Climate Change: जानिए कैसे समुद्र के अंदर मिले हवाओं के बदलने के संकेत

अटलांटिक महासगार (Atlantic Ocean) की गहराइयों के अवासादों ने पछुआ पवनों (Westerlies) के इतिहास और भविष्य के संकेत दिए. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

अटलांटिक महासगार (Atlantic Ocean) की गहराइयों के अवासादों ने पछुआ पवनों (Westerlies) के इतिहास और भविष्य के संकेत दिए. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

सागरों के नीचे अवसादों (Sediments) की धूल से पता चला कि लाखों साल पहले पछुआ पवनें (Westerlies) कैसे बहा करती थी. इससे उन्हें भविष्य में जलवायु परिवर्तन (Climate Change) का इन पवनों पड़ने वाले प्रभाव पता चले.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 8, 2021, 6:30 PM IST
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अभी तक जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के इंसानों और पृथ्वी के अन्य हिस्सों पर प्रभाव का अनुमान तो लगाया जा चुका है, लेकिन इनकी वजह से पछुआ पवनों (Westerlies) में क्या बदलाव होगा यह पता नहीं चल सका था. ताजा अध्ययन में शोधकर्ताओं ने गहरे समुद्र के अवसादों (Deep Sea sediments) में छिपी धूल से पछुआ पवनों के इतिहास का पता लगाया है जिससे उन्हें जलवायु परिवर्तन का इन पवनों पर असर और भविष्य में होने वाले बदलावों के बारे पता चला है.

क्या है इन पवनों की अहमियत

पछुआ पवनें दुनिया भर में वैश्विक और स्थानीय स्तर पर मौसम और जलवायु में अहम योगदान देती हैं. वे वर्षण के स्वरूप, महासागरों की धाराओं और उष्णकटिबंधीय चक्रवातों को को नियंत्रित करती है. इसीलिए जलवायु परिवर्तन और ग्लोबल वार्मिंग इन पवनों पर क्या असर डालता है यह अध्ययन करना जरूरी है.

आ रहा है इनमें बदलाव
पछुआ पवनें पश्चिम से पूर्व की ओर मध्य अक्षांशों में पूरे ग्रह पर दौड़ती हैं. लेकिन वैज्ञानिकों ने पाया है कि पिछले कई दशकों से इन पवनों में बदलाव आ रहा है और ये अपना स्थान बदलकर  ध्रुवों की ओर जा रही हैं. शोध सुझाता है कि इसका कारण जलवायु परिवर्तन है. लेकिन वैज्ञानिक यह बहस कर रहे हैं कि क्या पछुआ पवनों का ध्रुवों की ओर जाना तापमान और कार्बन डाऑक्साइड के बढ़ने से होने वाली वार्मिंग के कारण जारी रहेगा या नहीं.

ग्लोबल वार्मिंग का प्रभाव?

इस सवाल का जवाब पाना आसान नहीं है क्योंकि अब तक पिछले गर्म जलवायु हालातों में पछुआ पवनों के बारे में हमारी जानकारी सीमित थी. लेकिन इस सप्ताह नेचर जर्नल में प्रकाशित शोधपत्र में कोलंबिया यूनिवर्सिटी की लैमोन्ट-डोहर्टी अर्थ ऑबजर्वेटरी के जलवायु शोधकर्ताओं ने एक नई पद्धति निकाली है जिससे पछुआ पवनों के पुरातन इतिहास के बारे में पता चलेगा. इससे हमें गर्म होती दुनिया के भविष्य की झलक भी मिल सकती है.



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पछुआ पवनों (Westerlies) में ये बदलाव ग्लोबल वार्मिंग (Global warming) की वजह से आ रहे है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)


विज्ञान की इस शाखा का उपयोग

इस अध्ययन के प्रमुख लेखक और लैमोन्ट स्नातक छात्र जोर्डन अबेल और उनकी सलाहकार गीजिला वेंकलर ने पछुआ पवनों के बर्ताव के सवाल के जवाब पाने के लिए पेलियोक्लाइमेटोलॉजी (paleoclimatology) के उपयोग करने का तरीका निकाला है. पेलियोक्लाइमेटोलॉजी में पुरानी जलावायु का अध्ययन किया जाता है. उन्होंने ऐसे प्रमाण पाए जो सुझाते हैं कि वायुमंडलीय प्रवाहों का स्वरूप जलवायु के गर्म होने से बदल जाता है.

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गहरे समुद्र के अवासादों का अध्ययन

इस शोध की पड़ताल पहले की पवनों को लेकर हमारी समझ में बदलाव दर्शा रही है. इससे यह जानने में मदद मिल रही है कि पवनें पहले कैसे बदला करती थीं और अब भविष्य में किस तरह से बदलेंगी. शोधकर्ताओं ने गहरे समुद्र की पुरातन अवसादों में छिपी धूल को पवनों के संकेतक के रूप में उपयोग किया. इससे वे 30 से 50 लाख साल पहले, प्लियोसीन युग में,  होने वाले पवन स्वरूपों को जानने में सफल रहे. यह जानकर कि पवनें सुदूर रेगिस्तानों से धूल लेकर आती हैं, शोधकर्ताओं ने उत्तरी प्रशांत महासागर के इलाकों का अध्ययन किया.

कैसे पता चला इनका इतिहास

इस क्षेत्र में पूर्वी एशिया से पवनें आती हैं जो आज भी धूल के सबसे बड़े स्रोतों में से एक है और जिससे पिछले लाखों सालों से धूल पैदा करने वाला क्षेत्र है. शोधकर्ताओं ने उत्तरी अंटलांटिक में हजारों किलोमीटर दूर दो अलग-अलग इलाकों की समुद्री अवसादी धूल का अध्ययन किया जिससे वे धूल के बदलावों की और अंततः पछुआ पवनों के पुरातन स्वरूप की जानकारी हासिल कर सके.

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गहरे समुद्र के अवसादों में छिपी धूल से पछुआ पवनों (Westerlies) के स्वरूपों की जानकारी मिली. (प्रतीकात्मक तस्वीर)


ध्रुवों की ओर

एबेल ने बताया कि वे फौरन ही इन स्वरूपों की पहचान कर सकते थे. आंकड़े बहुत स्पष्ट थे. उनका काम आधुनिक अवलोकनों से पूरी तरह से मेल खाता दिखा. इससे पता चला कि पवनों के स्वरूप जलवायु के गर्म होने बदल जाएंगे. प्लियोसीन युग में  पृथ्वी आज से 2 से 4 डिग्री सेल्सियस ज्यादा गर्म थी, लेकिन तब हवा में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा वैसी ही थी जैसे अब है. ऐसे माहौल में तब पछुआ पवनें ध्रुवों के पास बहती थीं.

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इसी से शोधकर्ताओं ने अनुमान लगाया है कि आधुनिक ग्लोबल वार्मिंग का क्या असर होगा और वे इस नतीजे पर पहुंचे कि पछुआ पवनों को ध्रुवों की खिसकना जारी रहेगा. इसका हमारी जलवायु में चक्रवातों आदि और वर्षा के सिस्टम पर बहुत बड़ा असर होगा.
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