indian Royal Families) की प्रिंसेस के तौर पर. किसी को वो देश की पहली स्वास्थ्य मंत्री के तौर पर याद आ सकती हैं तो किसी को वर्तमान समय की बेहतरीन संस्थाओं की निर्माता (Founder of Institutions) के रूप में. भारत में स्वास्थ्य के क्षेत्र में कई सुधारों के साथ कौर का नाम जुड़ा रहा और एम्स की स्थापना (AIIMS Establishment) के लिए तो उन्हें हमेशा याद किया ही जाएगा, खास तौर से जब भारत महामारी (Corona Virus) के खिलाफ जंग लड़ रहा है.

महिलाओं के अधिकारों के लिए पुरज़ोर वकालत करने वाली राजकुमारी बीबीजी अमृत कौर अहलूवालिया भारत का संविधान बनाने वाली सभा में सदस्य भी थीं. कुल मिलाकर, एक आंदोलनकारी और राजनेता की छवि रखने वाली कौर के जीवन के बारे में संक्षेप में चर्चा करते हुए आपको वो कहानी बताते हैं कि कैसे कौर ने एम्स बनवाया था.

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अमृत कौर को क्यों याद किया जाए?
भारत जब आज़ाद हुआ तो पहली महिला कैबिनेट मंत्री बनाई गईं कौर हेल्थ मिनिस्टर के पद पर 10 सालों तक रहीं. इससे पहले उन्हें महात्मा गांधी की सचिव के बतौर काम करने का अनुभव था. स्वास्थ्य मंत्री पद पर रहते हुए कौर ने बाल कल्याण की भारतीय परिषद की स्थापना करवाई, एम्स की बुनियाद रखी और फिर दिल्ली में लेडी इरविन कॉलेज बनवाने का बीड़ा भी उठाया.

कपूरथला के राज परिवार में जन्मीं कौर की पढ़ाई ऑक्सफोर्ड में हुई थी और वो 1918 में भारत लौटी थीं यानी गांधीजी के भारत लौटने के 3 साल बाद. भारत लौटते ही वो गांधी की अनुयायी हो गई थीं. अस्ल में, गांधी के नेतृत्व वाले स्वाधीनता आंदोलन में महिलाओं को लामबंद करने के लिए कौर की भूमिका अहम रही.

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राजकुमारी अमृत कौर की एक यादगार तस्वीर.


स्वाधीनता आंदोलन के साथ ही कौर ने 1930 के दशक से ही बाल विवाह, देवदासी प्रथा और समानता जैसे मुद्दों पर महिलाओं के अधिकारों की पुरज़ोर वकालत शुरू की थी. अरुणा आसफ अली ने उन्हें 'पायनियर' कहा था. महिलाओं के लिए आरक्षण के खिलाफ रहीं कौर ईसाई के तौर पर जीवन जीती रहीं लेकिन सिख परंपरा के अनुसार उनका अंतिम संस्कार 1964 में किया गया.

एम्स बनवाने वाली स्वास्थ्य मंत्री
पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू की कैबिनेट में कौर पहली पसंद नहीं थीं. नेहरू के जीवनी लेखक शंकर घोष के मुताबिक हंसा मेहता के पक्ष में थे लेकिन गांधीजी के आग्रह के चलते कौर को स्वास्थ्य मंत्री का पद मिला था. मंत्री बनने के बाद जब एम्स की स्थापना का मुद्दा आया, तो बात फंड पर अटक गई. तब, कौर ने न्यूज़ीलैंड सरकार से बड़ी रकम इस प्रोजेक्ट के लिए जुटाई.

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यही नहीं, रॉकेफेलर फाउंडेशन और फोर्ड फाउंडेशन जैसी अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं के साथ ही ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और नीदरलैंड्स सरकारों से भी कौर वित्तीय मदद लेकर आईं और एम्स की स्थापना के लिए हर मुश्किल को आसान किया. कौर का बड़ा योगदान यह भी था कि उन्होंने एम्स को अंतर्राष्ट्रीय स्तर का संस्थान बनाने और उसे ऑटोनॉमस दर्जे व अनोखी परंपराओं के लिए संरक्षित करने पर भी ज़ोर दिया.

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1956 में एम्स में एडमिशन के लिए प्रवेश परीक्षा के पीछे भी कौर की ही सोच थी. कौर की तमाम मेहनत और लगन तब रंग लाई जब 1961 में एम्स को अमेरिका, कनाडा और यूरोप के संस्थानों के साथ दुनिया के बेहतरीन इंस्टीट्यूट के रूप में पहचान मिली. एम्स के लिए कौर ने अपना शिमला का घर भी दान कर दिया था.

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गांधीजी के साथ नेहरू की ऐतिहासिक तस्वीर.


सिर्फ एम्स ही नहीं और भी कई संस्थानों की नींव डालने वाली कौर को भारतीय कुष्ठ रोग एसोसिएशन, चाइल्ड वेलफेयर काउंसिल, इंटरनेशनल रेडक्रॉस सोसायटी के पदाधिकारी और इन संस्थाओं की भारत में शुरूआत के लिए भी याद किया जाता है. विश्व स्वास्थ्य संगठन में कौर ने भारतीय दल की अगुवाई लगातार चार साल की थी और 1950 में वो WHO असेंबली की प्रेसिडेंट रही थीं.

महामारी के खिलाफ जंग और कीर्तिमान
वास्तव में, एम्स की स्थापना अपने आप में देश को कई बीमारियों से निजात दिलाने वाला ही कदम था. स्वास्थ्य सेक्टर में कई तरह के सुधारों के लिए अग्रणी रहीं कौर ने हेल्थ मिनिस्टर रहते हुए 1955 में मलेरिया के खिलाफ बड़ा अभियान चलाया था. न्यूयॉर्क टाइम्स ने लिखा था कि इस ​अभियान से 4 लाख लोगों की जानें बचाई गईं, जो अभियान न होने पर मलेरिया से मर सकते थे.

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दुनिया की प्रतिष्ठित पत्रिका टाइम ने कौर को 1947 की वूमन ऑफ दि इयर चुना था. गुज़रे साल की ही बात है जब टाइम मैगज़ीन ने कौर को 20वीं सदी की 100 सबसे प्रभावशाली महिलाओं की लिस्ट में शुमार किया था. कौर को ऐशो आराम की ज़िंदगी छोड़कर भारत के आम आदमी के पक्ष में लड़ने की प्रेरणा देने के लिए याद किया जाता रहेगा.
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