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रंजन गोगोई से पहले ये पूर्व सीजेआई भी राज्‍यसभा के लिए किए जा चुके हैं नामित

News18Hindi
Updated: March 17, 2020, 1:03 PM IST
रंजन गोगोई से पहले ये पूर्व सीजेआई भी राज्‍यसभा के लिए किए जा चुके हैं नामित
पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई को राज्‍यसभा के लिए नामित किए जाने पर कांग्रेस समेत विपक्ष के कई नेता सवाल खड़े कर रहे हैं.

राष्‍ट्रपति रामनाथ कोविंद (Ramnath Kovind) ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्‍य न्‍यायाधीश रंजन गोगोई (Former CJI Ranjan Gogoi) को राज्‍यसभा के लिए नामित कर दिया है. इस पर सियासी बवाल खड़ा हो गया है. कांग्रेस (Congress) समेत विपक्ष गोगोई को नामित किए जाने पर सवाल खड़े कर रहा है. हालांकि, कांग्रेस भी एक पूर्व सीजेआई और सुप्रीम कोर्ट के एक पूर्व जज को अपने टिकट पर राज्‍यसभा (Rajya Sabha) भेज चुकी है.

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  • Last Updated: March 17, 2020, 1:03 PM IST
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नई दिल्‍ली. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व मुख्‍य न्‍यायाधीश रंजन गोगोई (Former CJI Ranjan Gogoi) को राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द (Ramnath Kovind) ने संसद के उच्‍च सदन राज्यसभा (Rajya Sabha) के लिये नामित कर दिया. इस पर कांग्रेस (Congress) समेत विपक्ष के कई नेताओं ने सवाल खड़े किए हैं. यहां तक कि उनके पूर्व सहयोगी रिटायर्ड जस्टिस मदन बी. लोकुर ने भी सख्‍त टिप्‍पणी कर डाली है. हालांकि, राष्ट्रपति की ओर से पूर्व सीजेआई गोगोई को राज्‍यसभा के लिए नामित करने को गलत बताने वाली कांग्रेस भी पूर्व सीजेआई रंगनाथ मिश्र (Justice Rangnath Mishra),  मोहम्मद हिदायतुल्ला और सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस बहरुल इस्‍लाम (Justice Bahrul Islam) को उच्‍च सदन भेज चुकी है. इस बारे में कानून के जानकारों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट के किसी भी जज को राज्‍यसभा भेजा जा सकता है. इसमें कोई भी कानून अड़चन नहीं बनता है.

पूर्व सीजेआई के अन्‍य क्षेत्रों में पद लेने पर कानूनी प्रतिबंध नहीं
सुप्रीम कोर्ट में वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता विराग गुप्‍ता (Virag Gupta) ने बताया कि पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई को संविधान के अनुच्छेद-80 (Article-80) के तहत राज्यसभा में राष्ट्रपति की ओर से नामित किया गया है. इसके पहले सुप्रीम कोर्ट के पूर्व सीजेआई रंगनाथ मिश्रा कांग्रेस के टिकट पर 1998 में राज्यसभा के सदस्य बने थे. वह 2004 तक उच्‍च सदन में रहे. सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस सदाशिवम रिटायरमेंट के बाद केरल (Kerala) के गवर्नर बनाए गए थे. संविधान के अनुसार सुप्रीम कोर्ट के जज रिटायरमेंट के बाद भारत की किसी भी अदालत में वकालत नहीं कर सकते. लेकिन, अन्य क्षेत्रों में पद लेने में कोई कानूनी प्रतिबंध नहीं है.

सामान्‍य तौर पर रिटायरमेंट के बाद दो साल की रहती है पाबंदी



वरिष्‍ठ अधिवक्‍ता गुप्‍ता ने बताया कि संविधान के अनुच्छेद-80(3) के तहत साहित्य (Literature), विज्ञान (science), कला (Art), समाज के विभिन्‍न क्षेत्रों में विशेष योगदान देने वाले लोगों को राज्यसभा सदस्यता के लिए नामित (Nominate) किया जा सकता है. इसमें विधि विशेषज्ञों (Law Experts) को भी शामिल किया जाता है. इसके पहले फली नरीमन, के. पाराशरन और केटीएस तुलसी को राष्ट्रपति ने नामित किया था. हालांकि, महत्वपूर्ण सरकारी पदों पर रहे लोगों को रिटायरमेंट के बाद 2 साल तक कोई दूसरा पद लेने में सामान्य तौर पर प्रतिबंध रहता है. अगर इस लिहाज से देखें तो उनको नामित करने में थोड़ी जल्‍दबाजी हो गई है.



पूर्व सीजेआई रंगनाथ मिश्र कांग्रेस के टिकट पर ओडिशा से निर्वाचित होकर राज्‍यसभा पहुंचे थे.


समाज में योगदान देने वाले नियम का दायरा बहुत बड़ा: सुभाष कश्‍यप
गुप्‍ता ने कहा कि जजों के रिटायरमेंट के बाद कोई पद लेने पर नैतिक सवाल भी उठाए जाते हैं. हालांकि, इस बारे में कोई कानून नहीं है. इसलिए पूर्व सीजेआई गोगोई का राज्यसभा सदस्य के नामांकन में किसी प्रकार की संवैधानिक विसंगति नहीं हैं. वहीं, कानूनविद् डॉ. सुभाष कश्‍यप (Dr. Subhash Kashyap) का कहना है कि संविधान के अनुच्‍छेद-80(3) के तहत समाज के विभिन्‍न क्षेत्रों में विशेष योगदान देने वाले लोगों का दायरा बहुत बड़ा है. विधि विशेषज्ञ या कहें विधि क्षेत्र से जुड़े लोग इसी दायरे में आते हैं. वह कहते हैं कि पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई को नामित किए जाने में किसी तरह की कानूनी अड़चन नहीं है.

सिख दंगों के जांच आयोग के अध्‍यक्ष रहे थे पूर्व सीजेआई रंगनाथ मिश्र
पूर्व सीजेआई रंजन गोगोई से पहले राज्‍यसभा सदस्‍य रहे पूर्व मुख्‍य न्‍यायाधीश रंगनाथ मिश्र और पूर्व जज बहरुल इस्‍लाम में अंतर सिर्फ इतना है कि गोगोई जहां नामित सदस्य के तौर पर उच्‍च के सदस्य बने हैं, वहीं बाकी दोनों जज कांग्रेस के टिकट पर संसद पहुंचे थे. जस्टिस रंगनाथ मिश्र सितंबर, 1990 से नवंबर, 1991 तक भारत के 21वें मुख्य न्यायाधीश रहे. सीजेआई पद से रिटायर होने के करीब सात साल बाद वह राज्यसभा सांसद बने थे. कांग्रेस के टिकट पर 1998 में मिश्र अपने गृह प्रदेश ओडिशा से राज्यसभा के लिए निर्वाचित हुए. मिश्र राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पहले अध्यक्ष भी रहे. रंगनाथ मिश्र 1990 में सीजेआई बनने से पहले 1984 के सिख दंगे की जांच के लिए गठित एक सदस्यीय आयोग के चेयरमैन भी थे.

सुप्रीम कोर्ट के जज से 1983 में रिटायरमेंट के तुरंत बाद कांग्रेस ने जस्टिस बहरुल इस्‍लाम को तीसरी बार राज्यसभा भेजा था.


कांग्रेस ने जस्टिस बहरुल इस्‍लाम को तीन बार भेजा था राज्‍यसभा
जस्टिस बहरुल इस्लाम जब सुप्रीम कोर्ट में वकालत करते थे तब उन्हें 1962 में पहली बार असम (Asam) से कांग्रेस पार्टी ने राज्यसभा भेजा. उन्‍हें दूसरी बार 1968 में फिर राज्यसभा भेजा गया, लेकिन छह साल का कार्यकाल पूरा करने के पहले ही उन्हें तब के असम और नगालैंड हाईकोर्ट (आज के गुवाहाटी हाईकोर्ट) का जज बनाया गया. जज बनते ही उन्होंने राज्यसभा से इस्तीफा दे दिया था. सुप्रीम कोर्ट के जज से 1983 में रिटायरमेंट के तुरंत बाद उन्हें तीसरी बार कांग्रेस ने राज्यसभा भेजा. वहीं, 1968 से 1970 तक भारत के मुख्य न्यायाधीश रहे मोहम्मद हिदायतुल्ला को 31 अगस्त, 1979 को उपराष्ट्रपति बनाया गया. वह 30 अगस्त, 1984 तक भारत के उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के पदेन सभापति रहे. वह दो बार भारत के कार्यवाहक राष्ट्रपति भी बने.

गोगोई ने राममंदिर और सबरीमाला मंदिर पर सुनाया था फैसला 
केंद्र सरकार की ओर से जारी अधिसूचना में कहा गया है कि अनुच्छेद-80 के खंड (1) के उपखंड (A), जिसे उस अनुच्छेद के खंड (3) के साथ पढ़ाने पर मिली शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को रंजन गोगोई को राज्यसभा में एक सदस्य का कार्यकाल समाप्त होने से खाली हुई सीट पर मनोनीत करते हुए प्रसन्नता हो रही है. बता दें कि यह सीट केटीएस तुलसी के राज्यसभा का कार्यकाल पूरा होने से खाली हुई थी. गोगोई ने उस पांच जजों की बेंच का नेतृत्व किया, जिसने 9 नवंबर, 2019 को संवेदनशील अयोध्या मामले पर फैसला सुनाया था. वह उसी महीने सेवानिवृत्त हो गए थे. पूर्व सीआई गोगोई ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश और राफेल लड़ाकू विमान सौदे संबंधी मामलों पर फैसला देने वाली बेंच का भी नेतृत्व किया था.

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First published: March 17, 2020, 12:39 PM IST
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