वो दुर्लभ जेनेटिक बीमारी, जो पीड़ित को बहादुर बना देती है

दुनिया में बहुत से लोग ऐसे है, जिन्हें जरा भी डर नहीं लगता- सांकेतिक फोटो (pixabay)

दुनिया में बहुत से लोग ऐसे है, जिन्हें जरा भी डर नहीं लगता- सांकेतिक फोटो (pixabay)

मस्तिष्क का एमिग्डाला (amygdala) नामक हिस्सा डर को महसूस करता है. इस हिस्से के निष्क्रिय हो जाने पर मरीज को डर लगना एकदम बंद हो जाता है. यहां तक कि वो दूसरों के चेहरे पर भी डर के भाव नहीं समझ पाता है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 24, 2021, 2:26 PM IST
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दुनिया में बहुत से लोग ऐसे है, जिन्हें जरा भी डर नहीं लगता. इनके मस्तिष्क की जांच पर सामने आया कि ये सिर्फ उनके मस्तिष्क की ताकत (brain power) के कारण नहीं होता, बल्कि ये एक तरह की बीमारी है. इस जेनेटिक बीमारी (genetic disease) के मरीजों के मस्तिष्क (brain) का वो हिस्सा ही काम नहीं करता, जिससे डर का पता चलता है.

डराने की बहुतेरी कोशिशें बेकार रहीं

अमेरिका की एक 44 वर्षीय महिला का सनसनीखेज मामला आने पर सबसे पहले ये बात उठी कि डर न लगना सिर्फ सोचे जाने से नहीं होता होगा. महिला, जिसकी पहचान छिपाने के लिए उसे SM नाम दिया गया, उसे जिंदगी छीन लेने वाले हालातों में भी डर नहीं लगा. उसे चुपके से अगवा किया गया, तो भी वो मदद के लिए रोई-चीखी नहीं. बंदूक के बल पर डराने की कोशिश हुई तो भी उसे डर नहीं लगा. यहां तक कि कमरे में जहरीले सांपों के बीच छोड़ने पर भी SM ने मदद नहीं मांगी, बल्कि सांपों को छूने के लिए आगे बढ़ने लगी, तब जैसे-तैसे उसे रोककर सांपों को जार में वापस भरा गया.

fearless rare brain disease
बीमारी में मरीजों के मस्तिष्क का वो हिस्सा ही काम नहीं करता, जिससे डर का पता चलता है- सांकेतिक फोटो (pixabay)

मस्तिष्क पर असर

SM पर वैज्ञानिक पिछले 10 सालों से भी ज्यादा वक्त से प्रयोग कर रहे हैं. इसी दौरान ये पता चला कि उनके मस्तिष्क में डर जगाने वाला हिस्सा एक्टिव ही नहीं है. University of Iowa ने वैज्ञानिकों की स्टडी में साबित हो गया कि बीमारी की वजह से उसके ब्रेन का एक खास हिस्सा प्रभावित हुआ, जिसके कारण उसे किसी किस्म का डर नहीं लगा. ये स्टडी करंट बायोलॉजी नामक साइंस जर्नल में छपी है.

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क्या है ये बीमारी?

मस्तिष्क की इस बीमारी को Urbach-Wiethe disease कहा जाता है. ये एक तरह की रेयर जेनेटिक बीमारी है, जिसमें शरीर के कई हिस्से कड़े हो जाते हैं, साथ ही इसका असर मस्तिष्क पर भी पड़ता है. इसका एमिग्डेला नाम हिस्सा इतना सख्त हो जाता है कि इस तक तंत्रिकाएं डर का संदेश नहीं पहुंचा पाती हैं. इस जेनेटिक बीमारी से हालांकि बच्चे के विकास पर दूसरा कोई असर नहीं होता है लेकिन डर नहीं लग पाता है.

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ब्रेन में एमिग्डाला नामक हिस्सा डर को महसूस करता है- सांकेतिक फोटो (pixabay)


क्या हैं बीमारी के संकेत?

इसके तीन मुख्य लक्षण हैं- आवाज में भारीपन, आंखों के आसपास छोटे-छोटे दानोंनुमा उभार और मस्तिष्क में कैल्शियम का जमाव जो कि सीटी स्कैन में ही पता चलता है. ब्रेन में यही कैल्शियम डर तो खत्म करता ही है, उम्र के आगे के पड़ावों पर इसके मरीज को मिरगी का भी डर रहता है. पूरी दुनिया में अब तक इस बीमारी के 400 से ज्यादा मरीज सामने आए हैं.

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डर में मस्तिष्क का कौन सा हिस्सा काम करता है?

ब्रेन में एमिग्डाला नामक हिस्सा डर को महसूस करता है. ये तंत्रिका कोशिकाओं से बना बादाम के आकार का हिस्सा है, जिसका एक निश्चित काम है. जब कोई खतरनाक स्थिति आती है तो एमिग्डाला शरीर को खराब हालात के संदेश भेजता है. इसी के इशारे पर हम तय कर पाते हैं कि कुछ गड़बड़ है और भागने या कोई भी एक्शन लेने का फैसला कर पाते हैं. एमिग्डाला के संदेश भेजने का पहला लक्षण है हमारे दिल का धड़कन का तेज होना और हथेलियों पर पसीना आना.

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जब कोई खतरनाक स्थिति आती है तो एमिग्डाला शरीर को खराब हालात के संदेश भेजता है- सांकेतिक फोटो (pixabay)


क्यों जरूरी है डरना?

डर के बुरे पहलुओं के साथ ही अच्छे पहलू भी हैं. यानी डर महसूस करने के कई फायदे हैं. जैसे इससे हमारा मस्तिष्क सही-गलत का फैसला ले पाता है और इमरजेंसी सिचुएशन में सही ढंग से एक्ट करता है. डरे हुए लोग ज्यादा योजनाबद्ध तरीके से कोई भी काम करते हैं. स्टडीज में साबित हो चुका है कि डर भी दूसरी भावनाओं की तरह अहम भाव है, जिसे महसूस करने के बाद हमारे पास आफ्टर स्ट्रेंथ आती है यानी हम पहले से ज्यादा मजबूत होकर उभरते हैं.

सैनिकों की हो सकेगी मदद

उस अमेरिकी मरीज के मामले में एमिग्डाला पूरी तरह से निष्क्रिय था. इससे न तो वो खुद डरती थी, बल्कि दूसरों के चेहरे पर भी डर के भावों को नहीं समझ पाती थी. डर के अलावा बाकी सारे भाव जैसे प्यार, गुस्सा, दुख जैसे भाव इस मरीज में आम लोगों जैसे ही थे. अब वैज्ञानिक SM के मस्तिष्क का और बारीकी से अध्ययन कर रहे हैं. माना जा रहा है कि इससे मिले निष्कर्ष की मदद से सेना में काम करने सैनिकों को युद्ध और मौत के दुख से निकाला जा सकेगा. बता दें कि युद्ध में हिस्सा ले चुके और अपने साथियों को खो चुके सैनिक अक्सर पोस्ट ट्रॉमेटिक स्ट्रेस डिसऑर्डर से ग्रस्त हो जाते हैं.
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