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भारत में राजद्रोह के पहले मुकदमे की कहानी, 129 साल पहले एक पत्रकार पर चला था केस

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Updated: February 4, 2020, 9:05 PM IST
भारत में राजद्रोह के पहले मुकदमे की कहानी, 129 साल पहले एक पत्रकार पर चला था केस
भारत में राजद्रोह का पहला केस 1891 में दर्ज किया गया था.

129 साल पहले ब्रिटिश सरकार (British Government) ने बंगाल में एक अखबार के संपादक पर पहला राजद्रोह का मुकदमा किया था.

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  • Last Updated: February 4, 2020, 9:05 PM IST
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जेएनयू (JNU) के छात्र शरजील इमाम (Sharjeel Imam) पर राजद्रोह (Sedition) का केस लगाए जाने के बाद इस कानून को लेकर बहस तेज हो गई हैं. सिर्फ इतना ही नहीं मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक अब मुंबई में शरजील इमाम के समर्थन में नारा लगाने वाले लोगों पर भी राजद्रोह का मुकदमा किया गया है. इससे पहले जेएनयू के छात्रसंघ अध्यक्ष कन्हैया कुमार पर भी राजद्रोह का मुकदमा लगाए जाने को लेकर खूब हंगामा हो चुका है. उन पर भी ये मामला अभी चल रहा है. लेकिन इन सबके बीच राजद्रोह के केस को लेकर बहस चल पड़ी है. भारत में इस कानून कानून का इतिहास पुराना है.

129 साल पहले चला था मुकदमा
भारत में राजद्रोह का पहला केस 1891 में दर्ज किया गया था. इस बात को 129 साल बीत चुके हैं. भारत में पितृसत्तावादी व्यवस्था की लंबी प्रताड़ना के बाद 1829 में सती प्रथा का अंत हो गया था. इसके बाद विधवा विवाह के खिलाफ 1856 और कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ 1870 में ब्रिटिश सरकार ने कदम उठाए थे. ब्रिटिश सरकार का तर्क था इन कदमों की वजह से भारतीय समाज में कुप्रथाओं का अंत होगा.

बाल विवाह को लेकर शुरू हुआ था विवाद

उस समय हिंदू धर्म में बाल विवाह की प्रथा बहुत आम थी और अक्सर ज्यादा उम्र के पुरुष के साथ 10 से 12 वर्ष उम्र की लड़कियों की शादी कर दी जाती थी. उस समय 'गर्भाधान' जैसी धार्मिक मान्याताएं चलती थीं जिसके तहत शादी के बाद कुछ ही दिनों में कम उम्र लड़कियां गर्भवती हो जाती थीं और इतनी कम उम्र में बच्चे को जन्म देने के दौरान उनकी अक्सर मौत भी हो जाती थी. उस समय के सामाजिक कार्यकर्ताओं ने इस तरह की शादियों को सीधे बंद करने की बजाए मांग की थी कि लड़कियों के मां बनने की उम्र की एक सीमा तय की जाए.

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अभी शरजील इमाम पर राजद्रोह का चार्ज लगाया गया है.


1889 में फूलमणि की मौतसाल 1889 में एक कम उम्र की एक विवाहित लड़की फूलमणि की मौत हो गई. उसकी शादी हरि मोहन मैती नाम के एक व्यक्ति से हुई थी जो उससे उम्र में 30 साल बड़ा था. दस साल की फूलमणि से शादी के बाद हरि मोहन ने शारीरिक संबंध बनाए और उसी रात फूलमणि की मौत हो गई. हरिमोहन पर रेप और हत्या का चार्ज लगा. लेकिन दुर्भाग्य से हरिमोहन बरी हो गया क्योंकि ब्रिटिश सरकार ने उस समय वैवाहिक कंसेंट के लिए उम्र 10 साल ही रखी थी.

सरकार चाहती थी कि समाज सुधार तो हो लेकिन हिंदू भावनाएं आहत न हो. लेकिन फूलमणि की मौत के बाद ब्रिटिश सरकार ने 19 मार्च 1891 को एक कानून लाकर कंसेंट की उम्र 10 साल से बढ़ाकर 12 साल कर दी. यानी 12 साल की उम्र से कम किसी भी लड़की से संबंध बनाना रेप माना गया था. ये कानून किसी विशेष धर्म पर लागू न होकर पूरे देश के लिए बनाया गया था.

सरकार के इस कानून ने बंगाल में हिंदू समुदाय को उद्वेलित कर दिया. तब बंगाली भाषा में एक अखबार निकलता था जिसका नाम था बंगोबासी (यानी बंगाल के निवासी). इस अखबार में ब्रिटिश सरकार के इस कदम की आलोचना करते हुए कई लेख प्रकाशित किए गए और ब्रिटिश सरकार पर आरोप लगाए कि वो हिंदू धार्मिक प्रथाओं के साथ छेड़छाड़ कर रही है.

 

 

इस कानून के खिलाफ कई तीखे लेख प्रकाशित करने की वजह से अखबार के संपादक जोगेंद्र चंद्र बोस सहित अन्य जिम्मेदार लोगों को पर राजद्रोह का मुकदमा दायर किया. ये ब्रिटिश भारत में राजद्रोह का पहला मुकदमा था. इस मुकदमे में दोनों पक्षों की तरफ से लंबी बहस चली. जोगेंद्र चंद्र बोस के वकील ने कोर्ट में दलील दी कि लेख की वजह से संपादक को सजा नहीं दी जा सकती है. इसके लिए लेखक जिम्मेदार नहीं है. दिलचस्प रूप से उन पांचों लेखों में किसी लेखक का भी नाम नहीं दिया दिया गया था.

तत्कालीन जज पर भी इस केस को लेकर काफी दबाव बन रहा था. ब्रिटिश सरकार पर यह दबाव था कि अगर इस केस में कार्रवाई हुई थी तो बंगाल में हिंदू समुदाय बड़े स्तर पर इसका विरोध कर सकता है. आखिरकार जज ने इस मामले में सजा सुनाने की बजाए दोबारा ट्रायल की सिफारिश कर दी. मामला कुछ समय के लिए खिसक गया. लेकिन फिर बाद में अखबार प्रशासन ने इसे लेकर ब्रिटिश सरकार से माफी मांग ली और फिर इस मामले में दोबारा कभी कोई केस नहीं चला.

बाल गंगाधर तिलक


कई क्रांतिकारियों पर लगा राजद्रोह
बाल गंगाधर तिलक से लेकर महात्मा गांधी तक पर इस सेक्शन के अंतर्गत ट्रायल चले. पत्रिका में छपे अपने तीन लेखों के मामले में ट्रायल झेल रहे महात्मा गांधी ने कहा था, "सेक्शन 124-A, जिसके अंतर्गत मुझ पर आरोप लगा है, आईपीसी के राजनीतिक वर्गों के बीच नागरिकों की स्वतंत्रता को दबाने के लिए रचे गए कानूनों का राजकुमार है. भारतीय दंड संहिता यानि आईपीसी के सेक्शन 124-A के अंतर्गत किसी पर राजद्रोह का आरोप लग सकता है. ब्रिटिश औपनिवेशिक काल की सरकार ने 19वीं और 20वीं सदी में राष्ट्रवादी असंतोष को दबाने के लिए यह कानून बनाए थे. खुद ब्रिटेन ने अपने देश में राजद्रोह कानून को 2010 में समाप्त कर दिया.

कानून निरस्त करने की होती है मांग
राजद्रोह कानून को समाप्त करने की मांग भी लंबे समय से होती रही है. राजद्रोह कानून का विरोध करने वालों का मानना है कि ये महात्मा गांधी के मूल सिद्धांत असंतोष के अधिकार की अवहेलना करता है. साथ ही भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने भी इस मामले में स्पष्ट किया था- ये कानून अत्यधिक आपत्तिजनक और अप्रिय है. जितनी जल्दी हम इससे छुटकारा पा लें उतना बेहतर होगा. इस कानून को समाप्त करने की वकालत देश का विधि आयोग भी कर चुका है.

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First published: February 4, 2020, 9:05 PM IST
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