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नोटबंदी: 800 टन पुराने नोटों की कतरन को क्यों पहुंचाया गया दक्षिण अफ्रीका, जानिए ये कहानी

नोटबंदी: 800 टन पुराने नोटों की कतरन को क्यों पहुंचाया गया दक्षिण अफ्रीका, जानिए ये कहानी

नोटबंदी के बाद हजारों टन पुराने नोट को काटकर उसे हार्ड बोर्ड बनाया गया.

नोटबंदी के बाद हजारों टन पुराने नोट को काटकर उसे हार्ड बोर्ड बनाया गया.

Five years of demonetisation: आज से ठीक पांच साल और एक दिन पहले की तारीख यानी 8 नवंबर 2016 की रात 8:30 बजे, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उस वक्त चलन में मौजूद 500 और 1000 रुपये के नोटों को स्वीकार करने की घोषणा की थी तो देश और दुनिया में हड़कंप मच गया. पीएम मोदी की इस घोषणा से देश में 15.41 लाख करोड़ रुपये मूल्य के 500 और 1000 के नोट अवैध करार दे दिए गए.

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    Five years of demonetisation : आज से ठीक पांच साल और एक दिन पहले की तारीख यानी 8 नवंबर 2016 की रात 8:30 बजे, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उस वक्त चलन में मौजूद 500 और 1000 रुपये के नोटों को स्वीकार करने की घोषणा की थी तो देश और दुनिया में हड़कंप मच गया. पीएम मोदी की इस घोषणा से देश में 15.41 लाख करोड़ रुपये मूल्य के 500 और 1000 के नोट अवैध करार दे दिए गए. देश की कुल करेंसी में इन नोट्स की हिस्सेदारी 86 फीसदी थी. लेकिन क्या आपको पता है कि इन अवैध करार दिए गए नोटों का क्या हुआ?

    न्यू इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के मुताबिक इन नोटों का एक हिस्सा दक्षिण अफ्रीका भेजा गया. दरअसल, रिपोर्ट के मुताबिक चलन से बाहर किए गए इन नोटों का वजन हजारों टन था. इसमें एक हिस्सा जिसका वजन करीब 800 टन था, उसे प्रोसेस कर दक्षिण अफ्रीका भेजा गया.

    अखबार ने सूत्रों के हवाले से लिखा है कि 800 टन वजन के इन पुराने नोटों को केरल के उत्तरी मालाबार क्षेत्र की एक प्लाइ बोर्ड फैक्ट्री में भेजा गया. यहां इन नोटों को टुकड़ा-टुकड़ा कर हार्ड बोर्ड बनाया गया. इन हार्ड बोर्ड्स का इस्तेमाल वहां महात्मा गांधी की क्षतिग्रस्त मूर्ति ठीक करने में किया गया.

    नोट काटने के लिए 27 सेंटर बनाए गए थे
    रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने चलन से बाहर किए इन हजारों टन नोटों को काटने के लिए देश भर में 27 श्रेडिंग सेंटर बनाए गए थे. एक ऐसा ही श्रेडिंग सेंटर मालाबार जिले में बनाया गया था. इसके लिए वेस्टर्न इंडिया प्लाईवुड लिमिटेंड (डब्ल्यूआईपीएल) को नोटबंदी से एक माह पहले ही ठेका दे दिया गया था. डब्ल्यूआईपीएल की फैक्ट्री कुन्नूर जिले में स्थित है. कंपनी ने इन नोटों से हार्ड बोर्ड और सॉफ्ट बोर्ड बनाने का काम किया. करीब 800 टन वजनी नोटों के कतरन से कंपनी ने करीब एक साल तक हार्ड बोर्ड बनाने का काम किया.

    नोटबंदी से पहले ही आरबीआई के साथ मिलकर कंपनी काम कर रही थी
    कंपनी के एक प्रवक्ता अखबार से कहा है कि नोटबंदी से पहले ही आरबीआई के साथ मिलकर कंपनी काम कर रही थी. इसके बाद हमने करेंसी नोटों से हार्डबोर्ड बनाने का फैसला किया और इसके लिए आरबीआई में टेंडर डाला. नोटबंदी से काफी पहले हमें पुराने खराब नोटों की कतरन की पहली खेप अक्टूबर 2016 में प्राप्त हुई.

    नोट बनाने में उच्च गुणवत्ता के कागज का इस्तेमाल होता है
    कंपनी ने बताया कि करेंसी नोट बनाने में उच्च गुणवत्ता के कागज का इस्तेमाल होता है. वह काफी पतला होता है. नोटों के कतरन को सबसे पहले रिसाइक्लिंग डीलरों को सौंपा गया. उन्होंने पहले इसे ब्रिक्वेट्स (briquettes) में तब्दील किया. फिर इसे आरबीआई को लौटा दिया. इसके बाद इन्हें प्लाईबोर्ड फैक्ट्री में भेजा गया है, जहां इनसे हार्ड बोर्ड बनाया गया.

    कंपनी का कहना है कि आमतौर पर हार्ड बोर्ड बनाने के लिए फैक्ट्री में लकड़ी के टुकड़ों को दबाकर पल्प बनाया जाता है. इसके बाद इसमें नोटों के ब्रिक्वेटर्स लगाए जाते हैं. इससे हार्डबोर्ड और मजबूत हो जाता है. इसी कारण सीमित मात्रा में ब्रिक्वेटर्स का इस्तेमाल किया जाता है. ज्यादा ब्रिक्वेटर्स का इस्तेमाल करने से पल्प की बर्बादी होती है.

    ऐसे बनाया जाता है हार्डबोर्ड
    लकड़ी के फाइबर को संकुचित यानी उच्च ताप पर दबाकर हार्डबोर्ड बनाया जाता है. इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से फर्निचर और कंस्ट्रक्शन के कामों में होता है.

    कंपनी का कहना है कि वैसे तो लकड़ी के कच्चे माल को आसानी से कंप्रेस्ड कर दिया जाता है. धूल भरे पुराने नोटों के कतरन को कंप्रेस्ड करने में थोड़ी दिक्कता आई लेकिन इसके लिए कंपनी को अलग से कोई उपकरण नहीं लगाने पड़े. वेस्टर्न इंडिया प्लाइवुड लिमिडेट की स्थापना 1945 में हुई थी और यह दक्षिण पूर्व एशिया की एक सबसे बड़ी लकड़ी आधारित फैक्ट्री है.

    Tags: 1000-500 notes, Indian currency, RBI

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