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हरियाणा विधानसभा चुनाव: वो 5 फैक्टर जो चुनाव में हावी रहे

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Updated: October 25, 2019, 3:54 PM IST
हरियाणा विधानसभा चुनाव: वो 5 फैक्टर जो चुनाव में हावी रहे
बीजेपी को पिछले चुनाव की तुलना में इस बार 7 सीटों का नुकसान हुआ है.

हरियाणा विधानसभा चुनाव (Haryana Assembly Election) में कई फैक्टर हावी रहे. लेकिन इन 5 फैक्टर्स ने सबसे ज्यादा काम किया...

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  • Last Updated: October 25, 2019, 3:54 PM IST
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हरियाणा (Haryana) में एकबार फिर मनोहर लाल खट्टर (Manohar Lal Khattar) की सरकार बनने जा रही है. निर्दलीयों के समर्थन से बीजेपी (BJP) के पास बहुमत के आंकड़े का जुगाड़ हो चुका है. इस चुनाव में बीजेपी को 40 सीटें मिली हैं. कांग्रेस (Congress) को 31 और जननायक जनता पार्टी (JJP) ने 10 सीटों पर जीत हासिल की है.

पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में बीजेपी को 7 सीटों का नुकसान हुआ है. कांग्रेस को 16 सीटों का फायदा हुआ है. सबसे बड़ा फायदा जननायक जनता पार्टी को हुआ है, जो पहली बार चुनाव में उतरी और 10 सीटें झटक ली. दुष्यंत चौटाला की जीत हरियाणा की राजनीति में मायने रखती है. हालांकि जिस तरह से पहले उन्हें किंगमेकर कहा जा रहा था, अब निर्दलीयों के बीजेपी के साथ जाने से उनका महत्व कम हो गया है.

हरियाणा चुनाव में कई फैक्टर हावी रहे, जिसकी वजह से ऐसे चुनाव नतीजे आए हैं. सबसे पहले बीजेपी के 7 सीटों के नुकसान की बात कर लें.

राष्ट्रीय मुद्दों की अपेक्षा स्थानीय मुद्दे हावी रहे

बीजेपी राष्ट्रीय मुद्दे को उछालकर चुनाव लड़ रही थी. राष्ट्रीयता, आंतरिक सुरक्षा और कश्मीर से अनुच्छेद 370 को खत्म करने जैसे मुद्दों को बीजेपी ने प्रमुखता दी. जबकि विपक्ष ने स्थानीय मुद्दों को पकड़ा. बीजेपी को लग रहा था कि आर्थिक सुस्ती और घटती नौकरियां जैसे मसले राष्ट्रीय मुद्दों के सामने टिक नहीं पाएंगे. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. हरियाणा के युवाओं के लिए रोजगार बड़ा मुद्दा बना रहा.

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बीजेपी ने मनोहर लाल खट्टर के नेतृत्व में चुनाव लड़ा


हरियाणा में 20 से 29 साल के बीच की 40 लाख आबादी है. पिछले 5 वर्षों के दौरान ये वर्ग रोजगार के संकट से जूझ रहा है. सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी की एक रिपोर्ट के मुताबिक मई-अगस्त 2019 के दौरान हरियाणा में सबसे ज्यादा 28.7 फीसदी बेरोजगारी दर रही. कुछ साल पहले तक ये सिर्फ 8 फीसदी हुआ करती थी. एक अनुमान के मुताबिक राज्य में करीब 20 लाख युवा बेरोजगार हैं.
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कांग्रेस और जननायक जनता पार्टी ने रोजगार के मुद्दे को खूब उछाला. जेजेपी ने राइट टू वर्क और बेरोजगारों को हर महीने 11 हजार रुपए देने का वादा किया. कांग्रेस और जेजेपी को इसका फायदा मिला.

हरियाणा चुनाव में बिना गांधी के चमकी कांग्रेस

इस चुनाव की खास बात ये रही है कि कांग्रेस पार्टी के चुनाव प्रचार में गांधी परिवार ने ज्यादा हिस्सा नहीं लिया. कांग्रेस के भीतर भूपिंदर सिंह हुड्डा की ही चली. ज्यादातर रैलियां और सभाएं हुड्डा और कुमारी सैलजा ने ही की. प्रधानमंत्री मोदी ने हरियाणा चुनाव में जहां सात रैलियां की, वहीं राहुल गांधी ने सिर्फ 2 रैलियों को संबोधित किया.

इस चुनाव से कांग्रेस के भीतर ये भरोसा पैदा हो सकता है कि वो बिना गांधी परिवार के ग्लैमर के भी चुनाव जीत सकती है. एक डर ये था कि आखिरी वक्त में पूर्व हरियाणा कांग्रेस अध्यक्ष अशोक तंवर का पार्टी से इस्तीफा कांग्रेस को नुकसान पहुंचाएगा. लेकिन ऐसा नहीं हुआ. टिकट बंटवारे में भूपिंदर सिंह हुड्डा की चली. जिसने अच्छे नतीजे दिए. कांग्रेस ने अपने गढ़ रोहतक, सोनीपत और झज्जर में अच्छा प्रदर्शन किया.

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इस चुनाव में गांधी परिवार का कोई चेहरा एक्टिव नहीं रहा


दुष्यंत चौटाला और उनकी पार्टी जेजेपी का उदय

सिर्फ 10 महीने पहले ही इंडियन नेशनल लोकदल से निकाले जाने के बाद दुष्यंत चौटाला ने अपनी नई पार्टी जननायक जनता पार्टी बनाई थी. विपक्षी पार्टियां इसे बच्चा पार्टी कह रही थीं. लेकिन दुष्यंत चौटाला ने पूरी राजनीतिक चतुराई से इस चुनाव में बाजी मारी.

उन्होंने चौधरी देवीलाल की विरासत को भुनाया. राज्य के युवाओं पर फोकस किया. रोजगार और किसानों के मुद्दे उठाए. जाट वोटर्स के बीच भरोसा कायम किया. सबसे ज्यादा 34 जाट उम्मीदवार मैदान में उतारे. इन सबका फायदा जेजेपी को मिला. वहीं इंडियन नेशनल लोकदल को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ.  इनेलो से सिर्फ अभय चौटाला जीत पाए. जबकि 2014 में इनेलो ने 19 सीटें जीती थीं.

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दुष्यंत चौटाला की पार्टी 10 सीटें जीतने में कामयाब रही.


मनोहर लाल खट्टर की नहीं चली

हरियाणा चुनाव के दौरान मनोहर लाल खट्टर कहा करते थे कि ‘मैं अनाड़ी नहीं सियासत का खिलाड़ी हूं.’ विपक्ष ने ऐसे बयानों को उनका अहंकार बताया. ‘नमो अगेन’ की तरह ‘मनो अगेन’ का स्लोगन भी नहीं चल पाया. ये उनका अतिआत्मविश्वास माना गया. इस चुनाव में मनोहर लाल खट्टर की नहीं चली.

बीजेपी उनके नेतृत्व में चुनाव लड़ रही थी. लेकिन खुद हरियाणा के अध्यक्ष सुभाष बराला चुनाव हार गए. उनके मंत्रिमंडल के 8 मंत्रियों को हार का मुंह देखना पड़ा.

फिर हावी रहा जाट फैक्टर

हरियाणा में हमेशा से जाट एक बड़ा फैक्टर रहा है. इस बार भी जाट फैक्टर ने काम किया. जाट यहां की 36 सीटों पर अपना असर रखते हैं. बीजेपी को जाट बहुल सीटों पर नुकसान उठाना पड़ा. जेजेपी और कांग्रेस ने इस सीटों पर फायदा उठाया. लोकसभा में जाटों का समर्थन पाने वाली बीजेपी को इस बार जाटों का समर्थन नहीं मिलता दिखा. जाट समुदाय ने स्थानीय मुद्दों के असर में वोट किया.
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First published: October 25, 2019, 3:54 PM IST
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