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अशोक गहलोत: अर्थशास्‍त्र पढ़ा हुआ 'जादूगर' जिसके सियासी कमाल के आगे विरोधी भी होते हैं नतमस्‍तक

अशोक गहलोत (फाइल फोटो- पीटीआई)
अशोक गहलोत (फाइल फोटो- पीटीआई)

अशोक गहलोत कांग्रेस की तीन अलग-अलग केंद्र सरकारों में मंत्री रहे. वे इंदिरा के साथ ही राजीव गांधी की कैबिनेट के भी सदस्‍य थे. बाद में नरसिम्‍हा राव सरकार में भी वे मंत्री बने.

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 14, 2018, 4:54 PM IST
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अशोक गहलोत राजस्‍थान के मुख्‍यमंत्री बनने जा रहे हैं. जोधपुर की सरदारपुरा सीट से विधायक अशोक गहलोत लगातार चौथी बार विधायक चुने गए हैं. विधानसभा चुनावों में कांग्रेस को किनारे वाला बहुमत मिलने के बाद गहलोत का नाम सीएम पद की रेस में आया. इसके बाद उनका पलड़ा प्रदेश कांग्रेस अध्‍यक्ष सचिन पायलट की दावेदारी पर भारी पड़ा और ज्‍यादातर विधायक गहलोत के पाले में नज़र आए.

पिछले एक साल में गहलोत का सितारा बुलंदी पर पहुंचा है. सबसे पहले उन्‍हें राहुल गांधी ने गुजरात का प्रभारी बनाया. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी के गढ़ गुजरात में कांग्रेस लगभग दो दशक से सत्‍ता से बाहर है. लेकिन पिछले चुनाव में गहलोत ने मोर्चा संभाला. उनकी रणनीति ने बीजेपी का दम फुला दिया. पीएम मोदी को अपने सारे ब्र‍ह्मास्‍त्रों का इस्‍तेमाल कर जैसे तैसे गढ़ बचाया. कांग्रेस हार गई लेकिन राज्‍य में उसकी स्थिति और केंद्रीय आलाकमान की नज़रों में गहलोत का कद बढ़ गया. इसके बाद तो गहलोत ने उन सभी जगहों पर कांग्रेस की ओर से मोर्चा थाम लिया, जहां पर भाजपा से सीधा मुक़ाबला था और उनके ज़रिए पार्टी ने हरेक वार का डटकर सामना किया.

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अर्थशास्‍त्र से पोस्‍ट ग्रेजुएट गहलोत का जन्‍म 3 मई 1951 को जोधपुर में हुआ. उनके पिता लक्ष्‍मण सिंह गहलोत जादूगर थे. पिता से गहलोत ने भी जादूगरी के गुर सीखे. हालांकि, उन्‍होंने इसे पेशा नहीं बनाया लेकिन आगे चलकर उनके राजनीतिक दांवपेंच जादूगरी ही कहलाए.

राजनीति में अशोक गहलोत ने कॉलेज के समय में कदम रखा. कांग्रेस के छात्र संगठन एनएसयूआई के साथ जुड़े और साल 1973 से 1979 की अवधि के बीच राजस्‍थान NSUI के अध्‍यक्ष रहे, साल 1979 से 1982 के बीच जोधपुर शहर जिला कांग्रेस कमेटी के अध्‍यक्ष रहे.

1977 में 26 साल की उम्र में उन्‍होंने सरदारपुरा से चुनाव लड़ने के लिए टिकट मांगी. उस समय कांग्रेस में संजय गांधी का दबदबा चलता था और उन्‍होंने ही गहलोत को उम्‍मीदवार बनाया. इस चुनाव के लिए उन्‍होंने बाइक बेची और उससे मिले पैसों से पूरा चुनाव लड़ा. एक करीबी दोस्‍त के सैलून को चुनाव कार्यालय बनाया. लेकिन विधायकी के लिए पहले टेस्‍ट में गहलोत नाकाम रहे. उन्‍होंने इस शिकस्‍त से हार नहीं मानी. तीन साल बाद 1980 में जोधपुर लोकसभा सीट से उन्‍हें टिकट मिला और वे सांसद बने. इसके बाद वे राजनीति की हरेक कसौटी पर खरे उतरते गए.

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गहलोत की पहचान गांधीवादी नेता के रूप में होती है. लेकिन अपने विरोधियों को निपटाना भी गहलोत की एक पहचान है. राजनीति गलियारों के जानकार और गहलोत को करीब से जानने वालों का कहना है कि वे अपने विरोधियों की सभी बातें याद रखते हैं. वे कभी भी खुलकर नहीं बोलते हैं लेकिन चुपचाप अपना काम कर देते हैं.


बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार, राजस्‍थान में गुर्जर आरक्षण आंदोलन के नेता किरोड़ी सिंह बैंसला ने एक बार उनके बारे में कहा था, 'गहलोत काफी सजग नेता हैं. इतने सजग कि उन्‍हें कोई दूध पिलाने की कोशिश करे तो वह उसका पहला घूंट किसी बिल्‍ली को पिलाए बिना खुद नहीं पिएंगे.'



राजनीति गलियारों में गहलोत की 'जादूगरी' के कई किस्‍से चलते हैं. ऐसा ही एक किस्‍सा साल 2008 के विधानसभा चुनाव से जुड़ा है. उस चुनाव में कांग्रेस को 200 में से 96 सीटें मिली थी. ऐसे में गहलोत ने बसपा के छह विधायकों को कांग्रेस में मिला लिया. यह सब मायावती की अनुमति के बिना हुआ था. ऐसे में बसपा के स्‍थानीय नेतृत्‍व ने विधायकों को अयोग्‍य करार देने की अपील की. इस पर राजस्‍थान में यह कहा गया कि, 'जादूगर ने फिर दिखाया कमाल. राजस्‍थान से हाथी हुआ गायब.' इसके बाद बड़े आराम से पांच साल तक सरकार चलाई. हालांकि सरकार का कार्यकाल पूरा होने से ठीक पहले इन छहों विधायकों पर फैसला गहलोत के विरोध में आया लेकिन तब त‍क उनका काम हो चुका था.

ऐसा ही कुछ मुख्‍यमंत्री की कुर्सी को लेकर भी हुआ. 1998 और 2008 में जब कांग्रेस जीती थी तो गहलोत के अलावा कमला बेनीवाल, मिर्धा परिवार, परसराम मदेरणा, शीशराम ओला, डॉ. चंद्रभान, नारायण सिंह और डॉ. हरि सिंह जैसे जाट नेता मुख्‍यमंत्री पद पर दावा ठोक रहे थे. लेकिन दिलचस्‍प बात देखिए गहलोत ने आलाकमान का दिल जीतते हुए कुछ नेताओं को मना लिया तो बाकी लोग चुनाव हार गए. सबसे हैरानी वाले नतीजे तो 2008 में आए जब मिर्धा परिवार, नारायण सिंह, डॉ. हरि सिंह और डॉ. चंद्रभान चुनाव हार गए जबकि शीशराम ओला केंद्र की राजनीति में चले गए तो कमला बेनीवाल राज्‍यपाल बनकर राज्‍य से बाहर चली गईं. ऐसे में गहलोत ही सीएम पद के लिए रह गए.

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गहलोत काफी लो प्रोफाइल रहते हैं लेकिन कड़े कदम उठाने से पीछे नहीं हटते. इसके कई उदाहरण हैं. जैसे- 2012 में आसाराम बापू को रेप के आरोप लगने पर गिरफ्तार करना हो या 2003 में विहिप के पूर्व तेजतर्रार नेता प्रवीण तोगड़िया को जेल में डालना.


अशोक गहलोत कांग्रेस की तीन अलग-अलग केंद्र सरकारों में मंत्री रहे. वे इंदिरा के साथ ही राजीव गांधी की कैबिनेट के भी सदस्‍य थे. बाद में नरसिम्‍हा राव सरकार में भी वे मंत्री बने. हालांकि, तांत्रिक चंद्रास्‍वामी से दूरी के चलते उन्‍हें नरसिम्‍हाराव सरकार से इस्‍तीफा देना पड़ा था. अब वे गांधी परिवार की तीसरी पीढ़ी यानी राहुल गांधी के साथ मिलकर सियासत के नए दांवपेंच चल रहे हैं.

गहलोत राजनीतिक विरोध के बावजूद भैरो सिंह शेखावत का खूब सम्‍मान करते हैं. शेखावत के निधन के बाद गहलोत हरेक बरसी पर उनको श्रद्धांजलि देने वाले सबसे पहले नेता होते हैं. कई बार तो बीजेपी नेताओं से पहले वे शेखावत को याद कर भगवा पार्टी को क्‍लीनबोल्‍ड कर देते हैं.
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