मथुरा की जेल में बने फांसी घर में सिर्फ महिलाओं को ही दी जाएगी फांसी, जानिए क्यों  

अब शबनम की दया याचिका राष्ट्रपति द्वारा खारिज किए जाने के बाद फांसी का रास्ता साफ हो गया है. मथुरा के वरिष्ठ जेल अधीक्षक के अनुसार फांसी की तैयारियां जेल प्रशासन ने शुरू कर दी हैं. अब डेथ वारंट का इंतजार है.

वरिष्ठ जेल अधीक्षक शैलेंद्र कुमार मैत्रेय का कहना है कि अभी फांसी (Hanging) की तारीख तय नहीं है, लेकिन हमने तैयारी शुरू कर दी है. डेथ वारंट जारी होते ही शबनम (Shabnam) को फांसी दे दी जाएगी.

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नई दिल्ली. अपने ही परिवार के सात लोगों का मर्डर (Murder) करने वाली शबनम को फांसी (Hanging) होनी है. राष्ट्रपति दया याचिका खारिज कर चुके हैं, लेकिन अभी तक डेथ वारंट पर साइन नहीं हुए हैं. मथुरा की जेल में बने फांसी घर में ही शबनम (Shabnam) को फांसी दी जाएगी. देश का तो पता नहीं, लेकिन यह मथुरा (Mathura) यूपी का इकलौता ऐसा फांसी घर है जो सिर्फ महिलाओं के लिए ही बनाया गया है. हालांकि 150 साल पुरानी इस जेल में आज़ादी मिलने के बाद से अभी तक किसी भी महिला को फांसी नहीं दी गई है.

मथुरा की जेल के आधा बीघा एरिया में बने इस फांसी घर में सिर्फ महिलाओं को ही फांसी दी जाएगी. “महिला और पुरुष को फांसी देने के तरीके में कोई फर्क नहीं है, सिवाय इसके कि पुरुष को पुलिस वाले पकड़कर लाते हैं और महिला को महिला कांस्टेबल पकड़कर लाती हैं. तो फिर ऐसा क्यों कि इस फांसी घर में सिर्फ महिलाओं को ही फांसी दी जाएगी.” यह सवाल पवन जल्लाद मथुरा जेल के अधिकारियों से कर चुका है, लेकिन उसके इस सवाल का किसी ने कोई उत्तर नहीं दिया.



जेल मैन्यूल 1956 में यह कहा है

पूर्व जेल अधिकारी आरपी सिंह बताते हैं कि जेल मैन्यूल 1956 में मथुरा की जेल में बने इस महिला फांसी घर का जिक्र किया गया है. जेल मैन्यूल में यह कहा गया है कि मथुरा जेल में बने इस महिला फांसी घर में सिर्फ महिलाओं को ही फांसी दी जाएगी. यह अलग बात है कि अभी तक फांसी किसी को नहीं दी गई है. ऐन वक्त पर रामकली की फांसी को उम्र कैद में बदल दिया गया था. वर्ना वो पहली महिला होती जिसे फांसी दी जाती.

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बवाल के चलते राजधानी से बहार बनाया था

आगरा सिटी जेल के पास रहने वाले जमाल थोड़ा बहुत ह पढ़े-लिखे हैं. लेकिन इतिहास के मामले में उनकी जानकारी के आगे अच्छे-अच्छे चक्कर लगाते हैं. आगरा में तैनात रहे एक आईपीएस तो मुगल इतिहास को खंगालने के लिए अक्सर जमाल के साथ ही देखे जाते थे. फांसी घर के बारे में जमाल का कहना है कि अंग्रेजों के जमाने में भी महिलाओं को कम ही फांसी दी जाती थी, उसकी वजह थी कि लोग महिलाओं को फांसी देने के विरोध में रहते थे. आगरा और दिल्ली राजधानी थीं और राजधानी में किसी तरह का कोई बवाल न हो, इसके लिए आगरा से 50 किमी दूर और दिल्ली से 150 किमी दूर मथुरा में महिला फांसी घर बनवाया गया था.

अभी ऐसा दिखता है महिला फांसी घर

फांसी घर 150 साल पुराना है. लकड़ी का दरवाजा गल चुका है. दीवारें भी गिरासू हैं. अंदर झाड़ियां उग आई हैं. फांसी देने वाला लीवर भी गल चुका है. लकड़ी के तख्तें भी गले हुए हैं. अब तो तख्तों पर मिट्टी पड़ चुकी है. सूत्रों की मानें तो जेल में तैनात रहे किसी अधिकारी ने भी कभी फांसी घर के अंदर जाने की कोशिश नहीं की है. रोज़ रात के वक्त वहां लगे बल्ब को जलाने के अलावा कोई ऐसा काम नहीं है जो अब रोज़ाना किया जाता हो.

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