आज ही के दिन नगालैंड बना था भारत का 16वां राज्य, जानिए पूरी कहानी

पर्यटन के मामले में नगालैंड उत्तर-पूर्व के दूसरे राज्यों से कुछ पीछे ही है

साल 1960 में नगा लोगों ने एक सम्मलेन के जरिए कहा कि नगालैंड (Nagaland) को भारतीय संघ का हिस्सा होना चाहिए. अगले तीन सालों में ये देश का अभिन्न अंग बन गया.

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    भरपूर प्राकृतिक सौंदर्य के कारण पूर्व का स्विटजरलैंड (Switzerland of East) कहलाना वाले नगालैंड (Nagaland) राज्य के बारे में देश के ज्यादातर लोग कम ही जानते हैं. पर्यटन के मामले में भी ये उत्तर-पूर्व के दूसरे राज्यों से कुछ पीछे ही है. इसकी एक वजह यहां इनर लाइन परमिट का होना है, जो एक तरह से देश के भीतर ही आंतरिक वीजा की तरह काम करता है.

    नगालैंड का कोई लिखित इतिहास नहीं है. कुछ इतिहासकारों का कहना है कि यहां रहने वाली नागा जनजाति असम राज्य के तले रहा करती थी. साल 1816 में असम पर बर्मा का हमला हुआ और ये पूरा क्षेत्र उनके कब्जे में आ गया. ये साल 1826 तक चला, जब यहां ब्रिटिश कानून आया.

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    जनजातियों का ये राज्य हमेशा से ही अपनी अलग पहचान को लेकर काफी सचेत रहा. यहां तक कि साल 1929 में साइमन कमीशन के सामने भी नगाओं ने अपनी अलग पहचान की बात की थी. ये मांग भीतर ही भीतर सिर उठाती रही और देश की आजादी के समय ही नगाओं ने भी नगालैंड को आजाद घोषित कर दिया. नगा नेशनल काउंसिल की इसमें बड़ी भूमिका थी.

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    जनजातियों का ये राज्य हमेशा से ही अपनी अलग पहचान को लेकर काफी सचेत रहा- सांकेतिक फोटो


    हालांकि इसमें भी कई खेमे हो गए और नगालैंड में उथल-पुथल होने लगी. आखिरकार साल 1957 में वहां स्थानीय नेताओं और केंद्र सरकार में सहमति बनी और इस तरह से होते-होते साल 1960 में इस बात को पक्का कर लिया गया कि नगालैंड को देश का हिस्सा होना चाहिए. अगले तीन सालों में ये हो भी गया. साल 1963 में के 1 दिसंबर को यहां कोहिमा को राज्य की राजधानी माना गया.

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    हालांकि अब भी यहां अलगाववादी ताकतें पल रही हैं, जो देश के आंतरिक नक्शे में कई बदलाव चाहती हैं. लेकिन इसके बाद भी नगा जनजाति देश का अभिन्न हिस्सा हो चुकी है. यहां कुल 16 बड़ी जनजातियां हैं, जिनकी मान्यताएं और परंपरा एक-दूसरे से एकदम अलग हैं, फिर बाकी देश की तो बात ही क्या कहें. नगालैंड में ज्यादातर लोग ईसाई धर्म के मानने वाले हैं. इसके बाद ज्यादातर लोग हिन्दू और इस्लाम धर्म के मानने वाले रहते हैं.

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    इस राज्य में प्रवेश और घूमने के लिए पर्यटकों को एक खास परमिट जारी होता है, जिसे Inner Line Permit कहते हैं. ये परमिट सैलानियों को एक निश्चित अवधि के लिए अपने राज्य में रहने की इजाजत देता है. आमतौर पर ये अवधि अधिकतम 90 दिनों की होती है. इसके बाद परमिट को वैध कारणों के साथ रिन्यू करवाया जा सकता है.

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    ऐसा राज्य की मूल संस्कृति और पर्यावरण को बचाने के लिए किया गया है. ये एक तरह का वीजा है, जो न केवल विदेशियों, बल्कि भारतीयों को भी नगालैंड जाने पर लेना होता है. नगालैंड की राजधानी कोहिमा के लिए ये परमिट नहीं चाहिए, लेकिन दीमापुर या दूसरे प्रांतों में जाने के लिए परमिट चाहिए होता है. नगालैंड के अलावा अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम और मणिपुर में भी इनर लाइन परमिट की जरूरत पड़ती है.

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    नगालैंड में प्रवेश और घूमने के लिए पर्यटकों को एक खास परमिट जारी होता है- सांकेतिक फोटो


    बीच-बीच में इनर लाइन परमिट पर भी काफी विवाद होता रहता है. जैसे नगा जनजातियों को बाहरी संस्कृति से बचाने के लिए इस परमिट की अनुमित मिली थी. हालांकि अब नगालैंड में जनजातीय संस्कृति की जगह ईसाई संस्कृति आ चुकी है. ऐसे में बहुत से लोग परमिट को गैर-जरूरी मानते हैं और इसे खत्म करने की बात करते हैं.

    देश के दूसरे हिस्सों की तरह आने-जाने में उतना सुगम न होने के कारण ये राज्य कई अलग तरह की बातों के कारण चर्चा में आता रहता है. जैसे इसी साल जुलाई में यहां डॉग मीट पर प्रतिबंध लगाया गया. ये कदम एक वीडियो वायरल होने के बाद जांच के बाद लिया गया, जिसमें कुत्तों को बेरहमी से मारा जा रहा था. बता दें कि डॉग मीट नगालैंड के कई समुदायों का पसंदीदा आहार है.

    नगालैंड के कुछ समुदाय दवाओं में कुत्ते के मांस का इस्तेमाल करते हैं. इससे पहले मार्च महीने में मिजोरम में भी कुत्तों के मीट पर प्रतिबंध लगा दिया गया था. अब गुवाहाटी हाईकोर्ट की कोहिमा शाखा ने ये पाबंदी हटा ली है. पाबंदी के दौरान लोगों ने कोर्ट के फैसले को खान-पान के अधिकार में हस्तक्षेप मानते हुए खासा विरोध किया था.

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