भारत में पहली बार जब समुद्र के अंदर चलने वाली बैलेस्टिक मिसाइल का हुआ परीक्षण

भारतीय सुरक्षा (Indian Defence) में एक अभूतपूर्व कदम के तहत 26 फरवरी को ही स्वदेशी सागरिका मिसाइल का परीक्षण हुआ था. (फाइल फोटो)

भारतीय सुरक्षा (Indian Defence) में एक अभूतपूर्व कदम के तहत 26 फरवरी को ही स्वदेशी सागरिका मिसाइल का परीक्षण हुआ था. (फाइल फोटो)

26 फरवीर 2008 को ही भारत (India) ने अपनी पहली समुद्र के अंदर (Undersea) चलने वाली बैलेस्टिक मिसाइल (Ballistic Missile) सागरिका (Sagarika) का परीक्षण कर अपने नौसेना (Indian Navy) को मजबूत किया था.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 26, 2021, 6:06 AM IST
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देश में सुरक्षा के लिहाज से आत्मनिर्भर होते बहुत सी उपलब्धियां हासिल की है. इन महत्वपूर्ण कदमों में एक हमारी नौसेना की ताकत बढ़ाने वाला दिन 26 फरवरी 2008 को आया था. इसी दिन देश में पहले समुद्र के अंदर चलने वाली बैलेस्टिक मिसाइल का पहला और सफल परीक्षण हुआ था. इस परीक्षण से देश की नौसेना ने एक लंबी छलांग लगाई थी.

चार देशों के साथ जुड़ा नाम
साल 2008 में यह विशेष परीक्षण आंध्रप्रदेश के विशाखापट्टनम  तट से 10 किलोमीटर दूर पोन्टून नाव से किया गया था. इस परीक्षण से माना गया था कि भार ने पानी के भीतर से मिसाइल लॉन्च करने की क्षमता हासिल कर ली है. इसके साथ ही भारत अमेरिका, रूस, फ्रांस और चीन के साथ इस खास क्षमता वाले समूह में शामिल हो गया था जो न्यूक्लियर मिसाइल चलाने में सक्षम थे.

तटीय सुरक्षा में अहम कदम
भारत की तटीय सीमा 7516 किलोमीटर लंबी है. यूं तो भारत का सामरिक इतिहास में उसे पाकिस्तान और चीन से ही टक्कर मिलती रही है, लेकिन ऐसा नहीं है कि इन दोनों से भारत को केवल जमीनी सीमा से खतरा है. तीन ओर समुद्र से घिरे देश को समुद्री स्तर पर भी उतना ही खतरा है इस लिहाज से नौसेना की ताकत में इजाफा देश की सुरक्षा में एक जरूरी पहलू है.



आणविक क्षमता में इजाफा
सागरिका मिसाइल की रेंज 700 किलोमीटर है. इसके सफल परीक्षण से भारत के स्वदेशी न्यूक्लियर पंडुब्बी की ताकत कई गुना बढ़ गई थी. इससे देश की आणविक सुरक्षा में वह कमी पूरी हो गई थी जिससे आणविक ताकत आने के बाद भी देश की नौसेना उस ताकत से वंचित थी. आणविक बम बनाने की क्षमता ही काफी नहीं होती है उसके उपयोग के लायक मिसाइल तकनीक भी जरूरी है जो सागरिका ने भारतीय नौसेना को उपलब्ध करा दी थी.

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सागरिका मिसाइल (Sagarika Missile) को खास तौर पर INS अरिहंत के लिए बनाया गया था.


आधुनिक तकनीकों से लैस
सागरिका मिसाइल को आणविक या परंपरागत दोनों तरह के हथियारों के तौर पर इस्तेमाल किया जा सकता है. इस मिसाइल में एरोडायनामिक्स, कंट्रोल, गाइडेंस और नेवीगेशन की आधुनिकतम तकनीक का उपयोग किया गया है. सागरिका कार्यक्रम भारत के उस बड़े उद्देश्य का हिस्सा है जिसके तहत देश को सागरों में दूसरे आणविक हमले की क्षमता विकसित करना है.

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क्या है यह क्षमता
भारत ने यूं तो परमाणु परीक्षण कर परमाणु बम की क्षमताएं हासिल कर ली हैं, लेकिन एक जिम्मेदार देश होने के नाता यह भी प्रतिबद्धता तय की है कि वह कभी किसी युद्ध में सबसे पहले आणविक हमला नहीं करेगा, लेकिन अगर भारत पर हमला हुआ तो वह जवाब देने में भी सक्षम बनना चाहता है. सागरिका परीक्षण से पहले देश की नौसेना आणविक हमले का जवाब देने में सक्षम नहीं थी, लेकिन इसके बाद यह क्षमता भी देश की नौसेना को मिल गई.

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भारतीय नौसेना (Indian Navy) ने पिछले कुछ सालों में अपनी मारक क्षमता बढ़ाने पर विशेष जोर दिया है(फोटो साभार-ANI)




पिछली सदी के अंत में बनी इसकी योजना
सागरिका मिसाइल के विकास की योजना पिछली सदी के अंत में बनी थी जिसके तहत पनडुब्बी से प्रक्षेपित की जा सकने वाली बैलेस्टिक मिसाइल का विकास किया जाना था. परमाणु शक्ति अरिहंत पनडुब्बी के जरिए उपयोग में लाई जा सके.

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K15 के नाम से जानी जाने वाली सागरिका मिसाइल 10 मीटर लंबी है और इसका व्यास 74 सेमी है. 17 टन के वजन वाली यह मिसाइल एक हजार किलोग्राम का विस्फोट का अपने साथ ले जा सकती है. इसके अलावा इसे अलग से लॉन्च करने का एक मिसाइल लॉन्चर भी विकसित किया गया है जिसे प्रोजेक्ट 420 नाम दिया गया है.
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