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GV Mavalankar Birthday: जानिए कौन थे देश की पहले लोकसभा के अध्यक्ष

GV Mavalankar Birthday: जानिए कौन थे देश की पहले लोकसभा के अध्यक्ष

जीवी मावंलकर (GV Mavalankr) को संसदीय मर्यादाओं के लिए आदर्श माना जाता है. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

जीवी मावंलकर (GV Mavalankr) को संसदीय मर्यादाओं के लिए आदर्श माना जाता है. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

भारत (India) में संसदीय शासन प्रणाली व्यवस्था को लागू करना एक बहुत ही मुश्किल काम था. अंग्रेजी शासन व्यवस्था से नई व्यवस्था में देश को ले जाना आसान कार्य नहीं था. आजादी के से पहले ही संविधन सभा का गठन, उसके बाद संविधान का निर्माण और उसे लागू करने के लिए पहली लोकसभा को सुचारू रूप से चलाना. इन सभी जिम्मेदारियों का निर्वाहन जीवी मावलंकर (GV Mavalnakar) ने बखूबी निभाया. वे संविधान सभा से लेकर देश की पहली लोकसभा के स्पीकर (Speaker of First Lok Sabha) थे.

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    भारत (India) की आजादी के बाद संविधान के निर्माण और पहली सरकार के बहुत से  नेताओं की लोगों को जानकारी है, लेकिन देश की पहली लोकसभा के स्पीकर (First Speaker of Lok Sabha) जीवी मावंलकर (GV Mavalankr) के बारे में लोगों को नहीं पता है. दादासाहेब के नाम से मशहूर मावलंकर ने भारतीय संसदीय लोकतंत्र में ऐसे मानदंड स्थापित किए हैं  जिन्हें छूने के बारे में आज शायद कल्पना ही की जा सकती है. उन्हें स्वयं पंडित जवाहर लाल नेहरू ने “लोक सभा के जनक” की उपाधि से सम्मानित किया था. देश की पहले लोकसभा के पहले अध्ययक्ष के रूप में उन्होंने संसदीय राजनीति के नियम, प्रक्रियाओं, परंपराओं का निर्धारण बहुत ही जिम्मेदारी और संवेदनशीलता के साथ किया था.

    अहमदाबाद में हुई कानून की शिक्षा
    गणेश शंकर वासुदेव का जन्म  27 नवंबर 1888 में बड़ौदा में हुआ था. वे एक मराठी परिवार में पैदा हुए थे जो अहमदाबाद में रहा करता था. बम्बई राज्य में अलग अलग जगहों से अपनी आरंभिक शिक्षा पूरी करने के बाद अहमदाबाद के गुजरात कॉलेज में विज्ञान विषय से स्नातक की पढ़ाई की. फिर 1912 में प्रथम श्रेणी के साथ कानून की परीक्षा पास की.

    पटेल-गांधी जैसे नेताओं से सम्पर्क
    मावलंकर ने 1913 में वकालत शुरू की और जल्दी एक कुशल वकील के तौर पर प्रसिद्ध भी हो गए. इसके साथ उन्होंने सामाजिक कार्यों में भागीदारी करना शुरू कर दिया. बीस-बाईस वर्ष की उम्र से ही एक पदाधिकारी के रूप में या एक सक्रिय कार्यकर्ता के रूप में गुजरात के अनेक प्रमुख सामाजिक संगठनों के साथ जुड़ गए. इसी दौरान वे सरदार वल्लभभाई पटेल और महात्मा गांधी जैसे राष्ट्रीय नेताओं के संपर्क में आए.

    समाज सेवा और राजनीति एक साथ
    मावलंकर बहुत छोटी उम्र से ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ सक्रिय रूप से जुड़ गए. गुजरात में स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई.  वे स्वतंत्रता आन्दोलन के दौरान अनेक बाह कुल  छह वर्ष जेल में रहे.  जब भी कभी प्राकृतिक आपदा आती थी या अकाल पड़ता था अथवा कोई अन्य सामाजिक अथवा राजनैतिक संकट उत्पन्न होता था तो मावलंकर अपनी अच्छी खासी चल रही वकालत को पूरी तरह छोड़कर लोगों की सहायता के लिए आगे आ जाते थे.

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    जवाहर लाल नेहरू (Jawaharlal Nehru) ने जीवी मावंलकर को “लोक सभा के जनक” की उपाधि से सम्मानित किया था. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

    कांग्रेस में अहम पद
    कांग्रेस में मावलंकर के नेतृत्व संबंधी गुणों और उनके योगदान को जल्दी ही पहचान लिया गया और उन्हें 1921-22 के दौरान गुजरात प्रादेशिक कांग्रेस समिति का सचिव बनाया गया. इसके बाद दिसम्बर, 1921 में वे अहमदाबाद में आयोजित के 36वें अधिवेशन की स्वागत समिति के महासचिव भी बने.

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    एक लेखक भी
    मावलंकर  को “खेरा-नो-रेंट ” आन्दोलन की भूमिका के लिए विशेष रूप से जाना जाता है. और बाद में अनेक अवसरों पर अकाल और बाढ़ राहत कार्यों में भी बढ़-चढ़ कर भाग लेते रहे. उनके वयक्तित्व का मानवीय पहलू उनकी प्रसिद्ध गुजराती पुस्तक मनावतना झरना में दिखाई देता है. उन्होंने गांधी जी के साथ अपने अनुभवों को  संस्मरणों नाम की पुस्तक में वर्णित किया है. वहीं है। अंग्रेजी में लिखी गई उनकी पुस्तक “माई लाइफ एट दि बार” में उनके 25 वर्षों के कानून से जुड़े सक्रिय जीवन के संस्मरण हैं.

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    जीवी मावंलकर (GV Mavalankr) को एक सम्मानित स्वतंत्रता सेनानी के रूप में देखा जाता है. (तस्वीर: Wikimedia Commons)

    संसदीय परंपराओं में एक मिसाल
    मावलंकर स्वयं तो मान मर्यादाओं का पालन करते ही थे और उनका पालन भी दृढ़ता  से किया करते थे. लेकिन इसके लिए उन्होंने संवेदनशीलता और सहृदयता को कभी ताक पर नहीं रखा. सांसदों को शपथ दिलाने की शुरुआत करने से उन्होंने कहा था कि जहां तक संभव होगा मैं सभी सदस्यों का नाम सही ढंग से लूंगा. फिर भी कोई गलती हो जाए तो मुझे उसके लिए क्षमा करें.

     

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    दादासाहेब 1946 से लेकर 1947 तक सेंट्रल लजिस्लेटिव असेंबली के अध्यक्ष, उसके बाद भारतीय संविधान सभा के सभापति, बने रहे. वे अंतरिम संसद की पूरी अवधि तक अर्थात् 1952 में प्रथम लोक सभा के गठन होने तक उसके अध्यक्ष बने रहे. वे इस पद पर 27 फरवरी, 1956 तक रहे और संसद में बहुत सारी परंपराओं की शुरुआत उन्होंने ने कीं जिन्हें अभी तक नियम की तरह पालन किया जाता है.  फरवरी 1956 को उनका हृदयाघात के कारण निधन हो गया था.

    Tags: History, Research

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