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Global Warming से दुनिया के मुकाबले तीन गुना ज्यादा गर्म हो रहा है आर्कटिक

Global Warming से दुनिया के मुकाबले तीन गुना ज्यादा गर्म हो रहा है आर्कटिक

आर्कटिक के स्थायी तुषारों (Permafrost) से पता चल रहा है कि यहां का वातावरण तेजी से गर्म हो रहा है. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

आर्कटिक के स्थायी तुषारों (Permafrost) से पता चल रहा है कि यहां का वातावरण तेजी से गर्म हो रहा है. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) पूरी दुनिया को गर्म कर रही है, लेकिन इसका असर दुनिया पर एक समान नहीं हैं, ध्रुवों पर ज्यादा हो रहा है. उत्तरी ध्रुव पर स्थायी तुषारों (Permafrost) के अध्ययन से पता चला है कि आर्कटिक (Arctic) इलाके में, दुनिया के बाकी हिस्सों की तुलना में ग्लोबल वार्मिंग का असर तीन गुना ज्यादा हो रहा है. इन स्थायी तुषारों में कार्बन का भारी भंडार अब रिसने लगा है जो पर्यावरण के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है और इनसे रिसने वाला कार्बन दुनिया भर में ग्लोबल वार्मिंग की गंभीरता को और ज्यादा बढ़ा सकता है.

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    जलवायु परिवर्तन (Climate Change) का असर दुनिया भर में हो रहा है. लेकिन इसका असर ध्रुवों पर सबसे पहले और सबसे ज्यादा होता है. वैसे तो जलवायु परिवर्तन के असर पर शोधकर्ताओं का ध्यान ध्रुवों पर कुछ ज्यादा ही है. ग्लोबल वार्मिंग (Global warming) के कारण जहां ध्रुवों की बर्फ की चादरों के पिघलने से वैज्ञानिक पहले ही परेशान हैं. अब वैज्ञानिक यहां के स्थायीतुषार (Permafrost) का अध्ययन कर रहे हैं जो अत्याधिक ठंड के कारम स्थायी रूप से जमी जमीन को कहते हैं. इसी के अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया है कि आर्कटिक का इलाका बाकी दुनियाके मुकाबले  तीन गुना ज्यादा तेजी से गर्म हो रहा है.

    क्या होते हैं स्थायीतुषार
    वैसे तो स्थायीतुषार उस भूमि को कहते हैं जो कम से कम लगातार दो साल तक जमी रही हो. उत्तरी गोलार्द्ध की जमीन का चौथाई हिस्सा इस तरह की जमीन के रूप में पाया जाता है. इसमें अलास्का, स्वीडन, ग्रीनलैंड, साइबेरिया जैसे उत्तरी ध्रुव के इलाकों अलावा हिमालय और तिब्बत के कई इलाके भी शामिल हैं.

    स्थायीतुषारों से मीथेन का रिसाव
    आर्कटिक इलाके के कई स्थायी तुषार वाले स्थानों और उसके आसपास के दलदली इलाकों, तालाबों आदि में से हाइड्रोजन सल्फाइड जिसे स्वाम्प या दलदली गैस का निकलना आम बात है, लेकिन वहां से अब मीथेन गैस का निकलना पर्यावरणविदों के लिए चिंता का विषय बन गया है. विशेषज्ञों कहना है कि लंबे समय से स्थायीतुषारों में बंद कार्बन के भंडार खुल गए हैं.

    कार्बन टाइमबम
    कार्बन डाइऑक्साइड और मीथेन के बीच इन स्थायीतुषारों में करीब 1700 अरब टन का जैविक कार्बन है जो वायुमंडल में पहले से मौजूद कार्बन का दो गुनी मात्रा  है. वैज्ञानिकों का कहना है कि स्थायी तुषार एक तरह के कार्बन टाइमबम की तरह होते हैं. मीथेन वैसे तो वायुमंडल में केवल 12 साल ही रह पाती है, वहीं कार्बन डाइऑक्साइड सदियों तक रहती है. लेकिन यह गैस सौ साल से CO2 सहित दूसरी ग्रीनहाउस गैसों की तुलना में 25 गुना ज्यादा ताकतवर होती है.

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    आर्कटिक के स्थायी तुषारों (Permafrost) कई सैंकड़ों और हजारों सालों से विद्यमान हैं और काफी मात्रा में कार्बन सरंक्षित किए हुए हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर: NASA)

    चालीस साल पहले ऐसे नहीं थे हालात
    स्वीडन के एबिस्को साइंटिफिक रिसर्च स्टेशन पर काम कर रहे उमेआ यूनिवर्सिटी में क्लाइमेट इम्पैक्ट्स रिसर्च सेंटर के प्रोजेक्ट कोऑर्डिनेटर कीथ लार्सन का कहना है कि जब 1970 के दशक में शोधकर्ताओं ने यहां आना शुरु किया और यहां के इलाकों की पड़ताल शुरु की तब यहां तालाब नहीं हुआ करते थे. तब वे हाइड्रजोन सल्फाइड की मीथेन मिली वैसी गंध नहीं महसूस करते थे जैसी अब मिलती है.

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    जलवायु परिवर्तन का एक चक्रीय तंत्र
    अबिस्को में जहां स्थायीतुषार कुछ मीटर ही मोटे हैं जो हजारों साल पुराने हैं. साइबेरिया के कई इलाकोंम में ये किलोमीटर से भी ज्यादा गहरे हैं और सैकड़ों हजारों साल पुराने हैं. आर्कटिक में औसत तापमान बढ़ने से ये स्थायीतुषार पिघलने लगे हैं. इससे यहां की मिट्टी के बैक्टीरिया इनमें जमा जैविक पदार्थ को विखंडन करने लगे हैं जिससे मीथेन निकलने लगती है और वह वायुमंडल में ग्रीन हाउसगैसों की मात्रा बढ़ा देती है इससे जलवायु परिवर्तन का एक चक्रीय तंत्र बन गया है.

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    आर्कटिक (Arctic) के इस तरह से तेजी से गर्म होने से पेरिस समझौते के लक्ष्य हासिल करना भी मुश्किल हो जाएगा. (फाइल फोटो)

    आर्कटिक तीन गुना गर्म हो रहा है
    विशेषज्ञों की चेतावनी है कि साल 2100 तक अगर अगर CO2 उत्सर्जन का काबू नहीं किया गया तो स्थायीतुषारों का भारी मात्रा में विगलन हो सकता है. 1971 से 2019 तक आर्कटिक का औसत तापमान जहां 3.1 डिग्री बढ़ा है, वहीं दुनिया का तापमान एक डिग्री बढ़ा है. डर यह भी है कि स्थायी तुषारों की स्थिति ऐसी जगह पहुंच सकती है जहां से वापसी मुश्किल हो सकती है.

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    शोधकर्ताओं का कहना है कि हमने ऐसा तंत्र सक्रिय कर दिया है जो सैकड़ों सालों तक कार्बन उत्सर्जन करता रहेगा. पूरे आर्कटिक में यह सब यहां के करीब 40 लाख लोगों को प्रभावित कर रहा है. यहां नए तालाब और झीलें बन सकती हैं, पानी के बहाव के नई रास्ते देखने को मिल सकी है. और कई इलाके पूरी तरह से सूख सकते हैं. इसमें सबसे बड़ा यही होगा कि प्रभाव पेरिस समझौते के लक्ष्यों को हासिल करने में परेशानी होगी.

    Tags: Climate Change, Environment, Global warming, Research, Science

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