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क्या है आयल बांड, तेल की बढ़ती कीमतों के बीच जिसे लेकर मचा है सियासी तूफान

सरकार ईंधन की बढ़ी कीमतों के लिए आयल बांड (Oil Bond) को जिम्मेदार बता रही है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

सरकार ईंधन की बढ़ी कीमतों के लिए आयल बांड (Oil Bond) को जिम्मेदार बता रही है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

Fuel Prices Hike: सरकार का कहना है कि पिछली सरकार ने आयल बांड जारी किए थे जिनकी वजह से कीमतें बढ़ी हैं. बांड जारी करना नई बात नहीं है.

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    देदेश में पेट्रोल (Petrol) और डीजल की कीमतों (Oil Prices) में तेजी से लोग परेशान हैं. कहीं कीमतें 100 रुपये प्रति लीटर के पार हो गई हैं तो कहीं 100 के पास पहुंच गई हैं. इससे सियासी बवाल भी हो गया है. एक तरफ सरकार का कहना है कि कीमतों में वृद्धि (Hike) उन आयल बांड (Oil Bonds) की वजह से हुई है जो पिछली सरकार ने खरीदे थे और जिनके भुगतान का समय निकट है. तो वहीं विपक्ष ने पटलवार करते हुए कहा है कि सरकार मूल्यवृद्धि से जितना कमा रही है उतना चुका ही नहीं रही है. इस मामले को जानने के लिए यह समझना जरूरी है कि ये आयल बांड हैं क्या.

    क्या हाल रहा मूल्यवृद्धि का
    दरअसल पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि कोविड-19 के कारण लगे लॉकडाउन से बढ़ रही है. इस दौर में अंतरराष्ट्रीय मूल्यों में भी तेजी देखने को मिली थी, लेकिन उसके बाद से कीमतें सामान्य होने पर भी देश में पैट्रोल की कीमतें अमूमन बढ़ ही रही हैं. अप्रैल के महीने में तेल की कीमतों में वृद्धि देखने को नहीं मिली तो मई के महीने में 16 बार बढ़ी और जून में यह सिलसिला और तेज होगा. अप्रैल की तुलना में अब तक आठ रुपये से भी ज्यादा बढ़ोत्तरी देखने को मिल चुकी है. पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि पर बवाल 100 रुपये के आंकड़े के पार करने पर तेज हो गया.

    कीमतें बढ़ने पर सियासत?
    केंद्र सरकार का कहना है कि पेट्रोल डीजल की कीमतों में वृद्धि की वजह साल 2014 में यूपीए सरकार द्वारा तेल कंपनियों को जारी किए आयल बांड हैं जिन्हें ब्याज सहित चुकाना है और उसी के कारण कीमतें बढ़ी हैं. इसके लिए बीजेपी ने साल 2008 और 2012 में तत्कालीन प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह का बयान भी सोशल मीडिया पर शेयर किया था जिसमें उन्होंने कहा था कि पैसे पेड़ पर नहीं ऊगते. 2018 में किए गए ट्वीट का  कांग्रेस ने भी जवाब देते हे एक ट्वीट में लिखा कि पिछले 7 सालों में 22 लाख करोड़ रुपये कमाई हुई है जबकि ऑयल बांड पर केवल 3500 करोड़ रुपये ही चुकाए गए हैं.

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    हाल ही में ईंधन की कीमतें (Fuel Prices) सौ रुपये प्रति लीटर की दर के पार होने पर सियासत गर्म हुई (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)


    सब्सिडी की खेल
    भारत में पेट्रोल और डीजल की कीमतों में सरकार बहुत सब्सिडी देती है. तेल की कीमतों पर राजनीति भी खूब होती रहती है. वैसे इस सबसिडी को कम करने की कोशिशे काफी समय से होने लगी हैं और कीमतें बाजार की कीमतों से कुछ हद तक निर्धारित भी होने लगी हैं. कीमतों को नियंत्रित करने के लिए सरकारें पहले भी आयल बांड जारी करती रही हैं.

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    क्या होते हैं ये आयल बांड
    केंद्र सरकार के पास तेल कंपनियों सहित अपनी कई कंपनियों के लिए बांड जारी कर सकती है. आयल बांड वह खास तरह प्रतिभूति या सिक्योरिटी होती है जिन्हें सरकार कैश सब्सिडी के लिए आयल कंपनियों को देती है. ये बांड 15 से 20 साल की अवधि जैसे लंबे समय के लिए होते हैं और इसके लिए कंपनियों को ब्याज भी दिया जाता है.

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    तेल की कीमतें (Fuel Prices) कम रखने पर ही सरकार पर बोझ बढ़ जाता था और उन्हें बांड जारी करने का रास्ता अपनाना पड़ता था. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)


    क्यों जारी किए जाते हैं बांड
    सरकार द्वारा तेल कीमतों पर नियंत्रण करने के लिए सरकार तेल कंपनियों को इस तरह के बांड करती हैं जिससे उस पर भी बोझ ना आए. यह एक तरह से राजकोषीय भोझ को टालने के लिए जाता है जिसका भुगतान भविष्य में किया जाता है. सरकार इन बांड का सहारा तब लेती हैं जब वे खतरे में होती हैं यानि उनका राजकोषीय घाटा अप्रत्याशित कारणों से बहुत बढ़ जाता है. उनकी आमदनी कम और खर्चा अचानक अधिक हो जाता है.

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    फिलहाल जो सियासत हो रही है वह इन्हीं बांड का हवाला देकर हो रही है. सरकार को मार्च 2026 तक 1.31 लाख करोड़ के आयल बांड का भुगतान करना है. क्लियरिंग कॉर्पोरेशन ऑफ इंडाय लिमिटेड के अनुसार केंद्र सरकार ने 2014 से अब तक केवल 3500 करोड़ चुकाए हैं. कांग्रेस इसी का हवाला देकर सरकार पर आरोप लगा रही है कि जनता पर बोझ भुगतान की तुलना में कहीं ज्यादा है. इस साल सरकार को 10 हजार करोड़ के बांड का भुगतान करना है जो मैच्योर हो रहे हैं.

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