किन देशों में भीषण गर्मी के कारण होती हैं सबसे ज्यादा मौतें

क्लाइमेट चेंज के कारण बढ़ी गर्मी से स्थिति काफी खराब होने जा रही है- सांकेतिक फोटो (pixabay)

क्लाइमेट चेंज के कारण बढ़ी गर्मी से स्थिति काफी खराब होने जा रही है- सांकेतिक फोटो (pixabay)

साल 2018 में चीन में 62000 मौतें हीट स्ट्रोक (heat stroke) यानी लू लगने से हुईं. इसके बाद भारत का स्थान था, जहां 31000 से ज्यादा मौतें हुईं. वैज्ञानिकों का कहना है कि समय के साथ ये आंकड़ा बढ़ता चला जाएगा.

  • News18Hindi
  • Last Updated: April 4, 2021, 12:39 PM IST
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देश की राजधानी दिल्ली में भले ही तापमान कम हुआ हो लेकिन आने वाले दिनों के मौसम विभाग चेतावनी दे रहा है. इस बीच अगर दिल्ली के पड़ोसी राज्य जैसे राजस्थान को ही लें तो वहां पारा 40 पार कर चुका है और राज्य लू के थपेड़ों की गिरफ्त में है. वैसे भारत अकेला नहीं, जहां लू चलने के कारण हर साल मौतें होती हैं, बल्कि एशिया के कई देश इसमें हमसे भी ज्यादा खतरे में रहते हैं.

लैंसेट काउंटडाउन ऑन हेल्थ एंड क्लाइमेट चेंज (Lancet Countdown on Health and Climate Change) की एक रिपोर्ट में साफ हुआ कि साल 2018 में भारत में गर्मियों के दौरान 31000 से ज्यादा मौतें हुईं. वहीं सबसे पहला स्थान चीन का रहा, जहां उसी साल 62000 मौतें हीट स्ट्रोक यानी लू लगने से हुईं. इस तरह से देखा जाए तो चीन के हालात सबसे ज्यादा खराब हैं.

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उत्तरी चीन, जहां लगभग 400 मिलियन आबादी रहती है, उस क्षेत्र में लू का सबसे अधिक प्रकोप देखा जाता रहा- सांकेतिक फोटो (pixabay)


उत्तरी चीन, जहां लगभग 400 मिलियन आबादी रहती है, उस क्षेत्र में लू का सबसे अधिक प्रकोप देखा जाता रहा. इस बारे में मेसाच्युसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (MIT) ने एक स्टडी की, जो नेचर कम्युनिकेशन्स में प्रकाशित हुई. स्टडी में वैज्ञानिकों ने दावा किया कि साल 2100 तक ऐसे हालात होंगे कि गर्मी में मौसम में घर से बाहर कुछ घंटे भी रहना जानलेवा साबित हो सकता है.
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स्टडी में बताया गया कि क्लाइमेट चेंज के कारण बढ़ी गर्मी से स्थिति इतनी बिगड़ेगी कि लोग अगर असुरक्षित ढंग से बाहर निकलेंगे तो 6 घंटे से ज्यादा जीवित नहीं रह पाएंगे. एनवायरमेंटल रिसर्च लेटर्स जर्नल में पब्लिश एक स्टडी भी इसी ओर इशारा करती है. इसके मुताबिक अगर ग्लोबल वॉर्मिंग के खतरे से नहीं निपटा गया तो एशियाई देशों में साल 2070 तक स्थिति ऐसी हो सकती है कि साल के 8 महीनों में भीषण गर्मी ही पड़े.

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एशियाई देशों में साल 2070 तक स्थिति ऐसी हो सकती है कि साल के 8 महीनों में भीषण गर्मी ही पड़े- सांकेतिक फोटो (pixabay)




ये वैज्ञानिकों का महज अनुमान नहीं है, बल्कि इसके पीछे विज्ञान काम करता है. इस दौरान वेट बल्ब टेंपरेचर (Wet-bulb temperature) को देखा गया. इसमें पता चला कि क्लाइमेट चेंज के कारण धरती केवल गर्म नहीं हो रही, बल्कि बर्फ पिघलने के कारण साथ ही साथ आर्द्र भी हो रही है. ऐसे में दोनों का आकलन एक साथ किया जाता है, जिसे वेट बल्ब टेंपरेचर कहते हैं. ये तापमान अधिकतम 31 से 32 हो सकता है. इससे ज्यादा होना इंसानों से लेकर पशु-पक्षियों के लिए भी घातक होता है. वहीं ये वेट बल्ब तापमान अब ऊपर जाता दिख रहा है.

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यही वेट बल्ब टेंपरेचर जब 35 तक पहुंच जाएगा, जिसके संकेत मिलने लगे हैं, तब शरीर बाहरी तापमान से तालमेल नहीं बिठा पाएगा. पसीना आना बंद हो जाएगा और 6 घंटों के भीतर अगर इलाज न मिला तो ऑर्गन फेल हो जाएंगे और मौत तय है.

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चीन और भारत समेत सभी एशियाई देश बढ़ती गर्मी का प्रकोप झेलने जा रहे हैं- सांकेतिक फोटो (pixabay)


विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट भी साफ बताती है कि चीन और भारत समेत सभी एशियाई देश बढ़ती गर्मी का प्रकोप झेलने जा रहे हैं. WHO के आंकड़े बताते हैं कि साल 1998-2017 के दौरान दुनियाभर में 1 लाख 66 हजार से ज्यादा मौतें हीट वेव के कारण हुईं. इनमें यूरोप जैसी ठंडी जगह भी शामिल है. बता दें कि साल 2003 में वहां फ्रांस समेत सारे यूरोपीय देशों में लू का ऐसा प्रकोप रहा कि 70000 मौतें हुई थीं.

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अमेरिका की ओक रिज नेशनल लैबोरेटरी ने भी एशियाई देशों के हालात को लेकर चेतावनी दी. इसमें निकलकर आया कि इस साल भयानक गर्मी पड़ेगी और दक्षिण एशियाई देशों में जानलेवा लू का प्रकोप देखने को मिलेगा. भारत के बारे में अलग-अलग राज्यों का आंकड़ा भी दिया गया, जिसके मुताबिक गर्मी के कारण जिन जगहों पर सबसे ज्‍यादा काम करने में दिक्‍कत आएगी, उनमें उत्‍तर प्रदेश और पश्चिम बंगाल शामिल हैं. इन जगहों के साथ तटीय इलाकों में कोलकाता, मुंबई एवं हैदराबाद जैसे शहरी इलाके भी शामिल हैं, जहां पर गर्मी के कारण काम करने में दिक्‍कत का सामना करना पड़ सकता है. यहां तापमान 2 डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है, जिससे लू चलती रहेगी और हर साल की अपेक्षा ज्यादा मौतें होंगी. ये शोध जर्नल जियोफिजिक्स रिसर्च लेटर में प्रकाशित हुआ था.
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