जानिए, किन-किन देशों में दिया जाता है स्कूली बच्चों को मुफ्त भोजन

भारत में स्कूली बच्चों के लिए मिड-डे मील की व्यवस्था है सांकेतिक फोटो (pxhere)
भारत में स्कूली बच्चों के लिए मिड-डे मील की व्यवस्था है सांकेतिक फोटो (pxhere)

अस्सी के दशक में ब्रिटिश स्कूलों में फ्री भोजन (free school meal in British schools) के नाम पर चिप्स और जंक फूड दिया जाने लगा. साल 2005 में वहां हुए आम चुनाव में ये सबसे बड़ा मुद्दा रहा.

  • News18Hindi
  • Last Updated: October 25, 2020, 3:07 PM IST
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ब्रिटेन में भारतीय मूल के चांसलर ऋषि सुनक (Rishi Sunak) को उन्हीं के क्षेत्र के एक नामी-गिरामी रेस्तरां ने जीवनभर के लिए बैन कर दिया. दरअसल ऋषि सुनक ने कोरोना वायरस के दौरान बंद स्कूलों के बच्चों को मुफ्त लंच (Free school meal) दिए जाने का विरोध किया था. इसपर रेस्तरां भड़क उठा और सुनक को प्रतिबंधित कर दिया. वैसे स्कूल-मील दुनिया के बहुत से देशों में बड़ा ही लोकप्रिय कंसेप्ट है.

क्या किया ऋषि सुनक ने 
सबसे पहले तो फिलहाल का मामला देखते हैं. कोरोना के कारण ब्रिटिश स्कूल भी बंद चल रहे हैं. ऐसे में बच्चों के लिए अस्थायी मुफ्त लंच की व्यवस्था को लेकर लगातार बात हो रही है. इसी मामले में हाउस ऑफ कामंस में मतदान हुआ. इसपर कंजर्वेटिव पार्टी के नेता ऋषि सुनक ने मुफ्त मील के विरोध में वोट दिया. इसके बाद से मामला सुर्खियों में है. बहुत से लोग आमतौर पर शांत और मददगार सुनक पर भड़के हुए हैं. इसी कड़ी में सुनक के इलाके के बड़े रेस्तरां और पब आइवन मुलिनो ने मुफ्त खाने के खिलाफ वोट करने के कारण सुनक समेत चार और सांसदों को अपने यहां प्रतिबंधित कर दिया.

ब्रिटेन में भारतीय मूल के चांसलर ऋषि सुनक

यहां से हुई फ्री लंच की आधिकारिक शुरुआत


जिस तरह से भारत में स्कूली बच्चों के लिए मिड-डे मील की व्यवस्था है, वैसे ही दुनिया के कई देश भी अपने स्कूलों में फ्री लंच का बंदोबस्त किए हुए हैं. सबसे पहले स्कूली बच्चों को भोजन साल 1790 में म्यूनिच, जर्मनी में दिया गया था. बैंजामिन थॉम्पसन नामक अमेरिकी मूल के शख्स ने इसकी शुरुआत की थी. बाद में स्कूल के बच्चों से ये दायरा बढ़ते हुए वयस्कों तक पहुंच गया. और सूप किचन के नाम से यही शख्स एक दिन में लगभग 60 हजार लोगों तक मुफ्त भोजन पहुंचाने लगा.

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इन देशों में कम आयु वाले घरों से आए बच्चों को लंच 
अब स्वीडन, फिनलैंड, एस्टॉनिया और भारत में स्कूली बच्चों के लिए पूरी तरह से मुफ्त लंच की व्यवस्था है. भारत के सरकारी स्कूलों में जहां ये हर आयु वर्ग के बच्चों के लिए है, वहीं हाई-इन्कम देशों में मील उन बच्चों को ही दिया जाता है, जो कम आयु वर्ग वाली श्रेणी से हों.

स्वीडन, फिनलैंड, एस्टॉनिया स्कूली बच्चों के लिए पूरी तरह से मुफ्त लंच की व्यवस्था है- सांकेतिक फोटो (pickpik)


अमेरिका में काफी लोकप्रिय है फ्री लंच 
अमेरिका में भी स्कूल में मुफ्त भोजन की व्यवस्था चली आ रही है. बेहद विकसित देश होने के बाद भी यहां स्कूल मील की शुरुआत के बाद ये देखा गया कि स्कूल आने वाले बच्चों का आंकड़ा तेजी से बढ़ा और अनुपस्थिति की दर कम हुई. माना जा रहा है कि आमतौर पर दोनों ही वर्किंग पेरेंट्स के होने के कारण स्कूल मील प्रोग्राम खासतौर पर मददगार साबित हुआ है. हालांकि यहां लंच टाइम को लेकर विवाद होता रहा है कि इसे औसतन कितना लंबा होना चाहिए.

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रेड्यूस्ड प्राइस मील स्कीम
फ्री स्कूल-मील की ही तर्ज पर कई विकसित देशों में एक प्रोग्राम चलता है, जिसके तहत खाने की कीमत घटाकर दी जाती है. इसे रेड्यूस्ड प्राइस मील कहते हैं. ये प्रोग्राम फ्रांस, इटली, हांगकांग और जापान में चलाया जा रहा है. इसमें कम आय वाले घरों से आए बच्चों को स्कूल में ही ऊंची गुणवत्ता लेकिन कम कीमत वाला खाना खिलाया जाता है.

रेड्यूस्ड प्राइस मील प्रोग्राम फ्रांस, इटली, हांगकांग और जापान में चलाया जा रहा है- सांकेतिक फोटो (pikist)


इस देश में फल और दूध मिलता है 
नॉर्वे के स्कूलों में फ्री लंच का इतिहास काफी पुराना है. यहां पड़ोसी देश स्वीडन की मदद से दूसरे विश्व युद्ध के दौरान स्कूलों में लंच कराया जाता था. दोनों देशों के अमीर इसमें योगदान देते थे. युद्ध के बाद ये बंद हो गया. साल 2007 में नॉर्वे में सारे स्कूली बच्चों को रोज एक मौसमी फल मुफ्त देने का नियम बना. साथ ही यहां के स्कूलों में दूध काफी कम कीमत पर दिया जाता है.

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यूके में साल 1947 से शुरू हुआ मुफ्त भोजन 
ब्रिटेन में स्कूल जाने वाले बच्चों के लिए मुफ्त खाना Education (Provision of Meals) Act 1906 स्कीम के तहत दिया जाता है. साल 1947 से शुरू इस स्कीम के तहत पहले केवल गरीब घरों से आए बच्चों को निःशुक्ल भोजन दिया जाता था. हालांकि पूरी तरह से सरकारी व्यवस्था शुरुआत में तो खूब बढ़िया चली लेकिन कुछ सालों बाद इसमें गिरावट आने लगी. यहां तक कि बच्चों को लंच या डिनर में जंक फूड जैसे चिप्स, पिज्जा मिलने लगी. इसे लेकर ब्रिटेन में काफी विवाद हुआ, जिसके बाद School Food Trust बना और खाने की गुणवत्ता में सुधार हुआ.
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