ईद-ए-ग़दीर: इस्लामिक इतिहास का वो दिन, जिस आधार पर शिया-सुन्नी में बंटे मुसलमान

ईद-ए-ग़दीर: इस्लामिक इतिहास का वो दिन, जिस आधार पर शिया-सुन्नी में बंटे मुसलमान
जिसके आधार पर दुनिया का मुसलमान दो समुदायों शिया और सुन्नी में बंटा उस शख्स का नाम हजरत अली है सांकेतिक फोटो (Photo-pixabay)

आज ईद-ए-ग़दीर (Eid al-Ghadir) है, यानी वो दिन, जिसने मुसलमानों को शिया और सुन्नी में बांट दिया.

  • News18Hindi
  • Last Updated: August 9, 2020, 9:24 AM IST
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इस्लाम में मौटे तौर पर दो समुदाय हैं- शिया और सुन्नी. दुनियाभर के तमाम मुसलमान इन्हीं दो समुदायों के भीतर आते हैं. इनके बंटने का आधार इस्लामिक इतिहास है. दोनों समुदायों की क़ुरान एक है, हर दिन की वाजिब नमाज़ की तादाद बराबर है. दोनों समुदाय अल्लाह के पैगंबर मुहम्मद (रसूल अल्लाह) और कुरान तक भी एकमत हैं. इस्लामिक इतिहास के आधार पर दोनों समुदाय पैगंबर के बाद उनके वारिस पर अलग राय के चलते बंटे. जानिए, कौन है वो वारिस.

जिस शख्स के आधार पर दुनिया का मुसलमान दो समुदायों शिया और सुन्नी में बंटा उस शख्स का नाम हजरत अली है. अली, रिश्ते में पैगंबर मुहम्मद के दामाद थे. वे पैगंबर की बेटी फातिमा के पति थे. इस रिश्ते के अलावा वे पैगंबर के चचेरे भाई भी थे.

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शिया समुदाय के मुताबिक, रसूल अल्लाह (पैगंबर) ने खुद ऐलान किया था, उनके बाद, उनके उत्तराधिकारी अली होंगे. हालांकि सुन्नी समुदाय इस दावे से सहमत नहीं. शिया समुदाय के मुताबिक, पैगंबर ने ये ऐलान 18 ज़िलहिज्जा 10 हिजरी (19 मार्च 633 ईसवी) को ग़दीर-ए-ख़ुम के मौदान में किया था. ग़दीर नाम की जगह मक्के और मदीने के बीच है. ग़दीर ख़ुम जगह जोहफ़ा से 3-4 किलोमीटर दूर है. जोहफ़ा मक्के से 64 किलोमीटर उत्तर में है. जोहफ़ा से हाजी एहराम (हज का विशेष वस्त्र) पहनते हैं. पैग़म्बर के समय में जोहफ़ा से मिस्र, इराक़, सीरिया और मदीना के निवासी एक दूसरे से जुदा होते थे.
पैगंबर के निधन के बाद सुन्नी समुदाय ने अबु-बकर को अपना नेता माना- सांकेतिक फोटो (Photo-pixabay)


क्या था वो ऐलान- 10 हिजरी को पैग़म्बर ने आखिरी हज किया था. हज के बाद फ़रिश्ते जिबरईल पैगंबर मुहम्मद के पास कुरआन के पांचवे सूरे मायदा की 67 वीं आयत लेकर पहुंचे. आयत उतरने के बाद पैगंबर ने हाजियों को ग़दीर-ए-ख़ुम पर रुकने का आदेश दिया. वो आयत थी- या अय्युहर रसूलु बल्लिग़ मा उनज़िला इलैका मिन रब्बिक व इन लम् तफ़अल फ़मा बल्लग़ता रिसालतहु वल्लाहु यअसिमुका मिन अन्नास. जिसके मायने थे- ऐ रसूल उस संदेश को पहुंचा दीजिये जो आपके परवरदिगार की तरफ से आप पर नाज़िल हो चुका है.

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आयत नाज़िल होने के बाद पैग़म्बर ने सभी हाजियों को ग़दीर-ए-ख़ुम पर रुकने के लिए कहा. आदेश के बाद क़ाफ़िले में आगे चल रहे लोग रुक गये. पीछे रहने वालों का मैदान में पहुंचने का इंतज़ार किया गया. गर्मी का मौसम और ज़ोहर (ढलती दोपहर) का वक़्त था. पैगंबर ने ऊंटों के कजावों को जमा कर ऊंचा मिम्बर बनाया. उसपर खड़े हुए और खुत्बा (भाषण) दिया.

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इसी खुत्बे में पैगंबर ने अली का हाथ पकड़, लोगों को उनसे परिचित कराया. अपने उत्तराधिकारी के रूप में नियुक्ति का ऐलान करते हुए कहा, मन कुन्तो मौलाहो फ़हाज़ा अलीयुन मौलाह. यानी जिस जिसका मैं मौला, उस उसके अली मौला. गदीर के मैदान में हुए इस ऐलान से जुड़ी आयतें क़ुरान में हैं. शिया समुदाय 18 ज़िलहिज्ज को ईद-ए-ग़दीर के रूप में मनाता है. दोनों समुदायों में मतभेद की जड़ यही से पनपी.

शिया समुदाय पैगंबर के बाद खलीफा नहीं, इमाम को मानता है- सांकेतिक फोटो (Photo-pixabay)


पैगंबर के निधन के बाद सुन्नी समुदाय ने अबु-बकर को अपना नेता माना. उनके बाद उमर. उमर के बाद उस्मान और उस्मान के बाद चौथे नंबर पर अली को खलीफा के रूप में स्वीकारा. सुन्नियों के मुताबिक, ये चारों लोग खलीफा कहलाए.

शिया समुदाय, सुन्नियों के मुताबिक पैगंबर के बाद के माने गए तीनों खलीफाओं अबु-बकर, उमर और उस्मान को मुसलमानों का राजनीतिक नेता तो मानते हैं, लेकिन धार्मिक रहबर के नजरिए से इन तीनों को खलीफा नहीं मानते.

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शिया समुदाय पैगंबर के बाद खलीफा नहीं, इमाम को मानता है. उनके मुताबिक, पैगंबर के बाद दीन के रहबर अली बने. शियाओं का विश्वास है पहले इमाम हजरत अली थे. दूसरे अली के बड़े बेटे हसन और तीसरे अली के छोटे बेटे हुसैन. तीसरे इमाम, हुसैन के बाद भी इसी तरह कुल 12 इमाम रहे. दोनों समुदायों के नमाज़ के तौर-तरीके और अज़ान में भी फर्क है.
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