Antarctica में मिले पानी में मीथेन का रिसाव, जानिए कितना खतरनाक है ये

Antarctica में मिले पानी में मीथेन का रिसाव, जानिए कितना खतरनाक है ये
अंटार्कटिका के ठंडे पानी में केवल 10 मीटर की गहराई पर यह मीथेन लीक हो रही है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)

पहली बार वैज्ञानिकों ने बड़ी मात्रा का मीथेन रिसाव (Methane leak) खोजा है. यह अंटार्कटिका (Antarctica) के पानी के केवल 10 मीटर गहराई पर है.

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पिछले कुछ समय से हमें अंटार्कटिका (Antarctica) इलाके में काफी बदलाव देखने को मिल रहे हैं. ग्लोबल वार्मिंग (Global warming) का सबसे ज्यादा असर अंटार्कटिका पर ही हो रहा है. यहां की ओजोन परत (Ozone layer) को सबसे ज्यादा नुकसान होता है.  कुछ समय से यहां की बर्फ पिघलने की दर तेजी से बढ़ी है. शोधकर्ताओं ने पाया है कि यहां समुद्र के अंदर से मीथेन गैस (Methane Gas) का रिसाव हो रहा है.

कैसे पता चला इस रिसाव का
साल 2012 में मैराइन इकोलॉजिस्ट एंड्रयू थर्बर ने अंटार्कटिका के रॉस सागर के बर्फीले पानी में सूक्ष्म जीवन की बढ़ी हुई मात्रा देखी जिससे उन्हें काफी हैरत हुई. ऐसा लगा कि बहुत से सूक्ष्मजीव एक पानी की झरने की तरह की नीचे मीथेन की ओर गिर रहे हैं.

इस तरह की पहली खोज
वैज्ञानिकों का विश्वास है कि अंटार्कटिका के नीचे महासागर के तल में विशाल मात्रा में मीथेन गैसे जमा है. इस खोज का अध्ययन जर्नल प्रोसीडिंग्स ऑफ द रॉयल सोसाइटी बी में प्रकाशित हुआ है. यह इस महाद्वीप में इस तरह की पहली खोज है जिसमें इतनी बड़ी मात्रा में मीथेन का प्राकृतिक मात्रा में रिसाव हो रहा है.



अच्छी बात है यह कि...
इस बात के कोई संकेत नहीं मिले हैं किअ अंटार्कटिका में हो रहे इस रिसाव का कारण जलवायु परिवर्तन नहीं है. यह वैज्ञानिकों के लिए अच्छी खबर है क्योंकि ग्लोबल वार्मिंग की वजह से यहां लंबे समय से जमा रही मीथेन रिस कर वायुमंडल में जा सकती थी जो कि अब तक नहीं हुआ है.

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अंटार्कटिका में पिछले कुछ समय से काफी बदलाव हो रहे हैं.


क्या होगा अगर यह सीधे वायुमंडल में जाती
लेकिन अगर मीथेन वायुमंडल में पहुंच जाती तो ग्लोबल वार्मिंग को बहुत ज्यादा बढ़ा देती क्योंकि मीथेन कार्बन डाइऑक्साइड से भी ज्यादा खतरनाक ग्रीनहाउस गैस है. पिछले कुछ सालों से मीथेन की मात्रा वायुमंडल में तेजी से बढ़ रही है. इसकी वजह बढ़ती हुई कृषि और तेल और गैस के उत्खनन की गतिविधियां हैं.

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सूक्ष्मजीव कर रहे हैं मदद
थर्बर का कहना है कि अंटार्कटिका के रिसाव के पास के सूक्ष्म जीवों का जमावड़ा हकीकत में मीथेन को वायुमंडल में जाने से रोक रहा है क्योंकि वे उसे वायुमंडल में पहुंचने से पहले ही उसका इस्तेमाल कर लेते हैं. लेकिन इससे इंसानी गतिविधियों के कारण हो रहे उत्सर्जन को रोकने में कोई मदद नहीं मिलेगी जो आज के वायुमंडल में कम से कम आधी मीथेन गैस की उपस्थिति की जिम्मेदार हैं. समुद्र या महासागरों से निकली मीथेन का वैश्विक मीथेन उत्सर्जन में केवल एक प्रतिशत योगदान है.

पहली बार इतनी कम गहराई
थर्बर का मानना है कि अब तक हुई जमीन के नीचे पाए जाने वाले प्राकृतिक पानी के स्रोतों से मीथेन के रिसाव से संबंधित जितने शोध हुए हैं, उन्होंने 200 से 600 मीटर नीचे तक की गहराई पर अपना ध्यान लगाया है. जिसमें हवा में पहुंचने से पहले वह बहुत ज्यादा सूक्ष्मजीवों के संपर्क में आ जाती है. लेकिन अंटार्कटिका में हो रहे रिसाव की गहराई केवल 10 मीटर ही है जिससे इसके सतह पर तेजी से और ज्यादा मात्रा में पहुंचने की संभावना है. थर्बर ने कहा, “ दस मीटर कोई 600 मीटर नहीं होता. इतने में मीथेन आसानी से वायुमंडल में पहुंच कर दुनिया के मीथेन बजट में अपना खासा योगदान दे सकती है.



और एक चिंता यह भी
 थर्बर की एक और चिंता यह है कि ठंडे और उथले पानी में सूक्ष्मजीव मीथेन के पास धीरे से आते हैं. इससे वैज्ञानिकों को सूक्ष्मजीवन के बर्ताव को समझने में भी मदद मिल सकती है  क्या इससे दूसरी जगहों पर भी मीथेन का रिसाव वायुमंडल तक पहुचने से रोकने में मदद मिल सकती है.

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इसके अलावा वैज्ञानिकों को यह भी डर है कि जिस तरह से अंटार्कटिका की बर्फ पिघल रही है कहीं यह मीथेन सीधे हवा में ही न पहुंचने लगे. यह पूरी दुनिया के लिए बहुत नुकसानदेह साबित होगा.
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