क्यों चीन खुद ही अपनी कोरोना वैक्सीन से घबराया हुआ है?

क्यों चीन खुद ही अपनी कोरोना वैक्सीन से घबराया हुआ है?
चीन में कोरोना वैक्सीन के ट्रायल के लिए स्वेच्छा से लोग नहीं आए (Photo-pixabay)

चीन में कोरोना वैक्सीन के ट्रायल (coronavirus vaccine trial in China) के लिए स्वेच्छा से लोग नहीं आए तो उसने अपने ही सरकारी कर्मचारियों के लिए वैक्सीन अनिवार्य कर दी. ये वैक्सीन उस कंपनी की है, जिसे खुद चीनी एक्सपर्ट्स ने मंजूरी नहीं दी है.

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कोरोना वायरस का आंकड़ा एक करोड़ पार कर चुका है. इस बीच दुनिया के तमाम देशों की फार्मा कंपनियां कुल मिलाकर 130 से ज्यादा कोरोना वैक्सीन पर काम कर रही हैं. इनमें से कई वैक्सीन्स लैब से निकलकर अब ह्यूमन ट्रायल तक पहुंच चुकी हैं. चीन में भी चार फार्मा कंपनियां वैक्सीन तैयार करने में जुटी हुई हैं. इन्हीं में से एक Sinovac कंपनी की कोरोना वैक्सीन आजकल चर्चा में है. खबर के मुताबिक इसे चीन के नेशनल मेडिकल प्रोडक्ट्स एडमिनिस्ट्रेशन की ओर से मंजूरी नहीं मिली है. तब भी कथित तौर पर चीन की एक सरकारी कंपनी ने अपने स्टाफ को ट्रायल में जुड़ने ने लिए कहा.

नहीं मिली सरकारी मंजूरी
बीजिंग में चीन की ये कंपनी वैक्सीन की दौड़ में काफी आगे चल रही है. उसका दावा है कि उसने अप्रैल में ही लैब ट्रायल के बाद एनिमल ट्रायल भी कर लिया और तभी ही ह्यूमन ट्रायल के पहले चरण में पहुंच गई. तब तक यूएस की फार्मा कंपनी मॉडर्ना भी चीन से कुछ पीछे ही थी. हालांकि हाल ही में Sinovac के बारे में एक अहम बात निकलकर आई है. The Epoch Times की रिपोर्ट के मुताबिक कंपनी के कोरोना वैक्सीन पैकेट पर सीधे-सीधे लिखा हुआ है कि इसे देश के नेशनल मेडिकल प्रोडक्ट्स एडमिनिस्ट्रेशन (NMPA) ने अनुमति नहीं दी. इससे वैक्सीन के ट्रायल में रुकावट आ रही थी.

मंजूरी नहीं मिली वैक्सीन को इस तरह से लगाना खतरनाक हो सकता है (Photo-pixabay)

कंपनी ने किया अनिवार्य


तभी चीन की ही एक सरकारी कंपनी ने इसमें मदद की. कंपनी ने अपने स्टाफ के लिए वैक्सीन लगवाना अनिवार्य कर दिया. कई भाषाओं में छपने वाले अमेरिकन अखबार The Epoch Times को कथित तौर पर इससे जुड़े प्रमाण भी मिले हैं. अखबार का दावा है कि उसे सरकारी एजेंसी से मंजूरी न मिलने के बाद भी कंपनी के वैक्सीन लगवाने को कहने से संबंधित इंटरनल डॉक्युमेंट हाथ लगे हैं.

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क्या कहते हैं एक्सपर्ट
चाइनीज यूनिवर्सिटी ऑफ हांगकांग में एनवायरमेंटल साइंस प्रोग्राम के विभागाध्याक्ष चेन किंग मिंग कहते हैं कि मंजूरी नहीं मिली वैक्सीन को इस तरह से लगाना खतरनाक हो सकता है. इसका सबसे बड़ा खतरा ये है कि वैक्सीन लगवा रहे लोगों को गंभीर किस्म का निमोनिया हो सकता है. चेन कहते हैं कि किसी भी वैक्सीन को बनने में कम से कम एक साल तो लगता है.

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लैब के बाद एनिमल टेस्ट होता है और बाद ह्यूमन क्लिनिकल ट्रायल में भी 3 चरण पूरे करने होते हैं. इस सारे चरणों में ये समझने के बाद वैक्सीन सेफ है और ये तय होने के बाद कि वैक्सीन का कितना डोज किस उम्र के लोगों को और किस तरह से दिया जाएगा- तब ही उसे मंजूरी मिलती है. लेकिन चीन में ऐसा नहीं हो रहा है. वैसे भी चीन में जिस तरह के मानवाधिकार उल्लंघन की खबरें मिलती रही हैं, उसमें वैक्सीन का जबरन ट्रायल कोई बड़ी बात नहीं.

चीन में वैक्सीन ट्रायल के लिए लोग न मिलने की बात अप्रैल-मई में भी आ चुकी है (Photo-pixabay)


क्या है ये फार्मा कंपनी
बीजिंग में Sinovac Biotech कंपनी का हेड ऑफिस है. ये हांगकांग की एक प्राइवेट कंपनी और सरकारी कंपनी सिनोबायोवे का जॉइंट वेंचर है, जिसने कोरोना के लिए कोरोनावैक नाम से वैक्सीन तैयार की है. ये वैक्सीन एक सरकारी कंपनी में सात तरह के कर्मचारियों को लगाने को कहा गया है. ये सारे ग्रुप ऐसे हैं, जिन्हें आमतौर पर लोगों से काम के लिए मिलना-जुलना होता है. उन्हें कागज जारी करके अनिवार्य तौर पर ट्रायल का हिस्सा बनने के लिए कहा गया. साथ ही ये कहा गया कि वैक्सीन पूरी तरह से सेफ है. उन्हें ये नहीं बताया गया कि खुद सरकारी एजेंसी ने इसे अबतक मंजूरी नहीं दी है. दूसरी तरफ अमेरिका, ब्रिटेन और दूसरे सारे देशों में उन्हीं को ट्रायल में शामिल किया जा रहा है जो स्वेच्छा से आएं और सारी बातें जानने के बाबद भी ट्रायल का हिस्सा बने रहने को तैयार हों.

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चीनी कंपनियां पाकिस्तान से कर रही संपर्क
वैसे चीन में वैक्सीन ट्रायल के लिए लोग न मिलने की बात अप्रैल-मई में भी आ चुकी है. उसी वक्त पाकिस्तानी मीडिया ने बताया था कि  सिनोफार्म नाम की एक चीनी फार्मा कंपनी ने कोरोना वैक्सीन ट्रायल के लिए पाकिस्तान की हेल्थ मिनिस्ट्री से संपर्क किया था. पाकिस्तान के नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ हेल्थ से चीन ने कहा था कि अगर वो अपने लोगों को चीन की इस वैक्सीन के ट्रायल में हिस्सा बनाएगा तो चीन उसे वैक्सीन का श्रेय देगा. गंभीर पहलू ये है कि ये कंपनी भी WHO की उस लिस्ट में नहीं, जिसे वैक्सीन का मजबूत दावेदार माना जा रहा है. यही वजह है कि चीनी वैक्सीन को लेकर भी डर गहरा रहा है.
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