लॉकडाउन से पूरी दुनिया में साफ हुई हवा, हम इसे कैसे रखेंगे बरकरार

लॉकडाउन से पूरी दुनिया में साफ हुई हवा, हम इसे कैसे रखेंगे बरकरार
लॉकडाउन के दौरान भारत में एयर क्लालिटी इंडेक्स काफी सुधरा है.

कोरोना वायरस (Corona Virus) जैसी वैश्विक महामारी (Pandemic) ने समाज को वायु प्रदूषण को अलग तरीके से देखने का नजरिया दिया है. भारत में वायु प्रदूषण की वजह से हर साल 12 लाख (12 Lakh Death) से ज्यादा लोग अपनी जान गंवाते हैं. साइंटिस्ट्स का मानना है कि लॉकडाउन जैसे तरीकों को अस्थाई तौर पर (Temperory options) अपनाकर प्रदूषण को नियंत्रित किया जा सकता है.

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कोरोना वायरस के दौरान तकरीबन दो महीने तक दुनियाभर में लॉकडाउन रहा है. हालांकि इसकी शुरुआत जनवरी महीने में चीन के वुहान से ही हो गई थी लेकिन जैसे-जैसे समय बीता वैश्विक स्तर पर लॉकडाउन किए गए. इस लॉकडाउन के बीच ऐसी-ऐसी तस्वीरें आईं जिन्हें देखकर लोगों को भरोसा नहीं हो रहा था. विशेष रूप से भारत जैसे देश जहां पर प्रदूषित हवा हर साल लाखों को लोगों की जिंदगी निगल जाती है, वहां पर एयर क्वालिटी इंडेक्स के एकदम से सुधरने की खबरें आईं.

पंजाब में दो सौ किलोमीटर दूर से लाहौर की पहाड़ियां दिखने और पश्चिमी यूपी से हिमालय साफ दिखने की तस्वीरों ने खूब धूम मचाई. सोशल मीडिया पर लॉकडाउन को ईश्वरीय न्याय से जोड़ने वालों की कोई कमी नहीं थी. लेकिन अब जबकि दुनिया के कई देशों में लॉकडाउन खुल रहा है और थोड़ी बहुत ढील जा रही है तो क्या हालात फिर पुरानी स्थिति में लौट जाएंगे?

दरअसल कोरोना वायरस जैसी वैश्विक महामारी ने समाज को वायु प्रदूषण को अलग तरीके से देखने का नजरिया दिया है. जहां एक तरफ लॉकडाउन ने वैश्विक अर्थव्यवस्था की रफ्तार बिल्कुल रोक दी तो वहीं इसकी वजह से वैश्विक प्रदूषण स्तर पर बड़ा फर्क देखने को मिला. समझना बिल्कुल आसान है क्योंकि जब फैक्टरियां बंद होंगी, सड़क पर वाहन नहीं होंगे, रेलगाड़ियों नहीं चलेंगी और विमानों पर भी रोक होगी तो इसका सीधा असर प्रदूषण लेवल पर पड़ना ही था.



बीच में खबरें आई थीं कि गंगा नदी के जल में प्रदूषण इतना कम हो गया है कि उत्तराखंड के कुछ इलाकों में सीधे इसका पानी पीने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. गंगा सफाई पर वर्षों से काम कर रहे लोगों के लिए चौंकाने वाली खबर थी.
बीच में खबरें आई थीं कि गंगा नदी के जल में प्रदूषण इतना कम हो गया है कि उत्तराखंड के कुछ इलाकों में सीधे इसका पानी पीने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है. गंगा सफाई पर वर्षों से काम कर रहे लोगों के लिए चौंकाने वाली खबर थी.




भारत में वायु प्रदूषण की वजह से हर साल 12 लाख से ज्यादा लोग अपनी जान गंवाते हैं. कई बीमारियां स्थाई तौर पर लोगों की जिंदगी में शामिल हो जाती हैं जैसे अस्थमा, एलर्जी या माइग्रेन जैसी समस्याएं. भारत में जैसे ही मार्च के आखिरी में लॉकडाउन की शुरुआत की गई तो सभी तरफ से एयर क्वालिटी इंडेक्स के बेहतर होने की खबरें आना शुरू हो गई थीं. दिल्ली और मुंबई जैसे प्रदूषित शहरों में हवा की गुणवत्ता में लगातार सुधार हुआ है. हालांकि बीच-बीच में ये एयर क्वालिटी इंडेक्स बहुत अच्छे से अनहेल्दी की तरफ बढ़ जाता है लेकिन हालात पहले जैसे नहीं होते.



याद कीजिए कि दिल्ली और उत्तर भारत के शहरों में दिवाली के बाद किस तरह स्मॉग की चादर पूरे हिस्से को अपनी चपेट में ले लेती है. बीते कुछ सालों में ये परेशानी और भी ज्यादा गंभीर होकर उभरी है. खतरनाक स्मॉग फैलने के बाद कई बार सरकारी तंत्र भी बिल्कुल नाकाम दिखाई देता है. तो क्या अब जिस तरह से लॉकडाउन खोले जा रहे हैं एक बार फिर सर्दियों के मौसम में वैसा ही स्मॉग देखने को मिलेगा. या फिर कुछ बदलाव कर हम लॉकडाउन से सीख सकते हैं.

द हिंदू पर प्रकाशित एक खबर के मुताबिक 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस के पहले एक्सपर्ट्स ने लॉकडाउन को अस्थाई तौर पर प्रदूषण के इलाज के रूप में देखा है. एक्सपर्ट्स का कहना है कि लॉकडाउन के दौरान वायु प्रदूषण के अलावा ध्वनि और जल प्रदूषण में भी कमी आई है.

बेंगलुरु के Centre for Atmospheric & Oceanic Sciences, Indian Institute of Science  में प्रोफेसर एस.के. सतीश के मुताबिक हवा की गुणवत्ता पर तो लॉकडाउन का बहुत व्यापक प्रभाव पड़ा है. अब स्थितियां सामान्य की तरफ बढ़ रही हैं. इसका सबसे बड़ा कारण इंसानी गतिविधियों पर रोक लगना है. दक्षिणी भारत के इलाकों में पार्टिकुलेट मैटर के कंसेंट्रेशन में 50 से 60 फीसदी की कमी आई है. वहीं अगर दिल्ली, यूपी, बिहार, पश्चिम बंगाल आदि की तरफ देखें तो यहां पर 75 फीसदी की कमी आई है.



प्रोफेसर सतीश का कहना है कि शहरी इलाकों में सबसे ज्यादा प्रदूषण गाड़ियों की वजह से होता है. लॉकडाउन ने इस पर तकरीबन पूरी तरह से रोक लगा दी. सिर्फ वो ही वाहन चलाए गए जिनका इमरजेंसी सर्विसेज में इस्तेमाल होता है.

आईआईटी गांधीनगर के अर्थ साइंस डिपार्टमेंट में प्रोफेसर मनीष कुमार सिंह का कहना है-मेरे विचार से लॉकडाउन में जिस तरह की रिकवरी प्रकृति की तरफ से दिखाई गई है, हम आगे भी अस्थाई तौर पर प्रदूषण की समस्या से निपटने के लिए लॉकडाउन का इस्तेमाल कर सकते हैं. विशेष तौर पर सर्दी की शुरुआत में जब उत्तर भारत बुरी तरह स्मॉग की चपेट में आ जाता है.

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First published: June 4, 2020, 6:06 PM IST
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