भारत में आज ही के दिन बनी थी देश की सबसे बहादुर मानी जाने वाली गोरखा रेजिमेंट

गोरखा रेजिमेंट (Gorkha Regiment) की स्थापना अंग्रेजों ने उनकी बहादुरी से प्रभावित होकर की थी. (फाइल फोटो)

गोरखा रेजिमेंट (Gorkha Regiment) की स्थापना अंग्रेजों ने उनकी बहादुरी से प्रभावित होकर की थी. (फाइल फोटो)

भारतीय सेना (Indian Army) की सबसे बहादुर मानी जाने वाली गोरखा रेजिमेंट (Gorkha Regiment) का गठन ईस्ट इंडिया कंंपनी (East India Company) ने 24 अप्रैल 1815 को किया था.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 24, 2021, 6:32 AM IST
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भारतीय सेना (Indian Army) यूं तो पूरी तरह से एक ही है, लेकिन इसकी रेजिमेंट अपने अपने इतिहास के लिए जानी जाती हैं. इन्हीं में से एक है गोरखा रेजिमेंट (Gorkha Regiment) जिसका गठन 24 अप्रैल 1915 में हुआ था. इस रेजिमेंट का शानदार इतिहास है और यह भारत ही नहीं बल्कि दुनिया की सबसे बहादुर रेजिमेंट (Bravest Regiment) में से एक मानी जाती है.

बहादुर समुदाय के लोग

गोरखा समुदाय के लोग हिमालय की पहाड़ियों, खासकर नेपाल और उसके आसपास के इलाकों में रहते हैं. लेकिन इन्हें आमतौर पर नेपाली ही माना जाता है. ये लोग बहुत ही बहादुर माने जाते हैं. यहां तक कि भारत में कई जगह गोरखाओं को बहादुर कह कर भी पुकारा जाता है. भारतीय सेना के भूतपूर्व चीफ ऑफ स्टाफ जनरल सैम मानेकशॉ ने कहा था कि यदि कोई कहता है कि मुझे मौत से डर नहीं लगता, वह या तो झूठ बोल रहा है या गोरखा है.

कैसे पैदा हुआ गोरखा रेजिमेंट बनाने का विचार
गोरखा रेजिमेंट के गठन के कहानी बहुत रोचक है. साल 1815 में जब ईस्ट इंडिया कंपनी का युद्ध नेपाल राजशाही से हुआ था, तब नेपाल को हार मिली थी लेकिन नेपाल के गोरखा सैनिक बहादुरी से लड़े थे. बताया जाता है कि अंग्रेजों से लड़ाई के दौरान गोरखाओं की बहादुरी से सर डेविड ऑक्टरलोनी इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने गोरखाओं के लिए अलग रेजिमेंट बनाने का फैसला किया.

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गोरखा रेजिमेंट (Gorkha Regiment) का प्रशिक्षण कार्यक्रम बहुत ही कठोर होता है. (फाइल फोटो)


भारत में अंग्रेजी सेना की शान



अंग्रेजों से युद्ध के बाद 24 अप्रैल 1815 को रेजिमेंट की नींव पड़ी. बाद में जब 1816 में अंग्रेजों और नेपाल राजशाही के बीच सुगौली संधि हुई तो तय हुआ कि ईस्ट इंडिया कंपनी में एक गोरखा रेजिमेंट बनाई जाएगी, जिसमें गोरखा सैनिक होंगे. तब से लेकर अब तक गोरखा भारतीय फौजों का अनिवार्य हिस्सा बने हुए हैं. उनकी बहादुरी के किस्से लगातार कहे और सुने जाते हैं.

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शुरू से ही दिखाई बेमिसाल बहादुरी

गोरखा रेजिमेंट ने शुरू से ही अपनी बहादुरी का परचम लहराया और अंग्रेजों के अहम युद्ध में उन्हें जीत भी दिलाई. इसमें गोरखा सिक्ख युद्ध, एंग्लो-सिक्ख युद्ध और अफगान युद्धों के साथ 1857 के भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के दमन में भी शामिल हुए थे. इस रेजिमेंट का कुछ हिस्सा बाद में ब्रिटेन की सेना में भी शामिल हुआ. अब भी ब्रिटिश सेना में गोरखा रेजिमेंट एक अहम अंग है.

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गोरखा रेजिमेंट (Gorkha Regiment) भारत के अलावा यूके, सिंगापुर और ब्रुनेई जैसे देशों में भी है. (फाइल फोटो)


आजादी के बाद बंटी गोरखा रेजिमेंट

1947 में जब भारत आजाद हो रहा था तब भारत, नेपाल और ब्रिटेन के बीच एक त्रिपक्षीय समझौता हुआ, जिसके तहत छह गोरखा रेजिमेंट भारतीय सेना में स्थानांतरित कर दी गईं. बाद में एक सातवीं रेजीमेंट और बनाई गईं. तब ये सातों गोरखा रेजिमेंट भारतीय सेना में अपना झंडा गाड़े हुए हैं.

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दुनिया के कई हिस्सों में है गोरखा रेजिमेंट

भारत में कई शहरों में गोरखा रेजिमेंट के सेंटर हैं. इसमें वाराणसी, लखनऊ, हिमाचल प्रदेश में सुबातु, शिलांग के ट्रेनिंग सेंटर मशहूर हैं. गोरखा रेजिमेंट को आमतौर पर पर्वतीय इलाकों में लड़ाई का विशेषज्ञ माना जाता है. गोरखपुर में गोरखा रेजिमेंट की भर्ती का बड़ा केंद्र है. लेकिन भारत, नेपाल और ब्रिटेन के अलावा ब्रूनेई और सिंगापुर में भी गोरखा रेजिमेंट किसी न किसी रूप में हैं.
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