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Global Warming रोकने के लिए क्यों जरूरी है पृथ्वी का ऊर्जा असंतुलन समझना

पृथ्वी (Earth) पर ऊर्जा के असंतुलन का अध्ययन ग्लोबल वार्मिंग की बेहतर तस्वीर दिखा सकता है.  (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

पृथ्वी (Earth) पर ऊर्जा के असंतुलन का अध्ययन ग्लोबल वार्मिंग की बेहतर तस्वीर दिखा सकता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

जलवायु परिवर्तन (Climate Change) पर हुए एक अध्ययन में शोधकर्ताओं ने ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) को रोकने के लिए पृथ्वी पर ऊर्जा के असंतुलन (Energy Imbalance of Earth) को समझने बहुत जरूरी है. 20 साल में पृथ्वी के तमाम हिस्सों से जमा किए गए ऊर्जा बदलाव के आकंड़ों के आधार पर वे इस नतीजे पर पहुंचे हैं कि ऊर्जा का असंतुलन का अध्ययन ही ग्लोबल वार्मिंग की सही तस्वीर दिखा सकता है.

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    अभी तक हम दुनिया में जलवायु परिवर्तन (Climate Change) और ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) के प्रभावों को ही देख कर उनका अनुमान लगा पा रहे हैं.  इसके लिए एक प्रमुख पैमाने वैश्विक वार्षिक औसत तापमान में इजाफा ही रहा है, लेकिन हकीकत यह है कि यह भी ग्लोबल वार्मिंग का एक असर ही है. जबकि ग्लोबल वार्मिंग का सीधा संबंध पृथ्वी पर ऊर्जा के संतुलन और उसके वितरण से हैं. नए अध्ययन में अमेरिकी वैज्ञानिकों ने 20 साल के अपने अवलोकनों और जुटाए गए आंकड़ों के आधार पर दर्शाया है कि पृथ्वी पर ऊर्जा का असंतुलन जलवायु परिवर्तन के आकार और प्रभाव को नापने के लिए बहुत ही अहम पैमाना है.

    पृथ्वी की ऊर्जा असंतुलन
    यह दावा हाल ही में एनवायर्नमेंटल रिसर्च: क्लाइमोट को पहले संस्करण में प्रकाशित इस अध्ययन में  नेशनल सेंटर ऑफ एटमॉस्फियरिक रिसर्च (NCAR) के शोधकर्ता केविन थ्रेनबर्थ और जलवायु वैज्ञानिक लीजिंग चेंग ने पृथ्वी पर तमाम स्रोतों से आई अतिरिक्त ऊर्जा का लेखा जोखा तैयार कर अपने अध्ययन में शामिल कर पृथ्वी की ऊर्जा असंतुलन पता लगाने के लिए उपयोग किया.

    20 सालों के आंकड़े
    थ्रेनबर्थ ने प्रमुख रूप से साल 2000 से लेकर 2019 वायुमडंल, महसागारों, जमीनों और बर्फों से आए ऊर्जा बदलावों का अध्ययन जलवायु तंत्र के घटकों के तौर पर किया और उनकी तुलना पृथ्वी के वायुमंडल के शीर्ष पर आ रहे विकिरण से कर यह जानने का प्रयास किया है की पृथ्वी पर शुद्ध ऊर्जा असंतुलन कितना है.

    ऊर्जा संतुलन- असंतुलन
    थ्रेनबर्ग बताते हैं कि शुद्ध ऊर्जा असंतुलन का आंकलन इस बात से किया जाता है कि पृथ्वी सूर्य से कितनी ऊष्मा का अवशोषण कर रही है और उसे वापस कितनी मात्रा में भेज पा रही है. सटीक रूप संपूर्ण गणना कर पाना तो अभी संभव नहीं है. इसलिए इसका असंतुलन करने का केवल एक ही व्यवहारिक तरीका है कि ऊर्जा में बदालव का लेखा जोखा रखा जाए.

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    दुनिया में ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) के प्रभावों का ज्यादा अध्ययन हो रहा है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

    वैश्विक औसत तापमान से बेहतर पैमाना
    स्रोतों से जलवायु तंत्र के शुद्ध ऊर्जा लाभ को समझने, तंत्र में कितनी अतिरिक्त ऊर्जा है और पृथ्वी के तंत्र में वह कैसे पुनर्वितरित हुई है, यह सब जानना जलवायु संकट से निपटने के बहुत जरूरी है. जबकि इससे पहले पृथ्वी की सतह के वैश्विक औसत तापमान में बढ़ोत्तरी को ध्यान में रख कर ही जलवायु शोध किए गए हैं.

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    चरम मौसमी घटनाओं में इजाफा
    पृथ्वी की सतह का वैश्विक औसत तापमान केवल संपूर्ण ऊर्जा असंतुलन के ही नतीजों में से एक है. अतिरिक्त अधिक ऊर्जा मौसमी तंत्रों को प्रभावित करती है और सीधे तौर पर कई चरम मौसमी घटनाएं जैसे भारी वर्षा, बाढ़, चक्रवाती तूफान, सूखे, ग्रीष्म लहरें और जंगल की आग की संख्या और तीव्रता में इजाफा करती है.

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    पृथ्वी के वायुमंडल की अधिकांश ऊष्मा को महासागर (Ocean) अवशोषित करते हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर: shutterstock)

    अधिकांश ऊष्मा महासागरों में
    मौसमी घटनाएं ऊर्जा को गतिमान करती हैं और जलवायु तंत्र को ऊर्जा को अंतरिक्ष में विकिरण के जरिए बाहर जाने से रोकती है. इससे भी वैश्विक तापमान में बढ़ोत्तरी देखने को मिलती है. इस अध्ययन से यह भी खुलासा हुआ है कि संतुलन से 93 प्रतिशत अतिरिक्त ऊष्मा पृथ्वी के महासागरों में जाती है जिससे समुद्र जलस्तर का तापमान बढ़ जाता है. इसी लिए सल 2021 अब तक सबसे गर्म महासागरों वाला साल था.

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    इस अध्ययन के सह लेखक लीजिंग चेंग बताते है कि पृथ्वी की ऊर्जा का असंतुलन का प्रतिमान बनाना बहुत ही चुनौतीपूर्ण काम है. उससे संबंधित काम और अवलोकन और उनके संश्लेषण को बेहतर के बहुत ज्यादा जरूरत है. दुनिया में ऊर्जा के सभी रूप कैसे वितरित हैं और उसके बाद विकिरण के जरिए वे अंतरिक्ष में कैसे जाते हैं यह सब हमारे भविष्य को जानने के लिए बहुत उपयोगी हो सकता है.

    Tags: Climate Change, Earth, Global warming, Research, Science

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