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full story of shiv sena part 01 how 54 years back on shivaji park party take birth

शिव सेना की पूरी कहानी भाग 01 : 54 साल पहले शिवाजी पार्क पर यूं हुआ पार्टी का जन्म

1966 में शिवाजी पार्क में नारियल फोड़कर बाल ठाकरे ने शिव सेना की शुरुआत की.

1966 में शिवाजी पार्क में नारियल फोड़कर बाल ठाकरे ने शिव सेना की शुरुआत की.

महाराष्ट्र में शिव सेना पर छाए संकट के बीच कब उसका स्थापना दिवस निकल गया, इस बार पता नहीं लगा. 19 जून 1966 को शिवाजी पार्क में बाल ठाकरे ने नारियल फोड़कर मित्रों के साथ इसकी शुरुआत की थी. कैसे फिर ये एक मजबूत संगठन के तौर पर महाराष्ट्र के गांवों गांवों तक जड़ें मजबूत करता चला गया. शिव सेना की पूरी कहानी का पहला भाग

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19 जून 1966 के दिन बाल ठाकरे ने शिवाजी पार्क पर एक मीटिंग बुलाई. मुंबई के सार्वजनिक जीवन में लोग उन्हें जानने और पहचानने लगे थे. उन्हें डर था कि बहुत ज्यादा लोग इस मीटिंग में शायद नहीं आएं. इसके बाद भी उन्होंने 50,000 लोगों के लिए बड़ा इंतजाम किया था. मीटिंग में पहुंचे 02 लाख लोग. वहां नारियल फोड़कर अपने मित्रों के साथ उन्होंने शिव सेना बना ली. इसी में उन्होंने अपना पहला भाषण दिया.

मराठी अस्मिता के नाम पर खड़े हुए संगठन शिवसेना का सफर 05 दशकों से ज्यादा का हो चुका है. शिव सेना मतलब छत्रपति शिवाजी का दल. मराठी अस्मिता के लिए बनाई गई पार्टी. जिसका चुनाव चिन्ह तीर धनुष है तो प्रतीक चिन्ह टाइगर. फिलहाल शिव सेना महाराष्ट्र की सत्ता पर काबिज हैं. बाला साहेब ठाकरे के बेटे उद्धव ठाकरे महाराष्ट्र राज्य सरकार के मुखिया. हालांकि स्थापना के बाद से शिव सेना को सबसे ज्यादा चुनौती उसी के लोगों से मिल रही है. पार्टी की साख, ताकत और विश्वसनीयता सभी कुछ दांव पर है. यहां से शिव सेना बचेगी, बिखरेगी, क्या होगी, किधर जाएगी-कुछ पता नहीं.

पार्टी का मुख्य आधार महाराष्ट्र में ही है. हालांकि पार्टी ने अखिल भारतीय स्तर पर फैलने की कोशिश की. कह सकते है कि आधे अधूरे मन से, लिहाजा उसका राष्ट्रीय आधार कभी नहीं बना लेकिन महाराष्ट्र के गांवों-गांवों तक उसकी जड़ें खासी मजबूत हैं.

तब बीजेपी से रिश्ते टूट गए
बाल ठाकरे ने पहले विशुद्ध मराठी अस्मिता के स्वर छेड़ और फिर हिंदुत्व का पुरोधा बनकर इस संगठन की ताकत को बढ़ाया. बेशक शिवसेना का आधार महाराष्ट्र में सीमित रहा , लेकिन उसने समान विचारों पर खड़ी भारतीय जनता पार्टी से समझौता कर राजनीतिक शक्ति को बढ़ाया. वैसे ये गठजोड़ अक्टूबर 2019 में राज्य विधानसभा चुनावों के रिजल्ट आने के बाद टूटा. हालांकि इसमें तब से खटास और दरार और बढ़ी ही है. शिव सेना को तब सरकार में मुख्यमंत्री का पद और वर्चस्व चाहिए था, इसी बात पर बीजेपी से रिश्ते टूट गए. तब पार्टी ने धुर विरोधी माने जाने वाली कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ मिलकर महाराष्ट्र में सरकार बनाई.

शिव सेना मतलब छत्रपति शिवाजी का दल. मराठी अस्मिता के लिए बनाई गई पार्टी. जिसका चुनाव चिन्ह तीर धनुष है तो प्रतीक चिन्ह टाइगर.

लगातार बढ़ी है ताकत 
महाराष्ट्र में 70 के दशक के बाद से शिव सेना की ताकत लगातार बढ़ी है. विधानसभा से लेकर लोकसभा तक उसने खुद को राज्य की राजनीति में एक बड़ी ताकत के तौर पर स्थापित कर लिया है. एक जमाने में शिव सेना सामाजिक दल और आंदोलन के तौर पर थी लेकिन अब वो विशुद्ध तौर पर सियासी दल के खांचे में ढल चुकी है. महाराष्ट्र की राजनीति में उसकी जड़ें लगातार गहरी होती गई हैं. वैसे अब भी शहरों से लेकर गांवों तक अब भी उसका शाखा प्रमुख जनता की तमाम समस्याओं का निराकऱण करने का काम करता है, ये निराकरण मोहल्ले के झगड़ों से लेकर किसी भी तरह काम करवाना और समस्याओं को लेकर रहता है.

बाल ठाकरे अब भी दिलों में 
माना जाता है कि महाराष्ट्र की राजनीति में पहले कांग्रेस के साथ मजबूती से खड़े होने वाले मराठा और कुनबी अब शिव सेना की ओर खिसक चुके हैं. हिंदूत्व ने उसे व्यापक तौर पर उसे अन्य वर्गों से भी जोड़ा है. शिव सेना के संस्थापक और महाराष्ट्र में दमदार पकड़ रखने वाले बाला साहेब ठाकरे अगर अब भी राज्य में लोगों के दिलों में गहरे तक पैठ बनाए हुए हैं तो पार्टी का मौजूदा चेहरा उद्धव ठाकरे हैं. जिनकी इमेज पिता से अलग है.

लगातार बढ़ती गईं सीटें
अगर सियासी सफर की बात करें तो शिव सेना ने पहला चुनाव 1971 में लड़ा. ये लोकसभा चुनाव थे. 05 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए. किसी पर जीत नहीं मिली. 80 के लोकसभा चुनावों में पहली बार 01 सीट पर जीत मिली.

19 जून 1966 को मराठी अस्मिता और मुंबई में कई मुद्दों को लेकर नाराज मराठियों की समस्या को लेकर जब बाल ठाकरे ने शिव सेना का गठन किया तो उन्होंने इस मौके के लिए 50,000 लोगों के आने की उम्मीद की थी लेकिन वहां पहुंची करीब 02 लाख लोगों की भीड़.

1996 में शिवसेना ने विधानसभा चुनावों में 132 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए और 15 पर जीत पाई. ये बड़ी सफलता थी. हालांकि इसके बाद शिव सेना द्वारा लोकसभा चुनावों में लड़ी जाने वाली सीटों की संख्या कम होती गई और जीती गई सीटें ज्यादा, जैसा कि वर्ष 2014 और 2019 में हुआ. दोनों में सेना ने 20 और 23 सीटों पर प्रत्याशी खड़े किए और हासिल कीं 18-18 सीटें.

वैसे बीजेपी से पहले भी तोड़ा है गठबंधन
हैरानी बात ये भी थी कि दूसरी क्षेत्रीय पार्टियों से अलग शिव सेना ने पहले लोकसभा का चुनाव लड़ा. उसके बाद विधानसभा का. उसने विधानसभा चुनावों में पहली बार जोरआजमाइश 1990 में की. 183 सीटों पर चुनाव लड़ा औऱ 52 पर जीता. इसके बाद उसकी सीटें बढ़ती गईं. 2009 में पहली बार शिव सेना को झटका लगा. जीती गईं सीटें कम होकर 45 पर पहुंचीं. नतीजतन 05 साल बाद अगले चुनावों में उसने भारतीय जनता पार्टी से गठबंधन तोड़कर सभी 286 सीटों पर अकेले चुनाव लड़ने का फैसला किया. इस बार उसकी 63 सीटें आईं. चुनाव बाद बीजेपी के बाद सरकार में गठबंधन हुआ.

2019 में सीटों को लेकर बीजेपी के साथ उसके मतभेद तो उभरे लेकिन तब भी चुनाव साथ में लड़े. इस बार उसके हिस्से 56 सीटें आईं लेकिन सरकार बनाने को लेकर मतभेद इतने उभरे कि बीजेपी से अलग जाकर धुर विरोधी माने जाने वाली कांग्रेस और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के साथ सरकार बनाई. ये सरकार अब संकट में पड़ गई है. पार्टी का एक बड़ा धड़ा बागी हो गया है और ये लगने लगा है कि इसका गिरना तय है. कोई चमत्कार ही इसे बचा सकता है.

बाल ठाकरे 60 के दशक में मुंबई के शीर्ष कार्टूनिस्टों में थे. उनके कार्टून टाइम्स आफ इंडिया से लेकर तमाम जगहों पर प्रकाशित होते थे लेकिन उन्हें लगता था कि कार्टूनिस्ट को जितनी स्वतंत्रता मिलनी चाहिए, उतनी नहीं मिलती है, लिहाजा उन्होंने कार्टूनों पर आधारित अपनी ही पत्रिका शुरू कर दी. कश्मीर पर उनका बनाया एक कार्टून.

शाखा प्रमुख अब भी पार्टी की रीढ़
कई दशकों तक मुंबई में पत्रकारिता कर चुके और शिव सेना के उभार को करीबी से देखने वाले सुनील गाताड़े कहते हैं, शिव सेना में बदलाव तो बहुत आया है, लेकिन अब भी शाखा प्रमुख उसकी रीढ़ की हड्डी बना हुआ है, जो जनता के साथ एक सेतु का काम करता है. हालांकि अब शिव सेना पालिटिकल पार्टी ज्यादा है.

चाल में रहने वाले ठाकरे कैसे बने बड़ी ताकत
अब आइए देखते हैं कि एक चाल में रहने वाले बाल ठाकरे ने खुद को कैसे महाराष्ट्र की इतनी बड़ी ताकत बना लिया कि उनका लोहा हर कोई मानने लगा, यहां तक कि केंद्र से लेकर राज्य तक की सरकारें भी. उनका जन्म 23 जनवरी 1927 को पुणे में हुआ. पिता का नाम केशव सीताराम ठाकरे. पिताजी ने अपना नाम प्रबोधंकर रख लिया था.

ठाकरे टाइटल भी एक ब्रिटिश राइटर के नाम से लिया गया था. माताजी का नाम रमाबाई था. बाद में पूरा परिवार मुंबई के पास भिवंडी आ गया. प्रबोधंकर बहुत प्रतिभाशाली थे. एडिटर, स्टेज-कलाकार, स्क्रीनप्ले-डायलॉग राइटर, इतिहासकार और समाज सुधारक. ‘चार बेटियों के पैदा होने के बाद’ बाल का जन्म हुआ. बाल ठाकरे के और भी भाई थे लेकिन बाल ठाकरे ज्यादा लाड़ले थे. युवावय में वह कुछ समय तक आरएसएस शाखा में भी जाते थे.

बाल ठाकरे अच्छे कार्टूनिस्ट थे
बाल ठाकरे एक कार्टूनिस्ट थे. पिताजी ने अच्छे-अच्छे कार्टूनिस्टों से परिचय कराया. 1950 के आस-पास उनकी पहचान क्रांतिकारी कार्टूनिस्ट के तौर पर बनने लगी. चर्चिल से लेकर आइजनहावर तक के कार्टून बनाते थे. टाइम्स ऑफ़ इंडिया के संडे एडिशन में कार्टून छपते थे. हालांकि उनके कार्टून पर विवाद भी हुए. नौकरी गंवानी पड़ी. तीन बार कम से कम नौकरी छोड़ी. उन्हें लगता था कि वो जिस अखबार के लिए कार्टून बनाते हैं, उसमें कार्टून को लेकर पाबंदियां बहुत हैं. ऐसे में बाद में अपने भाई श्रीकांत के साथ मिलकर खुद की मराठी पत्रिका ‘मार्मिक’ निकालनी शुरू कर दी. मार्मिक मतलब सीधे दिल से. कम्युनिस्टों से भी उनके चिढ़ की एक कहानी है.

कम्युनिस्टों से टकराव
कार्टून बनाने के सिलसिले में एक बार कम्युनिस्ट नेताओं से विवाद हुआ. नेताओं ने अपने गुंडे ठाकरे के घर पर भेज दिए. पिताजी ने किसी तरह मामला सुलटाया. लेकिन इसके बाद शायद कम्युनिस्ट बाल ठाकरे के जेहन में फांस की तरह गड़ गए. उस समय कम्युनिस्ट नेताओं को अंदाजा नहीं था कि आगे क्या होने वाला है.

मुंबई किसकी
बंबई को अंग्रेजों ने बसाया था. 07 छोटे छोटे द्वीप थे यहां. उनको पाटकर बंबई बसाई गई. उस समय साउथ बंबई ही असल बंबई थी. शहर की असली ताकत और सारा खेल यहीं होता था. मतलब दादर से चर्चगेट का इलाका. देश के सारे पैसों का लेन-देन वहीं से होता था. मालाबार हिल में बड़े-बड़े व्यापारी और लोग रहते थे.

शुरू में तो नेहरू सरकार ने बंबई को केंद्रशासित प्रदेश बनाने के विकल्प पर भी विचार किया था. शायद इसलिए क्योंकि बम्बई किसी की नहीं थी. अंग्रेजों ने व्यापार शुरू किया. फिर सारे देश से व्यापार करने वाले यहां पहुंच कर बस गए. दक्षिण भारत के लोग शुरू में ही यहां आकर नौकरियों पर काबिज हो गए. उस समय बंबई में तीन तरह के लोगों का बोलबाला था. गुजरातियों और पारसियों का व्यापार में. नौकरियों में दक्षिण भारतीयों और कारोबार के साथ सर्विस सेक्टर में हाथ बंटाने वालों के तौर पर उत्तर भारत से आए मजदूर का साधारण कामकाजी तबके का.

बाल ठाकरे ने मराठियों की किस समस्या को मुद्दा बनाया
अगर आपको याद हो तो 50 के दशक में जब राज्यों के पुर्नगठन की बात हो रही थी तो भाषा के आधार राज्य के पुर्नगठन आंदोलन ने जोर पकड़ा हुआ था. ये बहुत तीव्र आंदोलन था, जिसने क्षेत्रीय अस्मिता को उभारने का काफी काम किया. तब महाराष्ट्र में भी मराठियों ने अपने लिए भाषा के आधार पर राज्य की मांग की. जो आसपास के राज्यों को काटकर बनाया जाना था. मुख्य तौर पर गुजरात, कर्नाटक और मद्रास स्टेट के हिस्सों को. बड़ा आंदोलन चला. 1960 में महाराष्ट्र बन गया. सबसे बड़ी बात ये हुई कि बंबई जैसा हीरा महाराष्ट्र के माथे पर जगमगाने लगा. वो महाराष्ट्र की राजधानी बनी.

अब दूसरी समस्या सामने आने लगी. मराठी लोगों की साक्षरता की दर दक्षिण भारतीयों से कम थी. हालांकि 1950 के बाद मराठी भी उच्च शिक्षा हासिल कर रहे थे लेकिन नौकरियां बाहरी लोगों के हाथों में ज्यादा जा रही थीं. बाल ठाकरे ने इसको मुद्दा बनाना शुरू किया. उन्होंने अपने अपनी पत्रिका के जरिए इसे उठाना शुरू किया. कार्टून बनाकर. लेखों के जरिए. पहले इस पर व्यंग्य के जरिए मार की फिर तंज कसने लगे और फिर इस पैने हमले ही शुरू कर दिए. चूंकि उनकी पत्रिका की लोकप्रियता ठीक ठाक थी. लिहाजा लोग उनके पास अपनी बातें लेकर आने लगे. इसमें ज्यादा युवा थे. पढ़े-लिखे और बेरोजगार. एक अलग किस्म का असंतोष पूरे बंबई पर हावी हो रहा था. ये मुद्दा बड़ा बन रहा था. बस इसे मजबूत आवाज नहीं मिल पा रही थी.

स्थानीय मराठी उन दिनों नाराज थे
बस ठाकरे ने इसी मुद्दे के जरिए एक संगठन बनाया, जिसने इसे लेकर आवाज उठाई और समाज से जुड़कर बहुत कुछ करने लगे. बंबई में उन दिनों बहुत कुछ ऐसा चल रहा था, जो मराठियों यानि स्थानीय लोगों को नाराज कर रहा था. स्थानीय व्यापारियों और उद्योगपति ट्रेड यूनियनों के मजबूत होते जाने से परेशान थे. 19 जून 1966 को बाल ठाकरे ने शिव सेना के आगाज का बिगुल बजाकर जाहिर कर दिया कि बंबई अब वैसी नहीं रहेगी हालांकि सेना का सफर और संघर्ष लंबा रहा लेकिन शायद इसी वजह से वो मराठियों के साथ जड़ों से ज्यादा जमते चले गए.

जबरदस्त पकड़
पहले वो मुंबई में मजबूत हुए फिर महाराष्ट्र के गांव और शहरों तक फैल गए. एक पीढ़ी पहले उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले से मुंबई में जाकर बस गए पत्रकार अरुण यादव अब हिंदी और मराठी में अपनी दो न्यूज वेबसाइट चलाते हैं. वो कहते हैं, मैने ऐसे सैकडों दिन देखे हैं जब बाल ठाकरे बंद का आह्वान करते थे और फिर शहर में एक पत्ता भी नहीं खड़कता था. किसी लोकल नेता का इतना पॉवर नहीं देखा. मुंबई और महाराष्ट्र में सब उनके हिसाब से चलते थे. सभी उन्हें साहेब ही बोलते थे. (जारी रहेगी)

Tags: CM Uddhav Thackeray, Maharashtra, Shiv sena, Shiv Sena MLA, Uddhav Government

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