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Analysis: अराजकतावादी से हरदिल अज़ीज़ मुख्यमंत्री तक, अब सब पर भारी हैं केजरीवाल

News18Hindi
Updated: February 11, 2020, 12:08 PM IST
Analysis: अराजकतावादी से हरदिल अज़ीज़ मुख्यमंत्री तक, अब सब पर भारी हैं केजरीवाल
आप’ ने अपने 15 मौजूदा विधायकों के टिकट काट दिए थे

एक समय खुद को अराजकतावादी (Anarchist) बताने वाले अरविंद केजरीवाल (Arvind Kejriwal) अब एक परिपक्व राजनेता (Mature Politician) दिखाई देते हैं. वो केंद्र सरकार से टकराहट की बजाए दिल्ली के विकास को मुद्दा बनाते हैं.

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  • Last Updated: February 11, 2020, 12:08 PM IST
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दिल्ली विधानसभा चुनाव (Delhi Assembly Election 2020) के लिए मतदान प्रक्रिया समाप्त होने के साथ ही सभी एक्जिट पोल में आम आदमी पार्टी की प्रचंड बहुमत से सरकार बनती बताई जा रही है. एक वह भी समय था जब अरविंद केजरीवाल ने अपनी मुट्ठी हवा में लहराकर कहा था कि वो अराजकतावादी हैं. उनके इस बयान को लेकर कांग्रेस और बीजेपी की तरफ से खूब मुद्दा भी बनाया गया था, लेकिन सीएम के तौर पर दिल्ली की जनता से वादे निभाने के जज़्बे ने अब अरविंद केजरीवाल को हरदिल अज़ीज़ मुख्यमंत्री बना दिया है. अब जैसे-जैसे ईवीएम का पिटारा खुल रहा है, ये तय होता जा रहा है कि अरविंद केजरीवाल एक फिर सीएम की गद्दी पर काबिज होंगे.

कैसे बदली छवि
विधानसभा चुनाव प्रचार के दौरान अरविंद केजरीवाल ने लगातार अपना फोकस 5 साल में किए गए कामों पर फोकस रखा. हालांकि 2015 में मुख्यमंत्री बनने के बाद अरविंद केजरीवाल की छवि एक विरोध करने वाले सीएम की बन गई थी, जो हर बात पर पीएम पर निशाना साधता था या फिर केंद्र सरकार पर दोष मढ़ता था. उनकी इस छवि को लेकर दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री शीला दीक्षित ने भी बयान दिया था. उन्होंने कहा था कि 'मैं भी राज्य की 15 सालों तक मुख्यमंत्री रही हूं, लेकिन कभी केंद्र के साथ लड़ने जैसे नौबत नहीं आई.'

हालांकि अगर हम 2020 के अरविंद केजरीवाल की बात करें तो वो बिल्कुल नए अवतार में दिखे. शांत, परिपक्व, फोकस राजनीतिज्ञ जो सिर्फ अपने कार्यकाल में किए गए कामों पर बात करता है. जो अपने पांच साल के रिपोर्टकार्ड को दिखाते हुए आगे के लिए वादे करता है. हर समय अपनी गवर्नेंस स्टाइल को लोगों के बीच मुद्दा बनाता है. साथ ही जो एक बात उन्हें सबसे अलग बनाती है वो है विवादित बयानबाजी से दूर रहना.

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नरेंद्र मोदी के खिलाफ लड़ा था चुनाव
जो अरविंद केजरीवाल पहले ओवर कॉन्फिंडेंट दिखते थे, वही अब फोकस्ड दिखते हैं. शायद यही कारण है कि अरविंद केजरीवाल 2014 में वाराणसी चुनाव लड़ने चले गए और बुरी हार का सामना किया था. इसके बाद पंजाब में भी उन्हें वैसी सफलता नहीं मिली जैसा वो सोचते थे. 2014 में तो उनकी पार्टी ने पूरे देश में जमानत जब्त करवाने का रिकॉर्ड बनाया. लेकिन 2020 में अरविंद केजरीवाल पूरी तरह दिल्ली पर फोकस दिखाई दिए. अब वो समझ चुके हैं दिल्ली के लोग उनकी राजनीति को समझने लगे हैं. और शायद यही कारण है कि अरविंद केजरीवाल रिकॉर्ड जीत दर्ज करते दिख रहे हैं.

कब आया परिवर्तन
अरविंद केजरीवाल के भीतर यह परिवर्तन पिछले करीब डेढ़ सालों से दिखाई दे रहा है. करीब डेढ़ सालों से वो सीधे पीएम मोदी पर निशाने साधने के बजाए विकास कार्यों पर ध्यान दे रहे हैं. दिलचस्प रूप से इस दौरान कई बार केजरीवाल का एप्रोच केंद्र सरकार के रुख के साथ ही दिखाई दिया. उन्होंने मोदी सरकार के कई निर्णयों का खुलकर समर्थन किया.

पूरे साल 2019 के दौरान केजरीवाल बालाकोट स्ट्राइक, आर्टिकल 370 के अंत, रामजन्म भूमि पर फैसले जैसे अन्य मुद्दों पर केंद्र सरकार के साथ दिखाई दिए. वहीं जेएनयू फीसवृद्धि विवाद और सीएए पर उन्होंने तकरीबन दूरी बनाए रखी. यहां तक कि चुनाव प्रचार के दौरान भी दिल्ली में चल रहे शाहीनबाग प्रदर्शन को लेकर अरविंद केजरीवाल कोई खास उत्साहित नजर नहीं आए.

File picture of Odisha CM and BJD president Naveen Patnaik.
नवीन पटनायक की फाइल फोटो


अरविंद केजरीवाल की यह रणनीति कुछ-कुछ उडीशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक से मेल खाती है. पटनायक ने ऑनरिकॉर्ड कहा है कि वो केंद्र सरकार के साथ मिलकर अपने राज्य की भलाई के लिए काम करेंगे. इस एटिट्यूड की वजह से उन्हें केंद्र से बेहतर फंड भी मिलते हैं और राज्य के विकास कार्यों में कोई रोक भी नहीं आती है.

एक समय पीएम मोदी के आलोचक के रूप में ममता बनर्जी, चंद्रबाबू नायडू और कांग्रेस के साथ दिखाई दे रहे अरविंद केजरीवाल ने पिछले डेढ़ सालों में दूरी बनाई है. हाल में एक इंटरव्यू में उनसे पूछा गया कि क्या पीएम मोदी से डरते हैं? तो उनका जवाब था-नहीं, वो पीएम के तौर पर देश के लिए काम कर रहे हैं और मैं सीएम के तौर पर दिल्ली के लिए.

AAP का नारा 'अच्छे बीते 5 साल, लगे रहो केजरीवाल' (फाइल फोटो)


शायद यही कारण है कि एक समय खुद को अराजकतावादी बताने वाले अरविंद केजरीवाल ने चुनाव प्रचार के दौरान खुद हनुमान भक्त बताया. वो राजनीतिक दांवपेच के महारथी हो चुके हैं. सबसे बड़ी बात उन्होंने ये समझ लिया है कि उनका प्लेइंग ग्राउंड कहा हैं, उन्हें कहां फोकस करना है और कहां नहीं.

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First published: February 11, 2020, 11:12 AM IST
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