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Explained: कैसे ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण गर्म इलाकों में भी हो रही है बर्फबारी?

ग्लोबल वॉर्मिंग यानी तापमान बढ़ने के कारण जब ध्रुवीय बर्फ तक पिघल रही है - सांकेतिक फोटो (pixabay)
ग्लोबल वॉर्मिंग यानी तापमान बढ़ने के कारण जब ध्रुवीय बर्फ तक पिघल रही है - सांकेतिक फोटो (pixabay)

ग्लोबल वॉर्मिंग यानी तापमान बढ़ने के कारण जब ध्रुवीय बर्फ तक पिघल रही है और समुद्री स्तर बढ़ा है, तब दुनिया के अलग-अलग हिस्से बर्फबारी क्यों दिख रही है? इसके कई कारण हैं जो ग्लोबल वॉर्मिंग ( global warming results in more snow) से ही जुड़े हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: February 20, 2021, 1:47 PM IST
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देश में ठंड से राहत मिलती दिख रही है लेकिन दुनिया के कई हिस्से इस वक्त भीषण बर्फबारी की चपेट में हैं. अमेरिका के टेक्सास प्रांत में ठंड से पानी और गैस तक जम चुकी है, जिससे निवासियों के बुरे हाल हैं. यहां तक कि सऊदी अरब जैसे बेहद गर्म इलाके में भी स्नोफॉल हुआ, जो 5 दशकों में पहली बार दिखा. इससे तस्वीरें देखने वाले तो खुश हैं लेकिन विशेषज्ञ ग्लोबल वॉर्मिंग की चिंता जता रहे हैं.

जी हां, ग्लोबल वॉर्मिंग से केवल बर्फ पिघलती ही नहीं, बल्कि इससे बर्फबारी भी होती है. वैसे सालों तक बहुत से लोग विशेषज्ञों को संदेह से देखते रहे कि अगर ग्लोबल वॉर्मिंग हो रही है तो बर्फ कैसे गिर सकती है, फिर तो स्नोफॉल भी कम हो जाना चाहिए. लोग स्नोफॉल देखते हुए लगातार पर्यावरण के प्रति इस चिंता को खारिज करते रहे लेकिन वैज्ञानिक बता रहे हैं कि पर्यावरण में प्रदूषण के कारण तापमान बढ़ने के बाद भी स्नोफॉल संभव है.

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ग्लोबल वॉर्मिंग सुनने में तकनीकी और दूर की समस्या लगती है लेकिन ऐसा है नहीं- सांकेतिक फोटो (pixabay)




आइए, इससे पहले ग्लोबल वॉर्मिंग को समझते हैं. इसका अर्थ है धरती के तापमान में बढ़ोत्तरी और इसकी वजह से मौसम में बदलाव. ग्लोबल वॉर्मिंग सुनने में तकनीकी और दूर की समस्या लगती है लेकिन ऐसा है नहीं. इसका असर हम-आपके घरों तक आ पहुंचा है. बारिश के समय अतिवृष्टि या फिर सूखा पड़ना. गर्मियों में बारिश हो जाना या फिर ठंड में या तो बिल्कुल गर्म मौसम या फिर भीषण बर्फबारी होना. ये सारे ही मौसम के एक्सट्रीम हैं, जो ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण दिख रहे हैं. इस समस्या को सदी की सबसे बड़ी समस्या कहा जा रहा है और ये भी आशंका जताई जा रही है कि इसके कारण देश के कई हिस्से सूखा और भुखमरी के शिकार होने लगेंगे, जिससे तीसरे विश्वयुद्ध का खतरा हो सकता है.
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अब आगे समझते हैं कि ग्लोबल वॉर्मिंग यानी तापमान बढ़ने के कारण जब ध्रुवीय बर्फ तक पिघल रही है और समुद्री स्तर बढ़ा है, तब दुनिया के अलग-अलग हिस्से बर्फबारी क्यों देख रहे हैं. दरअसल ये मौसम चक्र में बदलाव का संकेत है. इसके कारण मौसम पहले जितना भरोसेमंद नहीं रह गया, बल्कि तेजी से और अजीबोगरीब तरीके से बदल रहा है. यही कारण है कि कुछ इलाकों में भयंकर स्नोफॉल होता है, जबकि कई ठंडे इलाके सूखे पड़े रहते हैं.

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दुनिया के कई हिस्से इस वक्त भीषण बर्फबारी की चपेट में हैं-सांकेतिक फोटो


कल-कारखानों में कोयले और लकड़ियां जैसी चीजें ईंधन के काम में लाने के कारण दुनिया का तापमान 1 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ा. ये सब दूसरे विश्वयुद्ध के बाद इंडस्ट्रिअल रिवॉल्यूशन के बाद हुआ. डीडब्ल्यू की एक रिपोर्ट में इसके हवाले से बताया गया कि साल 2010 से 2019 के नौ साल यानी लगभग एक दशक दुनिया का सबसे गर्म दशक रहा. लेकिन क्लाइमेट चेंज केवल तापमान बढ़ाने के लिए ही जिम्मेदार नहीं, बल्कि सऊदी जैसे इलाकों में बर्फबारी के लिए भी जिम्मेदार है.

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पॉट्सडैम इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट इंपेक्ट रिसर्च (Potsdam Institute for Climate Impact Research) के मुख्य अधिकारी Stefan Rahmstorf इस बारे में विस्तार से बताते हैं. वे यूरोप के बारे में बात करते हुए कहते हैं कि जैसे आर्कटिक पिछले 40 सालों में बाकी दुनिया से दोगुनी तेजी से गर्म हुआ. इससे वायु प्रणाली पर फर्क पड़ता है. समुद्र का जलस्तर बढ़ता तो है लेकिन पानी ठंडा होता है. ऐसे में बादलों से होते हुए बर्फबारी होने लगती है.

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ग्लोबल वॉर्मिंग का असर देशों की अर्थव्यवस्था पर भी होता है- सांकेतिक फोटो (pxfuel)


बर्फ बनने की प्रक्रिया को समझने पर स्नोफॉल को समझने में और आसानी होगी. बर्फ तब बनती है, जब हल्की गर्म हवा, बहुत ठंडी हवा से मिलती है. ध्रुवीय इलाकों से बर्फ पिघलने पर पानी और हवा दोनों ठंडे हो जाते हैं. तब यही हवा आगे बढ़ते हुए हल्की गर्म हवा से मिलती और बर्फबारी को जन्म देती है. यानी वायुमंडल की नमी ठंडी हवा से मिलकर बर्फ में बदल जाती है. यही टेक्सास और सऊदी में भी हुआ. टेक्सास में हालांकि ज्यादा नम हवा के कारण बर्फबारी ज्यादा भीषण हुई, जिससे वहां रहने वाले कई तरह की समस्याओं से गुजर रहे हैं.

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वैसे बता दें कि ग्लोबल वॉर्मिंग का असर देशों की अर्थव्यवस्था पर भी होता है. गर्मी बढ़ने के कारण लोगों की उत्पादकता कम होती है और ज्यादातर फसलों की उपज भी घटती है. स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में अर्थ सिस्टम साइंस के मार्शल बर्के ने इस बारे में एक रिपोर्ट भी तैयार की थी, जो बताती है कि कैसे ठंडे देश अमीर हो रहे हैं, जबकि गर्म देशों की अर्थव्यवस्था उतनी उन्नत नहीं हो सकी.
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