पुण्यतिथि विशेष: किसानों की सशक्त आवाज बन गए थे चौधरी चरण सिंह

चौधरी चरण सिंह (Chaudhary Charan Singh) के राजनैतिक जीवन में कितने ही उतार चढ़ाव आए हों, लेकिन किसानों में उनकी लोकप्रियता कभी कम नहीं हुई. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

चौधरी चरण सिंह (Chaudhary Charan Singh) के राजनैतिक जीवन में कितने ही उतार चढ़ाव आए हों, लेकिन किसानों में उनकी लोकप्रियता कभी कम नहीं हुई. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

भारत के पांचवे प्रधानमंत्री (Former Prime Minister) चौधरी चरण सिंह (Chaudhary Charan Singh) को आज भी किसानों (Farmers) का मसीहा माना जाता है.

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इस समय देश में काफी समय से किसान (Farmer) आंदोलन चल रहा है. इस बात पर अभी तक बहस चल रही है कि कोरोना काल में भी इसके जारी रहने का क्या औचित्य है. जब भी देश में किसानों को लेकर कोई आवाज उठती है तो उसके आंदोलन का रूप लेने से पहले ही चौधरी चरण सिंह (Chaudhary Charan Singh) का नाम आता है और आता रहता है. देश भारत के पांचवे प्रधानमंत्री के 24वीं पुण्यतिथि (Chaudhary Charan Singh Death Anniversary) के मौके पर उन्हें याद कर रहा है.

स्वतंत्रता आंदोलन में

चौधरी चरण सिंह का जन्म  23 दिसंबर 1902 में मेरठ के  हापुड़ में नूरपुर गांव में जाट परिवार में हुआ था. वैसे तो करियर के तौर शुरुआत उन्होंने वकालत से की  लेकिन गांधी जी के स्वतंत्रता आंदोलन में ही भाग लेते हुए वे राजनीति में प्रवेश कर गए थे. वे आजादी से पहले देश के लिए दो बार जेल भी गए. 1937 के चुनावों में यूनाइटेड प्रोविंस की लेजिस्लेटिव एसेंबली के सदस्य भी रहे थे.

आजादी से पहले ही किसानों के लिए
वैसे तो चरण सिंह के राजनैतिक जीवन का जब जिक्र होता है तो आपात काल के बाद के समय का होता है, लेकिन वे बहुत पहले ही किसानों की आवाज बन चुके थे. देश की आजादी के पहले ही वे जमीदारों के किसान मजूदरों के उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाते रहे थे. वे किसानों कि समस्याएं सुन कर बहुत द्रवित हो जाया करते थे और कानून के ज्ञान का उपयोग वे किसानों की भलाई के करते दिखाई देते रहे थे.

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चौधरी चरण सिंह (Chaudhary Charan Singh) भारत के एकमात्र ऐसे प्रधानमंत्री हैं जिन्होंने अपने कार्यकाल में संसद का सामना नहीं किया था. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

आजादी के बाद कांग्रेस के साथ



1951 में वे उत्तर प्रदेश कैबिनेट में न्याय एवं सूचना मंत्री बने. इसके बाद वे 1967 तक राज्य कांग्रेस के अग्रिम पंक्ति के तीन प्रमुख नेताओं में गिने जाते रहे. और भूमि सुधार कानूनों के लिए काम करते रहे. किसानों के लिए उन्होंने 1959 के नागपुर कांग्रेस अधिवेशन में पंडित नेहरू तक का विरोध करने से गुरेज नहीं किया. इस समय तक ने उत्तर भारत के किसानों के आवाज बन चुके थे.

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जनता घटक से भी मिली निराशा

चौधरी चरण सिंह ने साल 1967 में कांग्रेस से खुद को अलग कर लिया और वे उत्तर प्रदेश के पहले गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने. भारतीय लोकदल के नेता के तौर पर वे जनता गठबंधन से जुड़े जिसमें उनका दल सबसे बड़ा घटक था. लेकिन राजनैतिक जानकार बताते हैं कि 1974 से वे गठबंधन में अलग थलग हो गए थे और जयप्रकाश नारायण ने जब मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री चुना तो वे बहुत निराश हुए. और फिर जब 1979 में प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्हें कांग्रेस के समर्थन वापस लेने से इस्तीफा देना पड़ा.

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चौधरी चरण सिंह (Chaudhary Charan Singh) की विरासत संभालने वाले उनके बेटे चौधरी अजीत सिंह का इसी महीने निधन हो गया था.

अंत तक किसानों की आवाज

कहा यह भी जाता है कि चौधरी चरण सिंह का कांग्रेस के समर्थन के साथ प्रधानमंत्री बनना उनकी छवि को धूमिल कर गया था, लेकिन ज्यादातर लोग यही मानते हैं चरणसिंह हमेशा ही अपने क्षेत्रों के लोकप्रिय नेता हमेशा ही बने रहे और उन्होंने अपनी वह जमीन कभी नहीं छोड़ी. यही वजह से कि उनके इस्तीफे के बाद भी वे 1987 तक लोकसभा में लोकदल का प्रतिनिधित्व करते रहे और किसानों के हक की आवाज बने रहे.

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ऐसे बहुत से किस्से हैं जो बताते हैं कि चौधरी चरण सिंह का प्रभाव किसानों से लेकर राजनीति के ऊंचे स्तर तक रहा करता था. उनके प्रभाव की सबसे बड़ी मिसाल यही है कि उन्हें आज भी किसानों को मसीहा माना जाता है. अंग्रेजों से कर्ज माफी का बिल पास करवाना, किसानों के खेतों की नीलामी रुकवाना, गावों के विद्युतिकरण, भूमि कानून सुधारों के लिए संघर्ष जैसे कई काम किए. उन्होंने किसानों के खातिर पुरानी पार्टी छोड़ी और कांग्रेस के समर्थन से सरकार तक बनाने के काम क लिए, लेकिन उनकी लोकप्रियता में कभी कमी नहीं आई.

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