भारत में आज पहली बार हुआ था स्वदेशी उपग्रह का प्रक्षेपण

आर्यभट्ट उपग्रह (Aryabhata Satellite) को पूरी तरह से स्वदेश में विकसित किया गया था. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

आर्यभट्ट उपग्रह (Aryabhata Satellite) को पूरी तरह से स्वदेश में विकसित किया गया था. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

19 अप्रैल 1975 को इसरो (ISRO) ने भारत के पहले कृत्रिम स्वदेशी उपग्रह (Artificial Satellite) आर्यभट्ट (Aryabhata) का प्रक्षेपण किया था.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 19, 2021, 6:36 AM IST
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1970 के दशक में दुनिया में अंतरिक्ष के क्षेत्र में प्रतिद्वंदिता आकार ले चुकी थी. अमेरिका चंद्रमा पर अपने मानव अभियान भेज रहा था. इसी बीच भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान (ISRO) ने भी अंतरिक्ष के क्षेत्र में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की योजना पर काम शुरु कर दिया था और 1975 में 19 अप्रैल को सोवियत संघ की सहायता से स्वदेश में विकसित पहला उपग्रह (Satellite) आर्यभट्ट (Aryabhata) अंतरिक्ष में सफलतापूर्वक स्थापित किया था जो इसरो के एक लंबे सफर का पहला कदम माना जाता है.

भारत के गणितज्ञ के नाम पर

देश के इस पहले उपग्रह का नाम भारत के मशहूर खगोलशास्त्री और गणितज्ञ आर्यभट्ट के नाम पर रखा गया था. आर्यभट्ट उन पहले व्यक्तियों में से थे जिन्होंने बीजगणित का प्रयोग किया था.  इसके अलावा उन्होंने पाई का सही मान 3.1416 निकाला था. बताया जाता है कि उपग्रह को आर्यभट्ट नाम तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने चुना था

कैसे चुना गया नाम
इसरो के पूर्व चेयरमैन यू आर राव के मुताबिक उनकी टीम ने सैटेलाइट के लिए सरकार को तीन नामों का प्रस्ताव दिया. उन सभी नामों में आर्यभट्ट सबसे ऊपर था. आर्यभट्ट के अलावा मैत्री और जवाहर नाम पर चर्चा हुई थी. तब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आर्यभट्ट नाम का चयन किया.

आर्यभट्ट की खास बातें

केवल 360 किलोग्राम के वजन के उपग्रह की कक्षा का जीवन करीब 17 साल था. इसकी कीमत उस समय 3 करोड़ से ज्यादा की थी. इसे चलाने के लिए 46 वाट की ऊर्जा की जरूरत थी. वैसे तो इसके जीवन छह महीने ही निर्धारित था, लेकिन यह मार्च 1981 यानी करीब छह साल तक देश के संपर्क में था.



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इसरो (ISRO) का उद्देश्य कृत्रिम उपग्रहों के निर्माण और अंतरिक्ष में उनके संचालन में अनुभव पाना था. (फाइल फोटो)


सोवियत संघ की मदद से प्रक्षेपण

इस उपग्रह के प्रक्षेपण की तकनीक उस समय भारत में नहीं थी इसलिए इसमें सोवियत संघ का सहयोग लिया गया और इसका प्रक्षेपण रूस के अस्तरखान ओब्लास्ट की कैपूस्तिन यार साइट से कोसमोस-3एम प्रक्षेपण यान के जरिए किया गया. इसके लिए भारत और सोवियत संघ के बीच  समझौता साल 1972 में हुआ था.

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क्या था आर्यभट्ट का उद्देश्य

आर्यभट्ट  का उद्देश्य एक्स रे एस्ट्रोनॉमी, एरोनॉमिक्स और सौर भौतिकी में प्रयोग करना था. इसके कक्षा में स्थापित होने के बाद ऊर्जा बंद होने से यह चार दिन अपने कक्षा में बिना काम किए घूमता रहा और इसके काम करने के 5 दिन बाद इससे सभी संपर्क टूट गए थे. फिर 17 साल बाद 11 फरवरी 1992 में इसने दोबारा पृथ्वी के वातावरण में प्रवेश किया.

टॉयलेट में ही रिसीविंग सेंटर

आर्यभट्ट का नियंत्रण कक्ष के लिए अधोसंरचना अच्छी नहीं थी. इसरो के पूर्व चेयरमैन यू. आर. राव ने एक इंटरव्यू में बताया था कि मिशन के दौरान सेंटर में जगह की किल्लत थी. इसके चलते वैज्ञानिकों ने टॉयलेट को ही डाटा रिसिविंग सेंटर के तौर पर उपयोग में लाना पड़ा था.

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आर्यभट्ट उपग्रह (Aryabhata Satellite) की तस्वीर भारतीय रिजर्व बैंक के दो रुपये के नोट पर सालों तक दिखती रही. (तस्वीर: Wikimedia Commons)


बदले में सोवियत संघ को क्या मिला

इस उपग्रह को पीन्या में तैयार किया गया था लेकिन सोवियत संघ के साथ हुए समझौते के अनुसार सोवियत संघ रूस भारतीय बंदरगाहों का इस्तेमाल जहाजों को ट्रैक करने के लिए कर सकता था. वास्तव में इस उपग्रह का निर्माण इसरो द्वारा कृत्रिम उपग्रहों के निर्माण और अंतरिक्ष में उनके संचालन में अनुभव पाने के मकसद से किया गया था.

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1975 में इस सैटेलाइट के प्रक्षेपण के मौक पर इस ऐतिहासिक क्षण को भारतीय रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया ने 1976 में दो रुपये के नोट के पिछले हिस्से पर छापा. 1997 तक दो रुपये के नोट पर आर्यभट्ट उपग्रह की तस्वीर छापी गई, बाद में इसके डिजाइन में बदलाव हो गया.
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