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गोपाल सिंह विशारद: राम भक्त को मौत के 33 साल बाद मिला पूजा का अधिकार

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Updated: November 10, 2019, 3:06 PM IST
गोपाल सिंह विशारद: राम भक्त को मौत के 33 साल बाद मिला पूजा का अधिकार
गोपाल सिंह विशारद ने 1950 में अयोध्या विवाद को लेकर कानूनी लड़ाई शुरू की थी.

अयोध्या में राम जन्मभूमि में भक्त गोपाल सिंह विशारद (Gopal Singh Visharad) की पूजा की मांग वाली याचिका के 69 साल बाद न्याय मिला. हालांकि फैसला आने के 33 साल पहले ही विशारद का निधन हो गया है.

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  • Last Updated: November 10, 2019, 3:06 PM IST
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सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) की पांच जजों वाली स्पेशल बेंच ने वर्षों से विवादित राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद (Ram Janmabhoomi-Babri Masjid dispute) पर सर्वसम्मति से अपना फैसला शनिवार को दे दिया है. कोर्ट ने विवादित 2.77 एकड़ की जमीन को राम लला विराजमान के अधिकार में विधिवत दे दिया है. कोर्ट के फैसले से 1950 के पहले याची गोपाल सिंह विशारद को उनकी मौत के 33 साल बाद राम जन्मभूमि पर पूजा का अधिकार भी मिल गया है. दरअसल गोपाल सिंह ने ही सबसे पहले इस विवाद पर कानूनी लड़ाई शुरू की थी.

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद राम भक्त गोपाल सिंह विशारद को उनकी पूजा करने की मांग वाली याचिका के 69 साल बाद अधिकार मिला. हालांकि फैसला आने से 33 साल पहले ही गोपाल सिंह का 1986 में निधन हो गया है. सुप्रीम कोर्ट के फैसले में लिखा गया है कि विवादित जमीन में याचीकर्ताओं के पूजा करने का अधिकार प्रशासन के अधीन है. शांति और व्यवस्था के मद्देनजर संबंधित अधिकारी पूजा करने का अधिकार प्रदान कर सकता है. कोर्ट के इस फैसले के पीछे प्रथम याचीकर्ता गोपाल सिंह के संदर्भ में ही है.

सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने से 33 साल पहले ही गोपाल सिंह का 1986 में निधन हो गया है.


1950 में अयोध्या विवाद पर शुरू की कानूनी लड़ाई

बता दे कि गोपाल सिंह ही वो पहले व्यक्ति थे, जिन्होंने 1950 में फैजाबाद सिविल कोर्ट में एक पिटीशन दायर करके विवादित ढांचे के अंदर पूजा करने के अधिकार की मांग की थी. गोपाल सिंह विशारद और एम. सिद्दीक दोनों ही राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के मेन याचीकर्ता थे. दोनों के निधन के बाद उनके वारिसों ने इस कानूनी प्रक्रिया को आगे बढ़ाया.

अयोध्या की इस विधिक लड़ाई के पीछे 1949 की एक घटना है. कहा जाता है कि दिसंबर 1949 की एक रात कुछ लोगों द्वारा रात में विवादित ढांचे के अंदर राम-जानकी और लक्ष्मण की मूर्तियां रख दी गई थीं. जिसके बाद 1950 में गोपाल सिंह विशारद ने अदालत में एक पिटीशन दायर करके भगवान राम की पूजा करने की मांग की थी.

गोपाल सिंह विशारद और एम. सिद्दीक दोनों ही राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद के मेन याचीकर्ता थे.

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पिता की मौत के बाद बेटे ने लड़ी कानूनी लड़ाई
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद, गोपाल सिंह विशारद के बेटे राजेंद्र सिंह ने कहा कि 1986 में अपने पिता के निधन के बाद, उन्होंने राम जन्मभूमि केस की कानूनी लड़ाई जारी रखी. उन्होंने कहा कि उनके दिवंगत पिता गोपाल सिंह विशारद भगवान राम की पवित्र नगरी में रहना चाहते थे. इसलिए वो अयोध्या में आ गए थे.

राजेंद्र सिंह ने कहा कि 1949 में विवादित ढांचे में राम लला की मूर्तियों को रखने के बाद से विशारद नियमित रूप से पूजा करने विवादित स्थल में जाते थे. जनवरी 1950 में जब विवादित स्थल पर जहां राम लला की मूर्तियां रखी थीं, सुरक्षा अधिकारियों ने उनको प्रवेश करने से रोका दिया. तो इसके बाद गोपाल सिंह विशारद ने फैजाबाद के सिविल कोर्ट में पूजा करने के अधिकार की मांग करते हुए याचिका दायर की.

दिवंगत गोपाल सिंह विशारद भगवान राम की पवित्र नगरी में रहना चाहते थे.


विशारद ने सरकार और जहूर अहमद को पार्टी बनाया
गोपाल सिंह विशारद ने अदालत में पेश अपनी याचिका में सरकार, जहूर अहमद और अन्य मुस्लिमों को पार्टी बनाया था.  उन्होंने अपनी याचिका में अदालत से यह मांग किया कि विवादित ढांचे से भगवान राम की मूर्तियों को नहीं हटाया जाना चाहिए. साथ ही अदालत से विशारद ने दर्शन करने और पूजा करने के अधिकार की मांग की.

सिविल जज ने उसी दिन याचिका पर सुनवाई करते हुए मूर्तियों को हटाने को लेकर स्थगन आदेश दिया. हालांकि उनको पूजा करने का अधिकार नहीं दिया गया. 1950 में गोपाल सिंह विशारद की याचिका से शुरू हुई राम जन्मभूमि की कानूनी लड़ाई में बाद में और कई याचिकाओं और काउंटर याचिकाओं के साथ आगे बढ़ाया गया.

विशारद की याचिका के बाद कई और याचिका
विशारद के बेटे राजेंद्र सिंह ने वॉल स्ट्रीट जर्नल को दिए एक इंटरव्यू में कहा कि बाद के वषों में कई नई पिटीशन और काउंटर पिटीशन अदालत में दायर की गयीं. अनगिनत सुनवाईयों के बाद गोपाल सिंह विशारद ने विवाद के लंबा होने के चलते इस्तीफा दे दिया. क्योंकि उनका मानना था कि सरकार इस विवाद को सुलझाने में कोई रुचि नहीं ले रही है.

अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद की यह कानूनी लड़ाई बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट स्थानांतरित कर दिया गया. इलाहाबाद हाईकोर्ट में चली कई वर्षों की सुनवाई और भारतीय पुरातत्व विभाग के सर्वेक्षण रिपोर्ट आने के बाद वर्ष 2010 में अपना फैसला दिया. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एएसआई की रिपोर्ट के आधार पर माना कि विवादित ढांचे के नीचे मंदिर था.

अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद की यह कानूनी लड़ाई बाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट स्थानांतरित कर दिया गया


2010 में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में विवादित भूमि को तीन पक्षकारों- सुन्नी वक्फ बोर्ड, निर्मोही अखाड़ा और राम लला विराजमान को बराबर-बराबर बांट दिया. हाईकोर्ट के फैसले से असंतुष्ट सभी पक्षों ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई. सुप्रीम कोर्ट ने वर्षों से चले आ रहे इस विवाद पर लगातार 40 दिनों तक सुनवाई की. इसी साल 16 अक्टूबर को कोर्ट ने मामले का फैसला सुरक्षित कर लिया था.

बता दें कि सुप्रीम कोर्ट के इतिहास में यह दूसरी बार है जब लगातार इतने दिनों तक सुनवाई चली. इससे पहले केशवा नंद भारती बनाम भारत सरकार के मामले में कोर्ट की संविधान बेंच में लगातार 62 दिनों तक सुनवाई चली थी. अयोध्या मामले पर सुप्रीम कोर्ट की चीफ जस्टिस की अगुवाई वाली स्पेशल बेंच ने शनिवार को अपना फैसला दिया.

कोर्ट के फैसले में विवादित जमीन पर राम लला विराजमान के अधिकारों को मान्यता दी गई है. कोर्ट ने सरकार को एक ट्रस्ट स्थापित करने का निर्देश दिया गया है, जो मंदिर के निर्माण और अन्य मुद्दों से निपटेगा. वहीं दूसरी ओर मस्जिद बनाने के लिए सुन्नी वक्फ बोर्ड को अयोध्या में 5 एकड़ की जमीन उपलब्ध करने का निर्देश दिया.

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First published: November 10, 2019, 1:38 PM IST
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