जानिए भारत के पहले स्वतंत्रा संग्राम में क्या महत्व है 10 मई का

10 मई 1857 को सिपाहियों के विद्रोह को 1857 की क्रांति (1857 Revolution) की शुरुआत माना जाता है. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

10 मई 1857 को सिपाहियों के विद्रोह को 1857 की क्रांति (1857 Revolution) की शुरुआत माना जाता है. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

10 मई 1857 की तारीख भारतीय इतिहास (Indian History) में ऐसे आंदोलन (1857 Revolution) की शुरुआत की गवाह बनी जिसने भारत (India) ही नहीं बल्कि अंग्रेजों तक को बदल कर रख दिया.

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भारत के इतिहास (Indian History) में 1857 की क्रांति (Revolution) का बहुत महत्व है. इस क्रांति ने देश में दूरगामी बदलावों की नींव रखी थी. यूं तो इसे एक बिखरा हुआ आंदोलन कहा जा सकता है, लेकिन जिन हालात ने इसे पैदा किया उसके नतीजों ने भारत (India) पर गहरा प्रभाव डाला. अंग्रेजों ने हमेशा ही इसे क्रांतिकारी आंदोलन के तौर पर खारिज किया. ये क्रांति अचानक ही नहीं हुई ये धीरे-धीरे तपी और फैली. इस दौरान 10 मई 1857 का दिन इस क्रांति के लिए एक बड़ा दिन साबित हुआ.

10 मई को दिखी इसकी शुरुआत

1857 में 10 मई को ही मेरठ की छावनी में 85 जवानों ने मिल कर अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन शुरू किया था और इसे क्रांति का पहला कदम और आदाजी के लिए फूटी पहली चिंगारी माना जाता है. इतिहासकारों का मानना है कि यह कोई छोटी मोटी बगावत नहीं थी. इसकी तैयारी बहुत पहले से चल रही थी. इस आंदोलन का रूप लेने जा रही इस क्रांति की तैयारी में नाना साहेब, अजीमुल्ला, झांसी की रानी, तात्यां टोपे, जैसे बहुत से बड़े नाम जुड़े थे.

एक आग की तरह फैली
10 मई को मेरठ में फूटी इस चिंगारी ने जल्दी ही दूसरे इलाकों को अपनी चपेट में लेना शुरू कर दिया, हैरानी की बात थी कि इसमें केवल अंग्रेजों की फौज में काम कर रहे हिंदुस्तानी सिपाही नहीं थे, बल्कि उनकी अलग अलग जगहों पर हुई बगावतों को देश के मजदूरों, किसानों और आदिवासियों का भी समर्थन मिला और धीरे-धीरे इसकी जड़ें देश के बाकी हिस्सों में भी फैलती चली गईं.

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बताया जाता है कि 85 हिंदुस्तानी सैनिकों ने विद्रोह कर 50 अंग्रेजों (Britishers) को मार गिराया था. (फाइल फोटो)

सिपाहियों को मिला सभी का समर्थन



सभी इतिहासकार यहां तक कि अंग्रेज भी 10 मई को हुई मेरठ में सैन्य बगावत को 1857 की क्रांति की शुरुआत मानते हैं. मेरठ की चिंगारी मेरठ में ही आग बन गई और आसपास के गांवों में फौरन फैल गई. यह भी माना जाता है कि क्रांति का अंग्रेज फौज में सिपाहियों की बगावत तो संकेत भर था. अंग्रेजों के खिलाफ गुस्सा तो सभी में ही था. जो मौका मिलते ही मेरठ में 10 मई और उसके बाद दिखाई भी दिया.

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कोतवाल धनसिंह

10 मई की घटनाओं में एक नाम उबर कर सामने आता है वह है कोतवाल धनसिंह गुर्जर का. धनसिंह मेरठ की सदर कोतवाली के कोतवाल थे जहां सिपाहियों के विद्रोह की खबर फैलते ही आसपास के गांव के लोग जमा हो गए थे. धनसिंह इस समूह के नेता के रूप में उभरे और उनके नेतृत्व में मेरठ की जेल पर हमला हुए और कैदियों को आजाद कराकर जेल को आग लगा दी गई. इसके बाद सिपाहियों ने दिल्ली की ओर कूच किया.

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पहली बार हिंदुस्तान में अंग्रेजों के खिलाफ इतने बड़े पैमाने पर आंदोलन (1857 Revolution) हुआ. (फाइल फोटो)

आसपास के इलाकों में लोगों को मिला हौसला

मेरठ की घटना की ना केवल खबर आग की तरह फैली बल्कि इसने आसपास के इलाकों में भी सिपाहियों और लोगों को अंग्रेजों के खिलाफ खड़े होने का मौका और हौसला दिया. मेरठ के बाद बागी सिपाही दिल्ली की ओर गए जहां उन्होंने बहादुर शाह जफर को हिंदुस्तान का बादशाह बनाया. जल्दी ही क्रांतिकारियों ने उत्तर पश्चिम प्रांतों के बहुत से इलाकों पर कब्जा कर पूर्व में अवध तक पहुंच गए.

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अंग्रेजों की वापसी लेकिन

अंग्रेजों ने भी खूब किला लड़ाया और जल्दी ही वापसी दिखाते हुए जुलाई मध्य तक कानपुर वापस ले लिया और सितंबर अंत तक दिल्ली पर फिर से कब्जा कर लिया. लेकिन इसे पूरी तरह से दबाने में दो साल से भी ज्यादा का समय लगा और यहां तक कि ब्रिटेन की सरकार तक को हस्ताक्षेप करना पड़ा. और यह केवल एक कंपनी से सत्ता हाथ में लेने का मामला भर नहीं था बल्कि एक पूरी तरह से नए कानून वाली सरकार की स्थापना थी.

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