क्यों माना जाता है कि सूली पर लटकाए जाने के बाद य़ीशु बचकर कश्मीर आ गए थे

गुड फ्राइडे के दिन येरूशलम में यीशु मसीह को सूली पर लटकाया गया था
गुड फ्राइडे के दिन येरूशलम में यीशु मसीह को सूली पर लटकाया गया था

कई किताबें और दस्तावेज ये दावा करती हैं कि येरूशलम में सूली पर लटकाए जाने के बाद क्राइस्ट बच गए थे. फिर वो अपने काफिले के साथ चुपचाप कश्मीर आ गए. फिर लंबे समय तक यहीं रहे. कश्मीर सरकार और बीबीसी द्वारा बनवाई गई डॉक्युमेंट्री भी ऐसा ही कहती हैं

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 10, 2020, 7:16 PM IST
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पूरी दुनिया 10 अप्रैल को गुड फ्राइडे मना रही है. गुड फ्राइडे वो दिन है जिस दिन येरूशलम में यीशु मसीह को सूली पर चढ़ा दिया गया था. कई किताबों और डॉक्युमेंट्री फिल्मों में दावा किया गया है कि सूली पर चढ़ने के बावजूद यीशु बच गए थे. इसके बाद वो फारस और सिल्क रूट होते हुए कश्मीर आ गए थे. उनका बाद का जीवन यहीं गुजरा. कई नामी लेखकों ने ही नहीं बल्कि बीबीसी और कश्मीर सरकार की डॉक्यूमेंट्री फिल्मों में इस दावे को सही माना जाता है.

कहा जाता है कि जब इजरायल में यीशु मसीह को सलीब पर लटकाया गया तो उसके दो दिन बाद तक वो जिंदा रहे थे. फिर रहस्यमय तरीके से गायब हो गए. कहां गायब हो गए ये रहस्य है. आज भी इसे लेकर बहुत सी बातें प्रचलित हैं. इस रहस्य का संबंध ईसा और कश्मीर के बीच के सिरों से जुड़ता है. इतिहासकारों और शोधकर्ताओं का मानना है कि ईसा का ये रहस्यकाल कश्मीर में बीता.

बीबीसी में करीब दो दशक पहले सैम मिलर ने एक रिपोर्ट लिखी. उसमें उन्होंने श्रीनगर के बाहर बनी एक प्राचीन रोजाबल दरगाह को जीसस टॉम्ब के तौर पर संबोधित किया. केवल वही नहीं यूरोप और अमेरिका से जितने टूरिस्ट कश्मीर जाते हैं, उन सभी की उत्सुकता श्रीनगर जाकर जीसस टॉम्ब देखने की होती है. माना जाता है कि निधन के बाद ईसा मसीह को यहीं दफनाया गया. ये कब्र आज भी मौजूद है. इसे दो हजार साल से कहीं ज्यादा पुराना बताया जाता है.



इसी रिपोर्ट में मिलर लिखते हैं कि ये दरगाह एक पुरानी बिल्डिंग में है. पहले तो इसके बारे में बहुत कम लोग जानते थे लेकिन अब ज्यादातर लोग यहां जाना चाहते हैं लेकिन ये इतना आसान नहीं रह गया है. श्रीनगर के रोजाबल श्राइन को ईसा मसीह की करीब दो हजार साल पुरानी कब्र माना जाता है. "दा विंची कोड" के बेस्ट सेलर बुक बनने के बाद इस टॉम्ब को लेकर दुनियाभर में उत्सुकता जग गई.
 


वेटिकन बेशक सिरे से इस बात को खारिज करता है लेकिन ये बात इतने ढेर सारे तथ्यों के साथ कही जाती हैं और इसके पक्ष में ऐसे साक्ष्यों का दावा किया गया है कि लगता है कि ऐसा हुआ हो तो हैरानी नहीं होनी चाहिए.

कई शोधकर्ताओं का मानना है कि जीसस की मृत्यु सूली पर चढ़ाने से नहीं हुई थी. सूली पर चढ़ाए जाने के बाद भी वो बच गए. फिर मध्यपूर्व  के रास्ते भारत आ गए. भारत वो इसलिए आए ,क्योंकि अपनी युवावस्था में भी वो यहां आ चुके थे. फिर उनका जीवन भारत में बीता. रोजाबल में जिस शख्स का मकबरा है, उसका नाम यूजा आसफ है. शोधकर्ताओं का मानना है कि यूजा आसफ कोई और नहीं बल्कि ईसा मसीह या जीसस ही हैं.

कई डॉक्यूमेंट्रीज और किताबों में दावा
क्राइस्ट के भारत आने पर बीबीसी लंदन ने 42 मिनट की डॉक्यूमेंट्री 'जीसस इन इंडिया' बनाई. श्रीलंका में करीब सवा घंटे की एक डॉक्यूमेंट्री बनाई गई- जीसस वाज ए बौद्धिस्ट मांक'. ईसा के भारत आने पर तमाम किताबें लिखी गईं. कई दशकों पहले कश्मीर के जाने-माने लेखक अजीज कश्मीरी ने अपनी किताब क्राइस्ट इन कश्मीर' से लोगों को ध्यान खींचा. आंद्रेयस फेबर कैसर ने जीसस डाइड इन कश्मीर ' लिखी तो जाने माने लेखक एडवर्ड टी मार्टिन ने  'किंग ऑफ ट्रेवलर्सः जीसस लास्ट ईयर इन इंडिया' लिखी.

रोजाबल की वो दरगाह, जिसकी कब्र के बारे में माना जाता है कि ये ईसा मसीह की है. हालांकि इसको लेकर अलग-अलग दावे हैं


घाटी में प्राचीन समय से रहते हैं यहूदी नस्ल के लोग
सुजैन ओस ने भी इसी विषय पर चर्चित किताब लिखी. जम्मू-कश्मीर आर्कियोलॉजी, रिसर्च एंड म्यूजियम में अर्काइव विभाग के पूर्व डायरेक्टर डॉ. फिदा हसनैन जब लद्दाख गए तो उन्होंने इस बारे में बौद्ध मठ में एक दस्तावेज देखा, तो उनकी भी दिलचस्पी इसमें पैदा हुई. तब उन्होंने राज्य में इस बारे में पुरानी किताबें और साक्ष्य तलाशने शुरू किए. जो कुछ उन्हें मिला, वो इशारा करता था कि ईसा के भारत आने की बात में दम है. पहलगाम का क्षेत्र डीएनए संरचना के अनुसार मुसलमान बने यहूदी नस्ल के लोगों से भरा हुआ है.

रोजाबल दरगाह की ये कब्र उत्तर पूर्व दिशा में है, इसे ईसा की कब्र माना जाता है


क्यों उठाए जाते हैं सवाल भी
कई विद्वानों ने शोध से साबित करने की कोशिश की कि ये कब्र किसी और की नहीं, बल्कि ईसा मसीह या जीसस की है. सवाल उठता है कि अगर जीसस की मौत सूली पर चढ़ाए जाने की वजह से येरूशलम में हुई तो उनका मकबरा 2500 किमी दूर कश्मीर में कैसे हो सकता है. बाइबल भी ईसा को सूली पर चढ़ाने के बाद उनके 12 बार अलग-अलग समय पर लोगों के सामने आकर मानव रूप में जीवित होने का प्रमाण देती है.

कब्र में बड़े पैर के निशान, जिसमें दोनों पैरों में कील ठोके जाने के निशान नजर आ रहे हैं. ये रोजाबल दरगाह में रखे हुए हैं.


क्या पहले भी भारत आए थे ईसा 
ईसा मसीह ने 13 साल से 30 साल की उम्र के बीच क्या किया, ये रहस्य सरीखा ही है. बाइबल में उनके इन वर्षों का कोई जिक्र नहीं मिलता. लेकिन ऐसा कहा जाता है और ऊपर जिन तमाम लेखकों का नाम आया है उन्होंने भी लिखा है कि शायद अपने युवावय में वो भारत आए थे, यहां वो कई जगहों पर भ्रमण करते रहे. जब वो लौटे तो फिर उन्होंने येरूशलम में योहन्ना से दीक्षा ली.

इसके बाद वो इजराइल में जगह-जगह उपदेश देने लगे. उनके इन उपदेश तत्कालीन धर्माचार्यों और सत्ता को पसंद नहीं थे. ज्यादातर विद्वानों के अनुसार सन 29 ई. को ईसा येरूशलम पहुंचे. वहीं उनको दंडित करने का षड्यंत्र रचा गया. जब उन्हें सलीब पर लटकाया गया, उस वक्त उनकी उम्र करीब 33 वर्ष थी.

किस रूट से आए थे यहां 
सूली पर लटकाए जाने के दो दिन बाद उन्हें जीवित देखा गया. फिर वो गायब हो गए. कभी यहूदी राज्य में नजर नहीं आए. फिर उनके कश्मीर में होने का उल्लेख है. ईसा ने दमिश्क, सीरिया का रुख करते हुए सिल्क रूट पकड़ा. वह ईरान, फारस होते हुए भारत पहुंचे. कश्मीर में वो 80 वर्ष की उम्र तक रहे.

जीसस के भारत आने को लेकर कई किताबें लिखी गईं. जिसमें उनके कश्मीर आकर रहने का उल्लेख है


अहमदिया समुदाय का क्या मानना है
हिंदू ग्रंथ "भविष्यपुराण" में भी कथित उल्लेख है कि ईसा मसीह भारत आए थे. उन्होंने कुषाण राजा शालीवाहन से मुलाकात की थी. मुस्लिमों का अहमदिया समुदाय भी यकीन करता है कि रोजाबल में मौजूद मकबरा ईसा या जीसस का ही है. अहमदिया समुदाय के संस्थापक हजरत मिर्जा गुलाम अहमद ने 1898 में लिखी अपनी किताब ‘मसीहा हिंदुस्तान में ' ये लिखा कि रोजाबल स्थित मकबरा जीसस का ही है जिनकी शादी कश्मीर प्रवास के दौरान मरजान से हुई. उनके बच्चे भी हुए.

जीसस के भारत में रहने और यहीं उनके निधन पर कई शोधकर्ताओं की किताबें पिछले सालों में प्रकाशित हुई हैं


एक रूसी विद्वान ने सबसे पहले किया था दावा
जर्मन लेखक होलगर्र कर्सटन ने अपनी किताब ‘जीसस लीव्ड इन इंडिया’ में इस बारे में विस्तार से लिखा है. पहली बार सन 1887 में रूसी विद्वान, निकोलाई अलेक्सांद्रोविच नोतोविच ने संभावना जाहिर की थी कि शायद जीसस भारत आए थे. नोतोविच कई बार कश्मीर आए थे. जोजी ला पास के नजदीक स्थित एक बौद्ध मठ में वो मेहमान थे, जहां एक भिक्षु ने उन्हें एक बोधिसत्व संत के बारे में बताया जिसका नाम ईसा था.

नोतोविच ने पाया कि ईसा औऱ जीसस क्राइस्ट के जीवन में कमाल की समानता है. निकोलस नोतोविच एक रूसी यहूदी राजदूत, राजनीतिज्ञ और पत्रकार थे. उन्होंने अंतरराष्ट्रीय तौर पर पहली बार ये दावा किया था.

रूसी विद्वान और लेखक निकोलाई नोतोविच, जो लद्दाख के बौद्ध मठ में ठहरे और फिर "अननोन ईयर्स ऑफ जीसस" किताब लिखी


 भारत सरकार की डॉक्यूमेंट्री 
इस बारे में भारत सरकार के फिल्म प्रभाग की करीब 53 मिनट की डॉक्यूमेंट्री ''जीसस इन कश्मीर'' कमाल की है. इसने बहुत प्रमाणिक ढंग से बताया है कि किस तरह जीसस भारत में आकर रहे. उनका ये प्रवास लद्दाख और कश्मीर में था.

हालांकि रोमन कैथोलिक चर्च और वेटिकन इसे नहीं मानते. ये डॉक्यूमेंट्री इशारा करती है कि जीसस अपने खास लोगों के साथ कश्मीर आए थे. फिर यहीं के होकर रह गए. उनके साथ आए यहूदी यहीं के बाशिंदे हो गए.

इजरायल का ये ट्राइबल मैप बताता है कि सैकड़ों साल पहले जो कबीले वहां से गायब हो गए थे, वो अब कश्मीर में हैं. ये लोग अपने नाम भी उसी तरह रखते हैं, जिस तरह इजरायली.


इजरायल के 10 यहूदी कबीलों के वंशज कश्मीर में
भारत सरकार के फिल्म प्रभाग की ये डॉक्यूमेंट्री प्रमाणिक रूप से भारत में ईसा मसीह के संबंध पर ध्यान खींचती है. भारतीय सेंसर बोर्ड से पास इस डॉक्यूमेंट्री में 2000 साल पुराने शिव मंदिर के अभिलेखों, संस्कृत और बौद्ध पांडुलिपियों में यीशू के यहूदी नाम यसूरा के इस्तेमाल, सम्राट कनिष्क के अनदेखे सिक्कों और तिब्बती ऐतिहासिक पांडुलिपियों द्वारा उनके कश्मीर आने को साबित किया गया है.

इजरायल के कुल 12 यहूदी कबीलों में गुम हुए 10 यहूदी कबीलों में कुछ के वंशज अफगान और कश्मीर में ही बसे हुए हैं. उन्हें "बनी इजरायल " कहा जाता है. वो सभी बेशक मुस्लिम बन चुके हैं, लेकिन उनका खानपान और रीति रिवाज कश्मीरियों से अलग हैं. वो कश्मीरियों से रोटी-बेटी के संबंध नहीं रखते.


कहां है श्रीनगर में ये कब्र
श्रीनगर के जिस छोटे से मोहल्ले खानयार में ये कब्र बताई जाती है. वो पिछले कुछ सालों में दुनियाभर के ईसाईयों और धार्मिक इतिहासकारों के आकर्षण का केंद्र भी बनती रही है. खानयार के रोजाबल में जो कब्र है, वो उत्तर-पूर्व दिशा में है जबकि मुसलमानों की कब्रें दक्षिण-पश्चिम में होती हैं.

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