जानिए कितने अरबों टन की बर्फ पिघली थी पिछले साल ग्रीनलैंड में

जानिए कितने अरबों टन की बर्फ पिघली थी पिछले साल ग्रीनलैंड में
72 सालों में पहली बार इतनी बड़ी मात्रा में ग्रीनलैंड की बर्फ पिघली है.

ग्रीनलैंड (Greenland) में साल 2019 में रिकॉर्ड बर्फ पिघल (Ice melt) कर महासागरों (Oceans) में जा मिली है. इससे महासागरों के जलस्तर में भी उल्लेखनीय बढ़त हुई है.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 22, 2020, 5:33 PM IST
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ग्रीनलैंड (Greenland) दुनिया का एक खास द्वीप है. जब भी ग्लोबल वार्मिंग (Global warming) की बात आती है तो वैज्ञानिकों की नजर ग्रीनलैंड की बर्फ की चादर(Ice Sheet) पर जरूर जाती है. क्योंकि यहां की बर्फ पिघलने (Melting of Ice) का मतलब महासागरों का जलस्तर (Sea Levels खतरनाक रूप से बढ़ना होता है.  यहां की बर्फ के पिघलने के खतरे पर कई शोध हुए हैं और हो रहे हैं, लेकिन ताजा शोध ने खतरे की एक बड़ी घंटी बजाई है. ग्रीनलैंड में साल 2019 में सबसे तेजी से बर्फ पिघली है और पिछले 72 सालों में यहां बर्फ की चादर सबसे ज्यादा तादात में पिघली है.

क्यों है इतना खास ग्रीनलैंड
ग्रीनलैंड दुनिया का ऐसा इलाका है जहां दुनिया में सबसे ज्यादा मात्रा में पानी बर्फ के रूप में जमा है. पिछले कुछ सालों में ग्रीनलैंड में बर्फ बहुत ज्यादा नहीं मिगली थी. लेकिन साल 2019 में जितनी बर्फ पानी में बदली है वह अब तक मापी गई सबसे ज्यादा मात्रा है. ग्रीनलैंड में बर्फ के पिघलने का यह 1948 के बाद का सबसे बड़ा रिकॉर्ड है.

कितनी बर्फ पिघली पिछले साल
2019 में यहां 532 बिलियन टन की बर्फ पिघलकर समुद्र में मिल गई है. साइंस डेली की रिपोर्ट के मुताबिक यह पिछले दो साल में धीमी हो रही गति की पूरी तरह से उलट गति है. इसने साल 2012 में बने 464 बिलियन टन का रिकॉर्ड भी तोड़ दिया है. बर्फ का यह रिकॉर्ड पिघलाव हमारे महासागरों का जल स्तर 1.5 मिलीमीटर तक बढ़ा देगा. यह पानी अमेरिका के कैलीफोर्निया राज्य या भारत के महाराष्ट्र और तेलंगाना राज्यों को चार फुट पानी में डुबाने के लिए काफी है.



बहुत विविधता भरा है यह बदलाव
इस अध्ययन के नतीजे इसी सप्ताह कम्यूनिकेशन्स अर्थ एंड एनवायर्नमेंट जर्नल में प्रकाशित हुए हैं. इस अध्ययन के सहलेखक और दक्षिणी कैलिफोर्निया नासा के जेट प्रपल्शन लैबोरेटरी के शोधकर्ता ऐलेक्स गार्जनर ने कहा, “इसमें सबसे दिलचस्प यह है कि ग्रीनलैंड बर्फ की चादर में बर्फ खोने के दर में बहुत ज्यादा विविधता है. साल 2017 और साल 2018 में एक दशक के रिकॉर्ड नुकसान के बाद बहुत कम नुकसान हुआ था, लेकिन साल 2019 में सारे रिकॉर्ड टूट गए.

ग्लोबल वार्मिंग के कारण ग्रीनलैंड ही नहीं पूरी दुनिया में बर्फ पिघल रही है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)


कैसे किया अध्ययन
गार्डनर सहित अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों की एक टीम ने ग्रेस (GRACE) और ग्रेस फॉलोअप यानि ग्रैविटी रिकवरी एंड क्लाइमेट एक्सपेरिमेंट सैटेलाइट और कुछ कम्प्यूटर मॉडल्स के आंकड़ों का अध्ययन कर ग्रीनलैंड में बर्फ के नुकसान का आंकलन किया. इसमें कम्प्यूटर मॉडल ने ग्रीनलैंड में बर्फबारी और बर्फ की चादर के पिघलने के सिम्यूलेशन का उपयोग किया.

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दो सैटेलाइट ने किया ये काम
वहीं दो जुड़वां ग्रेस सैटेलाइट ने साल 2002 और 2017 में बर्फ की चादरों पर लगने वाले गुरुत्व खिंचाव को नापा था. जब भी एक ग्रेस उस इलाके से गुजरा जहां गुरुत्व कुछ ज्यादा था, वहां उसकी गति थोड़ी तेज हो जाती थी जिससे उसके और उसके जोड़ीदार के बीच की दूरी बदल जाती थी.  इन बदलावों का सटीक मापन उनके नीचे के भार और पदार्थ के वजन की जानकारी दे देता था.

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ग्रीनलैंड की बर्फ की चादर इतनी पिघल चुकी है कि वह वापस उतनी बड़ी नहीं हो सकती है. (प्रतीकात्मक तस्वीर)


ऐसे मिली बर्फ की मात्रा में बदलाव की जानकारी
इस तरह ग्रेस फॉलोअप ने 2018 में बदलाव महसूस किया और तब से बर्फ के वजन में बदलाव का अवलोकन कर रहा है. दोनों ग्रेस मिशन ने बर्फ के वजन में हुए सालाना बदलाव की जानकारी दी है. इससे वैज्ञानिकों को बीस साल के आंकड़े मिले और उन्हें साल दर साल हो रहे बदलावों का स्वरूप जानने को मिला. इसी वजह से शोधकर्ताओं को जुलाई 2017 से मई 2018 तक के समय का बर्फ की मात्रा या भार देखने को मिला.

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इस अध्ययन से पता चला है कि जलवायु परिवर्तन के कारण हुए मौसम के स्वरूपों में बदलावों की वजह से ग्रीनलैंड में बर्फ का इतना बड़ा नुकसान हो रहा है. 2012 और अब 2019 में भी मध्य अक्षांशों से आने वाली गर्म हवा ने इस बर्फ को पिघलाया है. गार्डनर का कहना है, “ जब आप पूरे रिकॉर्ड को देखते हैं तो पाते हैं कि एक स्पष्ट लंबे समय का ट्रेंड देखने को मिलने लगा है.”
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