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जानिए क्या है ग्रैविटेशनल वेव बैकग्राउंड, जिससे वैज्ञानिकों को हैं उम्मीदें

गुरुत्व तरंगों की पृष्ठभूमि (Gravitational Wave Background) संबंधी जानकारी गैलेक्सी या विशाल ब्लैकहोल के विलय जैसी बड़ी घटना से मिलने की संभावना ज्यादा है. (तस्वीर:  @ESO Calcada)
गुरुत्व तरंगों की पृष्ठभूमि (Gravitational Wave Background) संबंधी जानकारी गैलेक्सी या विशाल ब्लैकहोल के विलय जैसी बड़ी घटना से मिलने की संभावना ज्यादा है. (तस्वीर: @ESO Calcada)

गुरुत्व तरंगों (Gravitational Waves) के बारे मे वैज्ञानिकों को बहुत कम जानकारी मिल पा रही है, लेकिन एक खास पृष्ठभूमि (Background) में इनके अध्ययन से वे काफी ब्रह्माण्ड के कई रहस्य सुलझने की उम्मीद कर रहे हैं.

  • News18Hindi
  • Last Updated: January 16, 2021, 6:42 AM IST
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जैसे जैसे हमारे वैज्ञानिकों की तकनीकें उन्नत होती जा रहा हैं, हमें पता चल रहा है कि अभी हमें ब्रह्माण्ड (Universe) के बारे में काफी कुछ जानना है. इसके साथ ही बहुत सारे रहस्य गहराते भी जा रहे हैं. इन रहस्यों को जानने क लिए वैज्ञानिकों ने कई तकनीकें विकसित भी की हैं. हाल ही में एक नई तकनीक ग्रैविटेशनल वेव बैकग्राउंड (Gravitational Waves Background) से वैज्ञानिकों को उम्मीदें बधीं हैं.

एक नई खोज से आशा
ताजा शोध में वैज्ञानिकों को लगता है कि उन्होंने पाया है कि ब्रह्माण्ड में गुरुत्व तरंगों की धुंधली पृष्ठभूमि को खोजा है. बेशक ये आंकड़े बहुत ही नए हैं और उन्हें इसकी पुष्टि करने में भी समय लगेगा. लेकिन फिर उन्हें उम्मीद है कि इस प्रक्रिया से उन्हें काफी अहम और संवेदनशील जानकारी मिल सकती है.

गुरुत्व तरंगों का व्यवधान
भौतिकविदों ने इसके लिए कई तरह के सिद्धांत दिए हैं फिर भी यह अब तक का सबसे कम अवलोकित क्षेत्र है. गुरुत्व तरंगें स्पेसटाइम वक्र में व्यवधान भेजते हैं. ये तरंगें तब पैदा होती हैं जब विशालकाय पिंड गतिमान होते हैं. ये विशाल पिंड कोई ग्रह या धूमकेतू से भी बहुत ही ज्यादा बड़े होते हैं.



गुरुत्व तरंगों पर काम
विशाल ब्लैकहोल की गतिविधि या उनके टकराव के समय ये तरंगें इतनी शक्तिशाली होती हैं कि इन्हें अलोकित किया जा सकता है. ब्लैकहोल के बारे में वैसे तो 1900 के शुरु में बता दिया गया था, लेकिन इन्हें 2010 के दशक के उत्तरार्ध में ही प्रमाणिक तौर पर अवलोकित किया जा सका था. इसके लिए हमारे वैज्ञानिक लेजर इंटरफेरोमीटर ग्रैविटेशनल वेव ऑबजर्वेटरी  (LIGO) और इसके जैसी दूसरी वेधशालाएं गुरुत्व तरंगों पर लगातार काम कर रही हैं.

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वैज्ञानिक शक्तिशाली गुरुत्व तरंगों (Gravitational Waves) की तलाश में हैं जो गैलेक्सी के टकराव जैसी घटना से मिलती है. (तस्वीर: @NASAHubble)


कितनी बड़ी गतिविधि
जब कोई दो गैलेक्सी आपस में टकराती हैं या ब्लैक होल का विलय होता है तो उससे ठीक पहले ऐसे पिंड एक दूसरे का तेजी से चक्कर लगाते हैं. इससे बहुत ही तेजी से शक्तिशाली गुरुत्व तरंगें पैदा होती हैं. लेकिन  ब्रह्माण्ड में दूसरी गुरुत्व तरंगें इतनी ज्यादा तेज या शक्तिशाली नहीं होती हैं.

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एक धुधली प्रतिध्वनि के समान
ज्यादातर गुरुत्व तरंगें विलय न होने वाली ब्लैकहोल की कक्षा से निकलने वाली ऊर्जा और विकिरण की बहुत ही धुंधली प्रतिध्वनि जैसी होती हैं. ये कक्षाएं धीमी होती हैं और ऐसी तरंगों का एक धुंधली पृष्ठभूमि बना देती हैं.

पल्सर से बनती है पृष्ठभूमि का आधार
नॉर्थ अमेरिकन नैनोहर्ट्ज ऑबजर्वेटरी फॉर ग्रैविटेशनल वेवस (NANOGrav) वेधशाला पिछले कुछ समय से गुरुत्व तरंगों के बारे में ज्यादा जानकारी हासिल करने का प्रयास कर रही है. नैनोग्रैव खास तौर पर रेडियो पल्स के अवलोकन पर काम कर रही है. जो तेजी से घूमने वाले न्यूट्ऱॉन तारों से निकलती हैं. इन तारों को मिलीसेकेंड पल्सर कहते हैं.

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ब्लैकहोल (Black Hole) के विलय भी इस तरह की स्थिति का निर्माण कर सकते हैं. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)




तो कैसे बनती है ये पृष्ठभूमि
इन नियमित पल्सर में थोड़ा सा बदलाव आ जाता है जिससे गुरुत्व तरंगों की पृष्ठभूमि बनती है. पृष्ठभूमि की ये तरंगें बहुत ही धुंधली होती हैं. पल्सर की गति और दूरी के हिसाब से बदलाव को अवलोकित करने में सालों का समय लगता है.

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इस अध्ययन में 45 मिलीसेकेंड पल्सर की पल्स दर बहुत स्थायी पायी गई. इसके बाद आसपास के बेकार ध्वनि प्रभावों को हटाया गया. तब वैज्ञानिकों ने पृष्ठभूमि में गुरुत्व तरंगों के संकेत देखे जिसका दोलन काल एक साल का था. यहां चुनौती यह सिद्ध करना है कि उन्होंने जो संकेत देखे हैं वे गुरुत्व तरंगों से ही निकले हैं. नैनोग्रैव पल्सर को कई सालों से अवलोकित कर रही है जिसके बाद शोधकर्ता अब उसके नतीजों को प्रकाशित करने की स्थिति में हैं, लेकिन अब भी काफी सफर काफी लंबा होगा, ऐसा लगता है.
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