जानिए शोधकर्ताओं ने कैसे पता लगाया जेंटू पेंगुइन की चार अलग प्रजातियों का

जेटू पेंगुइन (Gentoo Penguin) की जनसंख्या (Populations) लंबे समय से अलग अलग रह रहीं थी जिससे वे अलग प्रजातियां (Species) बन गईं. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)
जेटू पेंगुइन (Gentoo Penguin) की जनसंख्या (Populations) लंबे समय से अलग अलग रह रहीं थी जिससे वे अलग प्रजातियां (Species) बन गईं. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

जेंटू पेंगुइन (Gentoo Penguin) के अलग जनसंख्याओं के बारे में अंतर करने के लिए शोधकर्ताओं ने बहुत सारे आंकड़े और संग्रहालय के नमूनों के अध्ययन किया और पाया कि ये चार अलग प्रजातियां (Specific) हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: November 6, 2020, 7:45 PM IST
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पृथ्वी (Earth)पर कई जानवर (Animals)  ऐसे हैं जिनकी प्रजातियों (Species) में अंतर करना बहुत मुश्किल होता है. इसी लिए हैरानी की बात नहीं होनी चाहिए अगर आज भी किसी जानवर की कुछ जनसंख्याओं (Populations) में इतना अधिक अंतर हो जाए की उनका स्तर अलग अलग प्रजातियों तक पहुंच जाए. ऐसा ही कुछ हुआ है जेंटू पेंगुइन (Gentoo Penguins) के साथ जिन पर हुए शोध में उनकी चार प्रजातियों का होना सामने आया है.

फिलहाल दो उप प्रजाति
जेंटू पेंगुइन दक्षिणी गोलार्द्ध में पाए जाने वाले प्रमुख पेंगुइन हैं फिलहाल इनकी दो उपप्रजातियां हैं. पाइगोसेलिस पापुआ एलिसवर्थी और पाइगोसेलिस पापुआ पापुआ. बाथ यूनिवर्सिटी के मिल्नर सेंटर फॉर इवॉल्यूशन में शोधकर्ता और इस शोध के वरिष्ठ लेखक डॉ जेन यंगर का कहना है कि पहली बार उनकी टीम ने दर्शाया कि ये पेंगुइन जेनिटिक रूप से ही अलग नहीं हैं, बल्कि शारीरिक तौर पर भी इनमें काफी भिन्नता है.

विविधता विकसित हो गई
डॉ यंगर ने बताया, ‘जेंटू अपनी घरेलू कॉलोनी के पास रहना पसंद करते हैं. लाखों सालों से ये भौगोलिक रूप से एक दूसरे से इतना अलग हो गए कि इनमें आपस में प्रजनन होना ही बंद हो गया. यहां तक कि आज भी ये इतनी ज्यादा दूरी में तैरते हैं जो उन्हें अलग करती है.



इन इलाकों के पेंगुइन का अध्ययन
जेंटू पेंगुइन का अध्ययन करने के लिए डॉ यंगर और उनके साथियों ने दक्षिणी अटलांटिक महासागर के फाल्कलैंड द्वीपों और दक्षिणी जॉर्जिया, अंटार्कटिका के शेटलैंड द्वीपों और हिंद महासागर के केरगुएलीन में रहने जेंटू पेंगुइन के जीनोंम का अध्ययन किया. वैज्ञानिकों ने पेंगुइन इन अलग अलग जनसंख्याओं के बीच के संबंध को समझने के लिए इस जीनोम आंकड़े से इनका विकास वृक्ष बनाया

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प्रजातीय ((Species) अंतर होने के बाद भी इन पेंगुइन (Gentoo Penguin) को देख कर इनमें अंतर करना बहुत मुश्किल था. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


कैसे पता चला अंतर
जब उन्होंने इन आंकड़ों को हर जनसंख्या के संग्रहालयों के नमूनों के मापनों के साथ मिलाया तो  उन्होंने इन चारों ही जनसंख्याओं में जनेटिक और आकृतियों में स्पष्ट अंतर पाया. इससे उन्होंने पाया कि पेंगुइन में दो ज्ञात उपप्रजाति पाइगोसेलिस एलिसवर्थी (Pygoscelis ellsworthi ) और पाइगोसेलिस पापुआ (Pygoscelis papua) की प्रजातियों में विकसित हो गईं हैं.

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दो नई प्रजातियां
इस अध्ययन से शोधकर्ताओं ने दो नई प्रजातियां भी स्थापित की हैं. इनके नाम हैं पाइगोसेलिस पोनसेटी (Pygoscelis poncetii) और पाइगोसेलिस टीनीयाटा (Pygoscelis taeniata). पाइगोसेलिस पोनसेटी नाम ऑस्ट्रेलिया की सीबर्ड सरंक्षणवादी सैसी पोनसेट के नाम पर रखा गया है. वहीं पाइगोसेलिस टीनीयाटा 1920 के दशक में सुझाया गया प्रस्तावित नाम है.

बिलकुल अलग ही इलाकों में रहते हैं ये
डॉ यंगर का कहना है कि ये चार प्रजातियां जो शोधकर्ताओं ने प्रस्तावित की हैं अलग ही अक्षांश में रहती हैं. मिलास के तौर पर पाइगोसेलिस एल्सवर्थी  अंटार्कटिका में प्रवास करते हैं. जबकि पाइगोसेलिस  पोन्सेटी, पाइगोसेलिस  टेनीयाटा और पाइगोसेलिस  पापुआ उत्तर में रहते हैं जहां हालात कम ठंडे होते हैं. इसलिए हैरानी की बात नहीं होनी चाहिए कि इन प्रजातियों ने अपने आवास के हिसाब से खुद को ढाल दिया.“

अपने समूह के साथ ही रहने की आदत ने अलग अलग इलाकों के पेंगुइन (Gentoo Penguin) में इतना अंतर ला दिया. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


आसान नहीं है अंतर करना
इस अध्ययन के प्रमुख लेखक जोश टेलर ने बताया, “ये सभी पेंगुइन आम लोगों की निगाह में एक से ही नजर आते  हैं, लेकिन जब हमने उनके हड्डियों के ढांचे को नापा, तो हमने उनकी हड्डियों की लंबाई और उनकी चोंच के आकार में भी अंतर पाया. यह जिराफों की तरह कहानी है जिसका खुलासा साल 2016 में हुआ था कि उनकी चार अलग प्रजातियां हैं.”

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डॉ यंगर ने कहा, “फिलहाल जेंटू पेंगुइनों की संख्या स्थाई है लेकिन इस बात के प्रमाण मिल रहे हैं कि उत्तरी जनसंख्या जलवायु परिवर्तन के कारण गर्मी होते ही दक्षिण की ओर चली जाती है. इसलिए हमें उनपर बारीकी से नजर रखनी है.” जेंटू के वर्गीकरण में प्रस्तावित बदलावों की समीक्षा वैज्ञानिकों की एक अंतरराष्ट्रीय समिति करेगी जो इन्हें स्वीकार करने से पहले सभी प्रमाणों का अध्ययन करेगी. यह अध्ययन हाल ही में इकोलॉजी और इवोल्यूशन में प्रकाशित हुआ है.
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