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केरल से राजस्थान तक-कांग्रेस में हर जगह असंतोष और सिर फुटव्वल क्यों

कांग्रेस में फिलहाल केंद्रीय नेतृत्व के स्तर पर दिशाहीनता की स्थिति है, जिसका असर राज्यों में भी पड़ने लगा है.

कांग्रेस में फिलहाल केंद्रीय नेतृत्व के स्तर पर दिशाहीनता की स्थिति है, जिसका असर राज्यों में भी पड़ने लगा है.

कांग्रेस (Congress) वर्ष 2014 से केंद्र की सत्ता में नहीं है. इसका असर धीरे धीरे पार्टी पर भी नजर आने लगा है. पार्टी नेतृत्व तदर्थ तरीके से चल रहा है. दो साल से कोई अध्यक्ष नहीं है. तकरीबन हर राज्य में कांग्रेस आपसी गुटबाजी और कलह में उलझी है. हाईकमान इस असंतोष को दूर करने में खुद को लाचार पा रहा है.

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केरल कांग्रेस में फिर असंतोष गहरा गया है. नए और पुराने नेताओं के बीच सिरफुटव्वल तेज है. माना जा रहा है कि वहां लड़ाई कांग्रेस के पुराने नेताओं और राहुल गांधी के विश्वसत लोगों के बीच है. कांग्रेस कुछ राज्यों में सत्ता में है लेकिन ज्यादातर राज्यों में विपक्ष में है लेकिन तकरीबन हर राज्य से कांग्रेस में गहराते अंसतोष और बगावती तेवरों से सुर आ रहे हैं. बहुत से कांग्रेसी लगातार पाला बदल रहे हैं. देश की सबसे पुरानी पार्टी आखिर क्यों सूबों में आपस में ही विवाद को सुलझाने में नाकाम हो रही है. क्यों राज्यों की लगातार होती उठापटक पर हाईकमान की पकड़ कमजोर पड़ रही है.

135 साल पुरानी कांग्रेस की पकड़ होने के अपने कई कारण हैं. पार्टी अगर करीब दो साल से बगैर नियमित अध्यक्ष के तौर पर काम चला रही है तो कांग्रेस गांधी परिवार के खिलाफ अंसंतोष को स्पष्ट तौर पर मुखर करने वाला शीर्ष नेताओं का गुट भी पिछले दिनों उभर कर आया. ये बात सही है कि कांग्रेस का केंद्रीय नेतृत्व लंबे समय से सत्ता से दूर रहने की वजह से लक्ष्य विहीन लगने लगा है. पार्टी में पुराने नेताओं और नई पीढ़ी के बीच विरोध अब दबी छिपी बात नहीं रह गई है.

पार्टी का संगठन अगर कमजोर पड़ा है तो ग्रासरूट लेवल पर पार्टी गायब सी होती लग रही है. कई राज्यों और इलाकों में कांग्रेस को अपनी मौजूदगी का अहसास कराना तक मुश्किल हो रहा है. पार्टी में गांधी परिवार के खिलाफ असंतोष भी दिखता है लेकिन वो उनके बगैर काम भी नहीं चला सकती. कांग्रेस में तमाम पदों पर फिलहाल नोमिनेटेड स्टेटस वाले नेता ज्यादा हैं. शायद आजादी के बाद कांग्रेस पहली बार ऐसी लाचार स्थिति में नजर आ रही है. पार्टी कुल मिलाकर ऐसे मोड में है, जिसमें वो कभी नहीं रही.

नेतृत्व अगर कमजोर पड़ने लगे तो उसका असर फिर नीचे तक जाने लगता है. यही वजह है कि कांग्रेस को इन दिनों तमाम राज्यों में जबरदस्त अंतर्विरोध और अंसतोष का सामना करना पड़ रहा है. एक विरोध को किसी तरह दबाया जाता है तो दूसरा उभर आता है. कहा जाना चाहिए कि कांग्रेस के नेता मौजूदा स्थिति से क्षुब्ध हैं और लीडरशिप को लेकर खिन्न भी. कांग्रेस तमाम राज्यों में उभरे हुए विवाद और असंतोष को कैसे दूर करेगी, ये किसी को नहीं पता लेकिन हर राज्य में स्थितियां विकट जरूर हैं.

केरल में हालात विकट
केरल में ताजातरीन विवाद जिला कांग्रेस अध्यक्षों की लिस्ट को लेकर है. एक दो दिन पहले प्रदेश कांग्रेस ने 14 जिलाध्यक्षों की सूची जारी की. इसके बाद लट्ठबाजी की स्थिति आ गई. पार्टी के दो पुराने शीर्ष नेताओं ओमन चांडी और रमेश चेन्नीथला ने आरोप लगाया कि जिला के अध्यक्ष बनाने की प्रक्रिया से उन्हें दूर रखा गया. माना जा रहा है कि ये नियुक्तियां राहुल गांधी के करीबी और उनके द्वारा नियुक्त वीडी सैतीसन और के सुधाकरण ने की. हालांकि दोनों का कहना है कि प्रक्रिया पारदर्शी रही है. विरोध में केरल में इस्तीफे भी शुरू हो गए. 50 सालों से कांग्रेस के साथ रहे सीनियर लीडर एवी गोपीनाथ कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया. ऐसा लग रहा है कि केरल में नए और पुराने कांग्रेसी नेताओं के बीच तलवार भांजने का काम तेज हो गया है. दो ग्रुप बन चुके हैं.

केरल कांग्रेस में जिलाध्यक्षों की नियुक्ति की सूची घोषित आने के बाद पार्टी के पुराने नेताओं और राहुल के खास नेताओं के बीच टकराव शुरू हो गया है.

कर्नाटक में सिद्धारमैया बनाम शिवकुमार
कर्नाटक में पहले से ही सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार के बीच वर्चस्व की लड़ाई चल रही है. हाल ये हो गया है कि कर्नाटक में कांग्रेस सत्ताधारी बीजेपी पर हमलावर होने की बजाए आपस में लड़ने लगी है. उसे ये फुरसत ही नहीं है कि सत्ताधारी बीजेपी के खिलाफ मुद्दों पर मोर्चा खोले. दोनों नेता इस बात पर डटे हुए हैं कि अगले चुनावों में प्रदेश में सीएम चेहरा वही बनेंगे. ऐसा लग रहा है कि राज्य में करीब आते विधानसभा चुनावों में टिकट देने और फिर चुनाव में उतरने के बीच ये लड़ाई और गहराएगी.

महाराष्ट्र में राहुल के विश्वस्त नेताओं से टकराव
महाराष्ट्र में भी पुराने नेताओं और राहुल के विश्वस्त नेताओं के बीच तलवार खींची नजर आ रही है. हाल ही में राहुल ने नाना पटोले को महाराष्ट्र कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया. इसके बाद महाराष्ट्र के कांग्रेसी नेताओं और राज्य में कांग्रेस कोटे के मंत्रियों के साथ पटोले के टकराव की खबरें आने लगीं. पटोले की कार्यशैली से शिवसेना और एनसीपी भी नाखुश बताई जा रही हैं.
इस लड़ाई का असर मुंबई कांग्रेस में भी देखने को मिल रहा है. मुंबई में मुंबई रीजनल कांग्रेस कमेटी के चीफ भाई जगताप जो राहुल के खास हैं, से दूसरे नेताओं की ठनने की खबरें आ रही हैं. युवा कांग्रेस के अध्यक्ष सूरज ठाकुर ने उनके साथ मतभेद के बाद इस्तीफा दे दिया. ये सब तब हो रहा है जबकि मुंबई महापालिका के चुना्व सिर पर हैं.

गोवा में राहुल टीम के खिलाफ असंतोष
गोवा में कांग्रेस के राज का लंबा इतिहास रहा है. वहां उनके कई पूुर्व मुख्यमंत्री भी हैं और कई पूर्व प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष भी. लेकिन उनके बीच राहुल की टीम ने गिरीश चोदानकर, चंद्रकांत और चेल्लाकुमार (जिन्हें दिनेश गुंडुराव से रिप्लेश किया गया) को प्रदेश कांग्रेस कमेटी का चीफ बनाया. बस इसके खिलाफ सीनियर नेताओं और विधायकों ने इसके खिलाफ मोर्चा खोल दिया. हाल ही में गोवा के कई पुराने कांग्रेस नेता दिल्ली जाकर राहुल गांधी से मिल चुके हैं और राज्य की लीडरशिप में बदलाव की आवाज उठा चुके हैं.

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गोवा में राहुल की टीम ने प्रदेश कांग्रेस कमेटी में शीर्ष पर कुछ नेताओं को नियुक्त किया था, उनके खिलाफ भी असंतोष शुरू हो चुका है. गोवा के कांग्रेसी दिल्ली आकर शिकायत कर चुके हैं. (फाइल फोटो)

गुजरात में आतंरिक कलह बढ़ती जा रही है
ये वो राज्य है, जहां 04 साल पहले राहुल गांधी ने विधानसभा चुनाव लड़ने में एडीचोटी का जोर लगा दिया था. कांग्रेस ने वहां पहले से बेहतर प्रदर्शन तो जरूर किया लेकिन बीजेपी इसके बाद भी बाजी मार ले गई. तब राहुल ने वहां अपनी एक टीम खड़ी की. इस नई टीम से भी पुराने नेताओं की ठनी हुई है. गुजरात में कांग्रेस की आंतरिक कलह इतनी ज्यादा है कि लोकसभा चुनावों में इसका असर साफ नजर आया, जबकि विधानसभा चुना्वों में बेहतर प्रदर्शन के बावजूद कांग्रेस वहां कोई लोकसभा सीट नहीं जीत सकी. अब राज्य के कांग्रेसी नेताओं की लड़ाई और बढ़ गई है.

राजस्थान में भी असंतोष का आंच में कमी नहीं
राजस्थान में कुछ समय पहले किस तरह सचिन पायलट खुलकर अपने गुट के साथ सामने आ गए थे. उन्होंने मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के खिलाफ विद्रोह कर दिया. तब गहलोत ने जिस तरह सचिन के खिलाफ शब्दों का प्रयोग किया, उससे लोगों को हैरानी भी हुई, क्योंकि गहलोत हमेशा से कम शब्दों वाले और बोलचाल में परिष्कृत भाषा का इस्तेमाल करने वाले चतुर नेता समझे जाते रहे हैं. उस समय तो हाईकमान के समझाने बुझाने पर सचिन बनाम अशोक गहलोत की लड़ाई को रूकी जरूर लेकिन थमी नहीं. सचिन को अब तक गहलोत को प्रदेश की राजनीति या मंत्रिमंडल में जो सम्मानजनक स्थिति मिलनी चाहिए थी, वो नहीं मिली है. अंदर ही अंदर अपने तरीके से दोनों गुट एक दूसरे के खिलाफ टकराते रहते हैं. माना जा रहा है कि अगर कांग्रेस सचिन पायलट को समय रहते सम्मानजनक स्थिति नहीं देता है तो वहां फिर विद्रोह के हालात बन सकते हैं.

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अशोक गहलोत बनाम सचिन पायलट का विवाद अब भी थमा नहीं है. पर्दे के पीछे से जारी है.

पंजाब में सिद्ध बनाम अमरिंदर जारी 
पंजाब में पिछले दिनों जब मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह के खिलाफ बीजेपी से कांग्रेस में आए नवजोत सिंह सिद्धू ने मोर्चा खोला, उसे निपटाने में कांग्रेस हाईकमान को पसीने छूट गए. लेकिन इस पूरे विवाद में जिस तरह गांधी परिवार ने सिद्धू को पंजाब कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाया, उससे जाहिर हुआ कि वो आग में और घी ही डाल रहे हैं. सिद्धू अपनी बयानबाजी से जाहिर कर रहे हैं कि उन्हें काबू में करना किसी के वश में नहीं है. वो भविष्य में कांग्रेस के लिए सिरदर्द भी साबित हो सकते हैं. ऐसे में जबकि पंजाब में भी अगले साल चुनाव हैं, वहां कांग्रेस के दो गुटों में बंट जाने से अजीब स्थिति हो चुकी है. हालांकि वहां अकाली दल और बीजेपी भी कोई दमदार स्थिति में नहीं हैं. किसानों का गुस्सा भी केंद्र सरकार के खिलाफ ज्यादा है.

हरियाणा में दो गुट
हरियाणा में कांग्रेस के दो गुट हैं. एक गुट सीएलपी चीफ हूडा का और दूसरा कांग्रेस की प्रदेश अध्यक्ष शैलजा कुमारी का. दोनों में हाल ही में तब टकराव की स्थिति देखने को मिली जबकि दोनों के समर्थक दिल्ली में कांग्रेस के मुख्यालय पर पहुंचे और आपस में एक दूसरे की शिकायत की. ऐसा लग रहा है कि कांग्रेस ने दोनों गुट को समर्थन देकर दोधारी तलवार का मुंह खोला हुआ है. हालांकि हूडा को गांधी परिवार और वाड्रा का करीबी माना जाता रहा है. ऐसा माना जा रहा है कि हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री रह चुके हुडा चाहते हैं कि उनके बेटे को राज्य कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया जाए. हालांकि शैलजा पार्टी की पुरानी और भरोसेमंद नेता हैं. राज्य के दलितों के बीच उनका अच्छाखासा आधार है.

छत्तीसगढ़ में भी बघेल के खिलाफ माहौल
हाल में छत्तीसगढ़ में भी मौजूदा मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के खिलाफ अंसतोष गहराया. कांग्रेस के प्रदेश के दूसरे दमदार नेता टीएस सिंहदेव ने बघेल के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए उन्हें सीएम पद पर बिठाने का दबाव बनाना शुरू किया, क्योंकि जब छत्तीसगढ़ में बघेल को मुख्यमंत्री बनाया गया था तब कांग्रेस हाईकमान और राहुल गांधी ने कहा था कि प्रदेश में रोटेशन के आधार पर मुख्यमंत्री रहेगा. ये कहकर तब सिंह देव को शांत किया गया था और बघेल सीएम बने थे.

हालांकि हाईकमान ने बघेल को दो बार इस सिलसिले में दिल्ली बुलाया. साथ ही सिंहदेव को मंत्रिमंडल और बेहतर पोर्टफोलियो देने के साथ पसंदीदा नेता को राज्य में कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बना देने को कहा. लेकिन ऐसा लगता है कि मामला सुलझा नहीं है. हालांकि बघेल का दावा है कि हाईकमान ने उनके सीएम बने रहने को क्लीनचिट दे दी है.

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