गुजरात का वो राजा, जो रोज़ खाने के साथ लिया करता था ज़हर

गुजरात का वो राजा, जो रोज़ खाने के साथ लिया करता था ज़हर
महमूद शाह (Mahmud Shah) को गुजरात सल्तनत के सबसे शक्तिशाली शासकों में शुमार किया जाता है

गुजरात (Gujarat) का ये शासक खाने का बेहद शौकीन था. खाने के साथ ही वो रोज थोड़ी-थोड़ी मात्रा में जहर (poison) भी लेता. धीरे-धीरे उसमें इतना जहर हो गया कि उसका थूक, पसीना, खून सब कुछ जहरीला हो गया.

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राजे-महाराजाओं के किस्से उनके ऐशोआराम और सनक से तो भरे ही हैं, साथ ही उनके रहस्य भी कुछ कम नहीं. गुजरात के महमूद शाह (Mahmud Shah) ऐसे ही एक बादशाह थे. उन्हें महमूद बेगड़ा (Mahmud Begada) के नाम से भी जाना जाता है, जो गुजरात साम्राज्य (Gujarat Sultanate) के छठवें राजा थे. बहादुर बादशाह बेगड़ा निजी जिंदगी में काफी अजीबोगरीब थे. कहा जाता है कि वे रोज लगभग 35 किलो खाना खाते और साथ में जहर की बड़ी मात्रा भी लिया करते थे.

कम उम्र में पिता को खोकर गद्दी पर बैठे बादशाह के बारे में कई किस्से हैं. जैसे कहा जाता है कि उनकी बड़ी मूंछों में उनके भूख का राज था. पुर्तगाली सैलानी उनकी मूंछों के बारे में कहा करते कि वे इतनी लंबी और रेशमी थीं कि वे उसे साफे की तरह अपने सिर पर बांध लिया करते. दाढ़ी भी कुछ कम नहीं थी. कमर तक लहराने वाली दाढ़ी को बादशाह काफी अच्छा मानता था और ऐसे लोगों को तवज्जो भी देता था. उसके मंत्रिमंडल में कई लोग ऐसे थे, जिनकी दाढ़ी-मूंछें काफी लंबी-लंबी थीं. ये बादशाह का ही असर था.

राजा एक दिन में लगभग 35 किलो व्यंजन खाया करता, जिसमें साढ़े 4 किलो से ज्यादा हिस्सा मिठाई होती (Photo-pixabay)




भारी-भरकम खुराक
ये राजा एक दिन में लगभग 35 किलो व्यंजन खाया करता, जिसमें साढ़े 4 किलो से ज्यादा हिस्सा मिठाई होती. ये भी कहा जाता है सोते हुए भी बादशाह के दोनों ओर खाने की चीजें रखी होतीं ताकि अगर नींद खुलते ही भूख लग आए तो वो कुछ खा सके. इटालियन सैलानी Ludovico di Varthema ने भी अपनी चिट्ठियों में राजा की भारी-भरकम डायट के बारे में बताया है. जैसे राजा अपने नाश्ते में एक गिलास शहद और 159 केले खाता.

मजहब को लेकर सख्त
महमूद बेगड़ा को गुजरात सल्तनत के सबसे शक्तिशाली शासकों में शुमार किया जाता है. कम वक्त में ही इस राजा ने जूनागढ़ और पावागढ़ जैसे इलाकों पर कब्जा कर लिया और अपनी सीमाएं बढ़ाता ही चला गया. माना जाता है कि सीमाओं के विस्तार के दौरान ये जीत हासिल करने पर बंदी राजा से इस्लाम कुबूल करने की मांग करता था और इनकार करने पर राजा को मौत दे दी जाती. गुजरात के द्वारकाधीश मंदिर को तोड़ने के पीछे इसी राजा का हाथ रहा. साल 1472 में शाह ने ही इस मंदिर को तोड़ने का आदेश दिया था, ताकि लोगों की आस्था हिंदू भगवान से कम हो जाए. बाद में पंद्रहवीं सदी में इस मंदिर को दोबारा बनवाया गया.

सीमाओं के विस्तार के दौरान जीत हासिल करने पर बंदी राजा से इस्लाम कुबूल करने की मांग होती और मंदिरों की तोड़ाफोड़ा होती


किताबों में भी राजा का जिक्र
पुर्तगाली सैलानी Duarte Barbosa ने 14वीं सदी के आखिर में गुजरात का दौरा किया था. इस दौरान उसने गुजरात के इस राजा का रहन-सहन करीब से देखा. उसी ने अपनी किताब Duarte Barbosa में जिक्र किया है कि कैसे ये राजा रोज खाने के साथ कुछ मात्रा में जहर भी लिया करता था. दरअसल माना जाता है कि काफी साल पहले कम उम्र को राजा को राजघराने से ही कुछ लोगों ने मारने की साजिश की और उन्हें जहर दे दिया. जहर खाकर बेहोश हुए राजा का तुरंत उपचार हुआ और वे बच गए. तभी राजवैद्य ने खाने में मिले जहर के बारे में बताया. जहर देने वालों की तो पहचान नहीं हो सकी लेकिन राजा ने तब से ही रोज थोड़ी-थोड़ी मात्रा में जहर खाना शुरू कर दिया. वक्त के साथ जहर की मात्रा बढ़ती गई. राजा का मानना था कि खुद ही जहर खाने पर शरीर जहर के साथ सामंजस्य बिठा लेगा और कोई मारने की साजिश करे तो कामयाब नहीं हो सकेगा.

बहुत से राजा खुद को बनाते थे जहरीला
वैसे महमूद बेगड़ा जहर खाने वाले अकेले राजा नहीं थे. दुनिया में ऐसे कई राजे-महाराजे रहे हैं. रोज जहर लेकर जहरीला बनाने की इस पूरी प्रक्रिया को मिथ्रिडायटिजम (mithridatism) नाम से जाना जाता है. इसके तहत शरीर में धीरे-धीरे जहर डालकर उसे जहर के लिए इम्यून बनाया जाता है. इस शब्द का इतिहास भी दिलचस्प है. ये पोंटस और आर्मेनिया के राजा Mithridates VI के डर से उपजा था. राजा के पिता को जहर देकर मारा गया था. इससे राजा इतना डर गया कि वो तरह-तरह की कल्पनाएं करने लगा. भविष्य में उसके साथ ऐसा न हो, इसके लिए वो रोज खुद थोड़ा-थोड़ा जहर खाता ताकि उसकी मौत न हो.

रोज जहर लेकर जहरीला बनाने की इस पूरी प्रक्रिया को मिथ्रिडायटिजम (mithridatism) नाम से जाना जाता है (Photo-pixabay)


खास तरह का जहर
मिथ्रिडायटिजम हर तरह के जहर के साथ नहीं किया जाता था. इसके लिए केवल उसी तरह का जहर लिया जाता था जो बायोलॉजिकली ज्यादा जटिल संरचना के हों क्योंकि शरीर का इम्यून सिस्टम उसी पर प्रतिक्रिया देता है. एक बार थोड़ा जहर देने के बाद दोबारा उसी तरह का जहर देने पर लिवर की कंडीशनिंग हो जाती है और वो ज्यादा एंजाइम बनाता है, जिससे जहर पच जाए. इसे सायनाइड के उदाहरण से समझा जा सकता है. सेब या कई दूसरे फलों के बीज में सायनाइड होता है, जो अक्सर हम खा भी लेते हैं. चूंकि ये थोड़ी मात्रा में शरीर के भीतर जाता है, लिहाजा आदी हो चुका हमारा लिवर उसे पचा जाता है.

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