तब 'ग्रेट स्मॉग ऑफ लंदन' ने चार दिनों में ली थी 4000 लोगों की जान

कहा जाता है कि ऐसा घना स्मॉग पूरी दुनिया में अब तक नहीं देखा और ना ही इतने कम समय में स्मॉग से इतनी जानें गईं

News18Hindi
Updated: November 9, 2018, 2:51 PM IST
तब 'ग्रेट स्मॉग ऑफ लंदन' ने चार दिनों में ली थी 4000 लोगों की जान
लंदन में ग्रेट स्मॉग
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Updated: November 9, 2018, 2:51 PM IST
उसे आज ग्रेट स्मॉग ऑफ लंदन कहा जाता है. जिसमें लंदन की सड़कों पर दिन में भी अंधेरा छा गया था. लोग अस्पतालों की ओर भागने लगे. देखते ही देखते चार दिनों में 4000 लोगों की मौत हो गई. वैसे इस स्मॉग के असर से तब कुल मिलाकर 8000 लोगों की जानें गईं थीं. ये भयावह अंधेरा ब्रिटेन की राजधानी लंदन में 1952 में दिसंबर के शुरुआती दिनों में बरपा था.

इस अंधेरे स्मॉग से लंदन के लोग थर्रा उठे थे. इससे बड़ा वायु प्रदूषण यहां उससे पहले नहीं देखा गया था. दिसंबर की शुरुआत में स्मॉग से अंधेरे की चादर ही नहीं फैली बल्कि ठंड भी चरम पर थी. हवाएं नहीं चल रही थीं. इसने हवा में प्रदूषण को पैर परासने का पूरा मौका दिया. वैसे ये स्मॉग पैदा हुआ कोयले के इस्तेमाल से-जिसने पूरे शहर के ऊपर एक मोटी काली चादर बिछा दी थी.

ये पांच दिनों तक बना रहा
ये स्मॉग एक दो दिन नहीं रहा बल्कि 05 दिसंबर से शुरू होकर अगले पांच दिनों यानि 09 दिसंबर 1952 तक बना रहा. तभी छंटा, जब मौसम में बदलाव आया. दृश्यता कम हो गई. ये स्मॉग घरों और बंद जगहों में भी घुस आया. हालांकि लंदन पहले भी दशकों से स्मॉग को झेलता आया था लेकिन ये सबसे बड़ा झटका था. कुछ लोगों ने इसे पी-सूपर्स कहा यानि मटर के सूप जैसा घना.

लंदन में इस घने स्मॉग में दृश्यता बहुत कम हो गई थी


एक लाख से ज्यादा बीमार पड़े 
सरकार की मेडिकल रिपोर्ट्स जो अगले कुछ हफ्तों तक इस आपदा के बारे में बताती रहीं. अनुमान लगाया गया कि 08 दिसंबर 1952 तक चार दिनों में ही इससे 4000 लोग मर गए. ये स्मॉग की उनके सेहत पर सीधी मार थी. इसके अलावा एक लाख से ज्यादा इसके प्रभावों से बीमार पड़े.
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लोगों का स्नायु तंत्र बुरी तरह से प्रभावित हुआ. फेफड़े संक्रमित हो गए. सांस की बीमारियां हो गई. गले में समस्या हो गई. आंखों में बुरी तरह जलन शुरू हो गई. हालांकि बाद में हुए शोध बताते हैं कि उसमें 6000 से ज्यादा लोग मरे थे और एक लाख से ज्यादा लोग स्मॉग के असर से बीमारियों का शिकार हो गए. इसका प्रभाव आने वाले महीनों में भी जारी रहा.

लंदन के ग्रेट स्मॉग में जिस तरह से दिन में अंधेरा हुआ, उससे पक्षी तक बेचैन थे


तब एडवर्ड ने कोयला जलाने पर रोक लगा दी थी

हालांकि लंदन में हवा में प्रदूषण 13वीं सदी से ही शुरू हो गया था. 1301 में एडवर्ड प्रथम ने लंदन में इसी के चलते कोयला जलाने पर रोक लगा दी थी. 16वीं सदी तक आते आते हवा खासी जहरीली हो चली थी. लेकिन ग्रेट स्मॉग ब्रिटेन के इतिहास में वायु प्रदूषण की सबसे खराब घटना थी.

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इसके बाद ही दुनियाभर में पर्यावरण पर रिसर्च, स्वास्थ्य पर इसका इसका और सरकार के पर्यावरण संबंधी कानून से लेकर हवा की शुद्धता को लेकर जन जागरुकता की बातें शुरू हुईं. बाद में 1956 में पहली बार ब्रिटेन में क्लीन एयर एक्ट बना.

लंदन में उन दिनों काफी कोयला जलाया जाता था, ये स्मॉग उसी की देन थी


क्या थी ग्रेट स्मॉग की वजह
सर्दियों में लंदन के लोग बड़े पैमाने पर अपने घरों को गर्म रखने के लिए कोयला जलाते थे. इसके धुएं से बड़े पैमाने पर सल्फर डाई ऑक्साइड बनता था. लंदन के इलाकों में कोयला आधारित कई पॉवर स्टेशन भी शुरू हो चुके थे. वो सल्फर डॉई ऑक्साइड में और बढोतरी कर रहे थे.

लंदन के मौसम विभाग के अनुसार ये सभी चीजें हवा में रोज एक हजार टन स्मोक पार्टिकल्स, 140 टन हाइड्रॉलिक एसिड, 14 टन फ्लोरिन कंपाउंड्स, 370 टन सल्फर डाईऑक्साइड हवा में घोलती थीं. जो सल्फ्यूरिक एसिड के तौर पर 800 टन नमी पैदा करती थी.

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साथ ही वाहनों के जरिए हवा में जो प्रदूषण होता था, सो अलग. उस समय कोयला स्टीम आधारित ट्रेनें और डीजल के ईंधन वाली बसें चला करती थीं, जिन्हें बाद में इलैक्ट्रिक ट्राम सिस्टम से रिप्लेस किया गया.

ग्रेट स्मॉग में लंदन में एक लाख से ज्यादा लोग बीमार पड़े


मौसम कैसा था
04 दिसंबर को ग्रेटर लंदन में कम दबाव के चलते हवा में निर्वात की स्थिति बनी हुई थी. हवा बिल्कुल नहीं चल रही थी. ठंड के कारण हवा में प्रदूषण वाले तत्वों की अलग सतह तैयार हो रही थी.

गर्म हवा और कोहरे के मिश्रण से स्मॉग की मोटी परत बनती चली गई. स्मॉग में वो धुआं शामिल था जो लोगों के घरों और फैक्ट्रियों की चिमनियों से निकल रहा था. इन सबसे मिलकर स्मॉग की इतनी मोटी सतह बन गई तो अगले कई दिनों तक बरकरार रही.

क्या असर हुआ
हालांकि लंदन में कोहरा पड़ना कोई नई बात नहीं थी लेकिन ये कहीं ज्यादा घना और लंबे समय तक रहने वाला साबित हुआ. इसमें दृश्यता बहुत घट गई. केवल कुछ मीटर तक. इसमें ऐसा लग रहा था मानो आप अंधे हो गए हों. ड्राइविंग करना तो असंभव ही था.
- पब्लिक ट्रांसपोर्ट बंद कर दिए गए. हालांकि लंदन अंडरग्राउंड की सेवाएं चालू रहीं. एंबुलेंस सर्विस रोक दी गई. जिससे लोगों को खुद अपने बल पर अस्पताल पहुंचना पड़ रहा था.

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- स्मॉग इतना घना था कि ये घरों और इंडोर में घुस आया. इसके चलते कंसर्ट और फिल्म स्क्रीनिंग बंद कर दी गई. आउटडोर स्पोर्ट्स इवेंट्स रद्द हो गए.
- दिन में नजर नहीं ही आ रहा था. लोगों के लिए घरों से बाहर निकलना मुश्किल हो गया. रात में हालत और भी खराब हो गई.
- उन दिनों स्मॉग मास्क न के बराबर थे और अगर थे भी तो बहुत महंगे, लिहाजा ज्यादातर लोग उसको खरीदने की स्थिति में नहीं थे.

स्वास्थ्य पर असर
जब स्मॉग छाया हुआ था तब लंदन में बेशक कोई पैनिक नहीं दिखा लेकिन बाद में आने वाले आंकड़ों ने बताया कि इस जहरीले फॉग ने 4000 लोगों को मार दिया. ज्यादातर लोग युवा या वृद्ध थे.

बाद में मार्कस लिप्टन ने फरवरी 1953 में हाउस ऑफ कामंस को बताया कि इस फॉग से 6000 लोगों की जान चली और इससे 25 हजार से ज्यादा लोग बीमार हो गए. हाल में हुए शोध बताते हैं कि तब इस खतरनाक स्मॉग ने 12 हजार लोगों की जान ली थी.

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