मंगल पर घाटियां नदियों से नहीं, इस प्रक्रिया से बनी थीं, शोध ने दी नई जानकारी

मंगल पर घाटियां नदियों से नहीं, इस प्रक्रिया से बनी थीं, शोध ने दी नई जानकारी
मंगल पर दूर से दिखती घाटियों के बारे कहा जाता था कि ये नदियों ने बनाई है , लेकिन यह गलत साबित हुआ. (प्रतीकात्मक तस्वीर, Reuters)

नए शोध से पता चला है कि मंगल ग्रह (Mars) पर जो घाटियां (Valleys) बनी हैं वह नदियों (Rivers) से नहीं बल्कि हिमनदों (Glaciers) से बनी है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 5, 2020, 5:10 PM IST
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vनपिछले महीने ही तीन अलग अलग देशों ने मंगल (Mars) के लिए अपने अभियान शुरू किए. यूएई ने मंगल के लिए केवल अंतरिक्ष यान (Space Craft) भेजा तो नासा (NASA) ने मंगल पर अपना रोवर भेजा है. जबकि चीन ने अंतरिक्ष यान के साथ रोवर भी भेजा है. इससे साफ है कि दुनिया के कोने कोने के वैज्ञानिकों में मंगल पर शोध के प्रति कितना उत्साह है. मंगल पर शोध भी कम नहीं हो रहा है.आए दिन उस पर कोई शोधकार्य सामने रहा है. अब ताजा शोध ने खुलासा किया है कि मंगल पर जो नहरों या घाटियों (Valleys) जैसे निशान दूर से नजर आते हैं वास्तव में पानी की नदी ने नहीं बल्कि ग्लेशियरों (Glaciers) यानि बर्फीले हिमनदों के कारण हैं.

अब तक तो यही माना जाता था कि...
लंबे समय से यह माना जा रहा था कि मंगल ग्रह पर जो  घाटियां बनी हैं उनके निर्माण में बहते पानी की नदियों की भूमिका रही होगी. लेकिन नए शोध के मुताबिक ये घाटियां ग्लेशियर्स ने बनाई हैं. नेचर जियोसाइंस में प्रकाशित यह अध्ययन ऐसे समय पर आया है जब मंगल पर न केवल बहुत से अभियान भेजे गए हैं, बल्कि वहां जीवन की संभावनाओं की तलाश के साथ मानव के रहने के अनुकूल हालात बनाने पर भी शोध जोरों से चल रहा है.

टूटी पुरानी धारणा
इस अध्ययन से उस सिद्धांत पर संदेह हो रहा है जिसके मुताबिक मंगल ग्रह कभी एक गर्म ग्रह हुआ करता था. माना जाता रहा है कि एक समय मंगल पर गर्म और आर्द्र जलवायु व्यापक तौर पर मौजूद थी और बड़ी मात्रा में पानी बहता था. कनाडा और अमेरिका के शोधकर्ताओं ने करीब 10 हजार से ज्यादा मंगल की घाटियों का अध्ययन कर उनकी तुलना पृथ्वी की उन घाटियों से की जो ग्लेशियर की वजह से बनी हैं.



एक नहीं कई प्रक्रियाएं
यूनिवर्सिटी ऑफ ब्रिटिश कोलंबिया के द्वारा जारी वक्तव्य में शोध के प्रमुख लेखिका एना ग्रॉ गालोफ्रे ने बताया, “पिछले  40 सालों से, जब से मंगल की घाटियां पहली बार खोजी गई हैं, माना जा रहा था कि कभी मंगल पर नदियां बहती होंगी जिन्होंने इन घाटियों का निर्माण किया है. लेकिन ये निर्माण बहुत ही अलग तरह के हैं. जिससे पता लगता है कि इनके निर्माण में बहुत सारी प्रक्रियाओं का योगदान रहा होगा. “

Mars venus earth
वैज्ञानिकों लंबे समय से पृथ्वी के बाहर जीवन तलाश रहे हैं.
(प्रतीकात्मक तस्वीर)


कैसे पता चला इनके बारे में
शोधकर्ताओं ने पाया कि मंगल की घाटियां और  कनाडा के आर्कटिक क्षेत्र वाले डेवोन द्वीप के ग्लेशियर वाले चैनल्स में काफी समानता पाई गई हैं. इस निर्जन और वीरान इलाको का नासा अपने अंतरिक्ष अभियानों के प्रशिक्षण के लिए उपयोग करता है.  इसके वीरानेपन के कारण इस पृथ्वी का मंगल भी कहा जाता है.

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ऐसे बनी होंगी घाटियां
शोधकर्ताओं के अनुसार उनके पड़ताल बताती है कि मंगल पर कुछ घाटियों करीब 3.8 अरब साल पुरानी हैं जो बर्फ की चादर के नीचे पिघले पानी से बनी होंगी. ये इस धारणा से सम्मत है कि पुरातन काल में भी मंगल एक काफी ठंडा ग्रह रहा होगा. शोध के सहलेखक मार्क जेलिनेक का कहना है कि केवल कुछ ही घाटियों के हिस्सों के स्वरूप ही ऐसे दिखे हैं जो शायद पानी की अपरदन से बने लगते  हैं. यह अब तक की मंगल के बारे बनी धारणा के विपरीत बात दिख रही है.

क्या फायदा होगा शोध से
नेचर जियोसाइंस का कहना कि इन हालातों को  समझने से मंगल ग्रह के पहले क अरब साल के इतिहास के बारे में पता चलेगा. यह काफी अहम है क्योंकि इससे यह पता चल सकता है कि क्या इस ग्रह पर जीवन के अनुकूल परिस्थितियां थीं भी या नहीं. वहीं शोधकर्ताओं का कहना है कि बर्फीले तापमान ने पुराने समय में जीवन का समर्थन किया होगा.

NASA
नासा का पर्सिवियरेंस रोवर मंगल ग्रह पर अभूतपूर्व प्रयोग करेगा. (प्रतीकात्मक तस्वीर)


यह हो सकती है संभावना
यूबीसी ने अपने बयान में कहा कि बर्फ की चादर ने उसके नीचे पानी को स्थायित्व दिया होगा और मंगल के मैग्नेटिक फील्ड की गौरमौजूदगी के कारण आने वाले खतरनाक विकिरणों से बचाव भी किया होगा. यह फील्ड अरबों साल पहले खत्म हो गई थी.

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यह शोध  ऐसे समय में आया है जब नासा ने अपना पर्सिवियरेंस रोवर मंगल के लिए खासतौर पर वहां सूक्ष्मजीवन के संकोतों की तलाश के लिए भेजा है. यदि सब ठीक रहा तो पर्सिविरेंस 18 फरवरी 2021 को मंगल के जजीरो क्रेटर पर उतरेगा. यहां से वह मिट्टी के नमूने जमा करके लाएगा. जिससे मंगल के इतिहास के बारे में खास जानकारी मिल सकती है, फिर भी माना जा रहा है कि ये नमूने साल 2030 से पहले पृथ्वी पर नहीं आ सकते हैं.
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