भारत में आज पहली बार- जब महात्मा गांधी और रवीन्द्रनाथ टैगोर की हुई मुलाकात

महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) और रवींद्रनाथ टैगोर (Rabindranath Tagore) की पहली मुलाकात एक एतिहासिक क्षण था. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) और रवींद्रनाथ टैगोर (Rabindranath Tagore) की पहली मुलाकात एक एतिहासिक क्षण था. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

6 मार्च 1915 को पहली बार महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) और रवींद्रनाथ टैगोर (Rabindranath Tagore) शांतिनिकेतन में मिले थे. उस समय शांतिनिकेतन में दोनों की मुलाकात को लेकर सभी लोग बहुत उत्साहित थे.

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आधुनिक भारत के इतिहास में महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) की भूमिका अविस्मर्णीय है. उनके साथ रवींद्रनाथ टैगोर (Rabindranath Tagore) का नाम भी भारतीय इतिहास और स्वतंत्रता आंदोलन में खासा महत्व रखता है. इस लिहाज से दोनों की पहली मुलाकात का अपना महत्व है. गांधी जी और टैगोर की मुलाकात साल 1915 में छह मार्च को शांति निकेतन (Shantinkietan) में हुई थी.

एक दूसरे के प्रशंसक थे दोनों
उल्लेखनीय है कि यह गांधी जी की पहली शांति निकेतन यात्रा नहीं थी. गांधी जी की पहली शांति निकेतन यात्रा 17 फरवरी 1915 को ही हुई थी. लेकिन संयोग से तब टैगोर वहां नहीं थे. इस तरह 6 मार्च को ही दोनों की मुलाकात हो सकी थी. दोनों ही उपनिवेशवाद और पूंजीवाद के खिलाफ थे, लेकिन जहां गांधी जी कार्यक्षेत्र राजनैतिक था तो वहीं टैगोर साहित्यिक व्यक्ति थे. दोनों में कई मुद्दों पर मतैक्य ना होने के बाद भी वे एक दूसरे के प्रशंसक थे. गांधीजी को महात्मा की उपाधी टैगोर ने दी थी तो गांधी ने उन्हें गुरूदेव कहा था.

मुलाकात को लेकर शांतिनिकेतन में उत्साह
दोनों के बीच मुलाकात कराने का श्रेय एक अंग्रेज को जाता है जिसका नाम चार्ल्स फ्रीर एंड्रयूज था. एंड्रयूज ने ही गांधी जी की एक सप्ताह तक रुकने की व्यवस्था शांतिनिकेतन में कराई थी. गांधी के निकट सहयोगी काका केलकर ने इस मुलाकात के बारे में सविस्तार बताया था. उनके शब्दों में, “सभी शिक्षक जिसमें मैं भी शामिल था, यह जानने को बहुत उत्सुक थे कि कैसे भारत माता के दो सपूत पहली बार मिलते हैं.”



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महात्मा गांधी (Mahatma Gandhi) और रवींद्रनाथ टैगोर (Rabindranath Tagore) जीवन भर कुछ मतभेदों के बाद भी एक दूसरे के प्रशंसक रहे. (तस्वीर: Wikimedia Commons)


जब हुई मुलाकात
काका केलकर ने आगे बताते हुए कहा था, “हम बापू के साथ बैठक में पहुंचे. रविबाबू  उस समय सोफा पर बैठे थे. बापू को आता देख उठकर खड़े हो गए . उनका लंबा कद, सफेद चमकीले बाल, लंबी दाढ़ी,  शानदार चोगा उनकी शानदार तस्वीर बना रहा था. वहीं इसके विपरीत बापू का साधारण सा धोती कुर्ता और उनकी कश्मीरी टोपी. बापू ने जमीन पर बिछे कालीन में बैठना पसंद किया तो रविबाबू ने उनका अनुसरण किया.”

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कुछ बदलाव सुझाए बापू ने
इस मुलाकात के दौरान गांधी जी ने शांतिनिकेतन के कामकाज में खासी दिलचस्पी दिखाई थी. उन्होंने वहां कुछ बदलावों का सुझाव भी टैगोर को दिया था. वे चाहते थे कि शांतिनिकेदन में छात्र पढ़ाई के साथ अपना काम भी खुद ही करना सींखें. उन्होंने सलाह दी कि शांतिनिकेतन में छोटे-छोटे कामों के लिए नौकर रखने की जरूरत नहीं है. इसी के बाद से 10 मार्च 1915 को शांतिनिकेतन में सेल्फ हेल्प मूवमेंट की शुरुआत हुई.

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गांधी (Mahatma Gandhi) और टैगोर (Rabindranath Tagore) के मतभेदों की चर्चा ज्यादा होती है, लेकिन सच यह है दोनों एक दूसरे गहरे समर्थक थे. (तस्वीर: Wikimedia Commons)


मतभेदों की चर्चा अधिक?
गांधी और टैगोर के बारे में जब भी चर्चा होती है, तब उनके मतभेदों की चर्चा जरूर होती है. दोनों के एक दूसरे को लिखे खत और बयानों से साफ होता है कि उनके मतभेदों का आधार कितनी अलग अलग जमीनों पर था. मतभेदों के बाद भी दोनों में से किसी को भी गलत साबित करना मुश्किल था. चाहे स्वराज को लेकर दोनों के अलग विचार हों या फिर बापू की 1934 में प्राकृतिक आपदा पर गांधी के विचारों पर वैज्ञानिक तौर पर सवालिया निशान लगाना हो, दोनों कभी एक दूसरे को नीचा नहीं दिखाया

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पत्रों से दोनों के बीच के रिश्ते का पता चलता है
इस मुलाकात के बाद दोनों के बीच संचार बढ़ गया. गांधी कुल 8 बार ही शांति निकेतन जा सके, लेकिन दोनों के  बीच अन्य जगहों पर मुलाकात के अलावा पत्राचार और टेलीग्राम से खूब बातचीत हुई. उनके पत्र इसकी झलक दिखाते हैं कि उन्होंने हमेशा ही सत्य, स्वतंत्रता, लोकतंत्र, साहस, शिक्षा, और मानवता के भविष्य जैसे विषयों पर चर्चा की. ये खत आज आम लोगों के पढ़ने के लिए उपलब्ध हैं. ये खत मिसाल हैं कि कैसे मतभिन्नता के बावजूद मित्रता और सम्मान कायम रखा जा सकता है.
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