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क्यों हुई उत्तराखंड में नंदादेवी ग्लेशियर से तबाही, क्या थी वजह

उत्तराखंड जल त्रासदी के बाद लखीमपुर खीरी के 15 मजदूर भी लापता

उत्तराखंड जल त्रासदी के बाद लखीमपुर खीरी के 15 मजदूर भी लापता

उत्तराखंड (Uttarakhand) के चिमोली (Chamli) में नंदादेवी ग्लेशियर (Glacier) के टूटने से भारी तबाही हुई. लेकिन इसके कारणों में जलवायु परिवर्तन से लेकर कम बर्फबारी तक बताई जा रही है.

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    नउत्तराखंड (Uttarakhand) के चमोली (Chamoli) की नीति घाटी में नदादेवी ग्लेशियर (Glacier) अचानक टूट गया. इसकी वजह से बांध टूटा और धौली नदी (Dhauli River) में बाढ़ की स्थिति आ गई है. प्रशासन की सक्रियता और तमाम चौकस प्रयासों के बाद भी कई लोग गायब हैं और ऋषिगंगा पॉवर प्रोजेक्ट सहित कई तरह संपत्तियों को नुकसान पहुंचा है. इस हादसे के लिए जिम्मेदार ग्लेशियर टूटने के कई कारण बताए जा रहे हैं.

    ऐसी हुआ सब
    प्रत्यक्षदर्शियों के मुताबिक रविवार को जब यह घटना हुई उस समय मौसम की ओर से किसी भी तरह का कोई खतरा नहीं दिखा, लेकिन ऋषिगंगा नदी में अचनाक ही नीति घाटी के पास के लोगों को बहुत सारा पानी एक साथ आता दिखाई दिया. बहुत सारे लोग सुरक्षित ऊंचाई पर तो पहुंच गए पर अब भी बहुत सारे लोग लापता हैं.

    कम बर्फबारी बनी वजह
    विशेषज्ञों का कहना है कि इस हादसे की वजह से इसबार सर्दियों में कम बर्फबारी है. डाउन टू अर्थ की रिपोर्ट में उत्तराखंड के जीबी पंत इंस्टीट्यूट ऑफ हिमायलयन एनवायर्नमेंट एंड डेवलपमेंट के वैज्ञानिक संदीपन मुखर्जी का कहना है कि इस बार कुछ असामान्य हुआ है.

    और भी हो सकते हैं कारण
    मुखर्जी के मुताबिक सर्दियों में बारिश और बर्फबारी ग्लेशियरों को रोके रखते है, लेकिन इस साल ऊचांइयों पर कम बर्फबारी हुई. हो सकता है कि यह उनमें से एक कारण हो सकता है जिससे यह घटना हुई.  लेकिन फिलहाल इस बारे में स्पष्टता से नहीं कहा जा सकता है.

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    इस साल सर्दियों में कम बारिश (Rainfall) और बर्फबारी (Snowfall) भी इसके पीछे की वजह हो सकती है.

    ग्लेशियरों पर निगरानी मुश्किल
    उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू और कश्मीर में करीब 200 ग्लेशियर हैं. मुखर्जी का कहना है कि सर्दियों में मौसम की वजह से इन ग्लेशियरों पर निगरानी रखना बहुत ही मुश्किल हो जाता है इसलिए यह काम मार्च से सितंबर के बीच में हो पाता है.

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    यह भी होता है बाढ़ का कारण
    इस रिपोर्ट में दिल्ली यूनिवर्सिटी में सेंटर फॉर इंटरडिसिप्लिनरी स्टडीज ऑफ माउंटेन एंड हिल एनवायर्नमेंट  के निदेशक और एनवायर्नमेंटल स्टडीज विभाग के प्रोफेसर महाराज के पंडित ने बताया कि हिमालय में विभिन्न देशों में 8800 ग्लेशियर झीलें हैं, इनमें से 200 से ज्यादा खतरनाक बताई गई हैं. हाल के वैज्ञानिक प्रमाण बताते हैं कि हिमालय में आने वाली बाढ़ों का प्रमुख कारण भूस्खल के कारण रुकी पहाड़ी नदियां हैं.

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    इस तरह की आपदाओं (Tragedy) के लिए चेतावनी तंत्र बनाने की जरूरत है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

    एक सक्रिय चेतावनी तंत्र की जरूरत
    पंडित ने बताया कि हिमायल दूसरे पर्वत श्रृंखलाओं की तुलना में तेजी से गर्म हो रहा है. वहीं निर्माण कार्यों में लकड़ी और पत्थरों की जगह कंक्रीट का उपयोग स्थानीय गर्मी को बढ़ा रहा है. सरकार केवल हादसे के बाद ही कुछ करती है, लेकिन इसके लिए पहले से कुछ नहीं करती है. सरकार से समुद्री तटों की तरह सुनामी या तूफान चेतावनी व्यवस्था जैसा कुछ यहां भी करने को कई बार कहा गया है, लेकिन ऐसा कुछ नहीं है.

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    उल्लेखनीय है कि ग्लेशियर जलवायु और जलवायु परिवर्तन के प्रति बहुत संवेदनशील होते हैं.  वैसे तो ये धीरे धीरे यानि एक साल में कुछ ही सेमी की दर से बहते हैं, लेकिन तेज आने पर ये 50 मीटर प्रति साल की दर से बह सकते हैं. पूरा हिमालय क्षेत्र ही भूकंपीय दृष्टिकोण से अतिसंवेदनशील क्षेत्र में आता है. किसी भी तरह का भूंकप इन ग्लेशियरों को ज्यादा सक्रिय कर सकता है. फिर भी बिना किसी भूकंपीय या मौसम जैसे भारी और असामान्य बर्फबारी जैसी घटना के बिना है ऐसा होना चिंता का विषय हो सकता है.

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