भारत में आज पहली बार: पृथ्वी मिसाइल का सफल परीक्षण हुआ था

पृथ्वी मिसाइल (Prithvi Missile) के पहले परीक्षण के बाद भारतीय मिसाइल कार्यक्रम में तेजी आ गई थी.

पृथ्वी मिसाइल (Prithvi Missile) के पहले परीक्षण के बाद भारतीय मिसाइल कार्यक्रम में तेजी आ गई थी.

आज से 32 साल पहले भारत (India) ने पहली बार स्वदेशी तकनीक (Indigenous Technology) से निर्मित पृथ्वी मिसाइल (Prithvi Missile) का परीक्षण कर दुनिया में हलचल मचा दी थी.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 25, 2021, 6:50 AM IST
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आज भारत (India) की मिसाइल तकनीक (Missile Technology)  दुनिया में आधुनिक और उन्नत तो है ही, इसके साथ ही यह आत्मनिर्भर भी है. लेकिन आत्मनिर्भरता का यह सफर बहुत लंबा रहा है. इसमें से एक अहम दिन 25 फरवरी साल 1988 का है, जब भारत ने पहली बार पृथ्वी मिसाइल (Prithvi Missile) का सफल परीक्षण किया था. यह भारतीय सुरक्षा तंत्र के लिए एक बहुत बड़ी उपलब्धि थी जिसके तरह पूरी तरह से स्वदेशी तकनीक ((Indigenous Technology) से देश ने सतह से सतह पर मार करने वाली मिसाइल बना कर सामरिक दुनिया में हलचल मचा दी थी.

शुरुआती लेकिन बहुत ही अहम कदम
इस मिसाइल का विकास केवल एक शुरूआत थी और एक छोटा लेकिन बहुत ही अहम कदम था जिसके बाद भारतीय सुरक्षा तकनीकी वैज्ञानिकों ने पीछे मुड़ कर नहीं देखा. लेकिन इस पृथ्वी मिसाइल जिसे बाद में पृथ्वी-1 मिसाइल कहा जाने लगा था, रातों रात विकिसित नहीं हुई. 1983 में इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम (IGMDP) की शुरुआत हुई.

कलाम और इंदिरा गांधी
इस कार्यक्रम में भारत के मिसाइल मैन कहे जाने वाला पूर्व राष्ट्रपति डॉ एजीपी अब्दुल कलाम आजाद की प्रमुख भूमिका था. उन्हीं की निगरानी में ही IGMDP कार्यक्रम चल रहा था. इसकी शुरुआत में जब तत्कालीन प्रधानमंत्री श्रीमती इंदिरा गांधी ने इस कार्यक्रम को शुरु करवाया और 300 करोड़ रुपये के बजट का आवंटन किया.



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पृथ्वी मिसाइल (Prithvi Missile) का बाद में एक उन्नत संस्करण विकसित किया गया जिसकी जद 600 किलोमीटर तक हो गई. (तस्वीर: Wikimedia Commons)


अलग अलग जगह अमल लाए गए कार्यक्रम के हिस्से
1985 में शुरुआती तौर के परीक्षण सफल हुए लेकिन पृथ्वी मिसाइल का परीक्षण 25 फरवरी 1988 को ही हो सका. जब कार्यक्रम की शुरुआत में कलाम ने इंदिरा गांधी को जून 1987 तक का समय दिया था. जोधपुर यूनिवर्सिटी में इसके एल्गॉरिदम बनाए गए. भारतीय विज्ञान संस्थान और इसरो इसके अलग अलग हिस्सों पर काम कर रहे थे. कलाम तब डीआरडीएल के निदेशक के तौर पर इन सभी में समन्वय का काम कर रहे थे.

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कैसे थे उस समय दुनिया के हालात
उस दौर में अमेरिका और सोवियत संघ में शीत युद्ध जारी थी, सोवियतसंघ में विघटन की नींव पड़ चुकी थी. वहीं अमेरिका नाटो के जरिए अपना दबदबा बढ़ा रहा था. दक्षिण एशिया में पाकिस्तान अमेरिका खुला समर्थक था जिससे उसे किसी भी तरह का हथियार की पहुंच की कमी नहीं थी, लेकिन भारत एक गुटनिरपेक्ष देश था. सोवियत संघ के ज्यादा करीब था. ऐसे में यह परीक्षण अमेरिका को रास नहीं आया था.

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पिछले 32 सालों में भारत ने मिसाइल तकनीक (Missile Technology) में पूरी तरह से आत्मनिर्भरता हासिल कर ली है. (फाइल फोटो)


भारत पर प्रतिबंध और उसका फायदा
इन हालातों में भारत पर परमाणु संपन्न सात देशों ने भारत को मिसाइल तकनीक संबंधी हस्तांतरण पर रोक लगा दी. इससे भारत को गाइडेड मिसाइल और उससे जुड़े किसी भी हिस्से या पार्ट्स या उपकरण को खरीदना नामुमकिन हो गया. लेकिन ऐसी घटनाओं ने भारत को अंततः आत्मनिर्भर ही बनाया है. इसके बाद भारत ने देर से सही लेकिन अंततः उन सभी तकनीकों में आत्मनिर्भरता हासिल की जिन पर भारत को प्रतिबंधित किया गया था. इसकी सबसे अच्छी मिसाल क्रायोजेनिक इंजन तकनीक है जिसे संपन्न देशों ने यह कहकर नहीं दिया था कि इसका भारत परमाणु हथियार के लिए दुरुपयोग कर सकता है.

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IGMDP कार्यक्रम के तहत पृथ्वी के अलावा आकाश, नाग, त्रिशूल और अग्नि मिसाइलों का विकास भी भारत आज सफलता पूर्वक कर चुका है और इस समय भारत अग्नि मिलाइल की जद को बढ़ाने का प्रयास कर रहा है. जबकि अग्नि साथ आकाश, नाग, त्रिशूल भारतीय सेनाओं का हिस्सा बन चुके हैं. पृथ्वी की शुरुआती जद या रेंज 150 किलोमीटर ही थी जो साल 2004 में  बढ़ा कर 600 किलोमीटर तक की जा चुकी है.
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