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वैज्ञानिकों ने खोजा पृथ्वी के जीवन की रक्षा करने वाले विशाल ‘कवच’ का आकार

वैज्ञानिकों ने खोजा पृथ्वी के जीवन की रक्षा करने वाले विशाल ‘कवच’ का आकार

हेलियोस्फियर की भूमिका तो पहले से पता थी, लेकिन इसका आकार का पता नहीं था. (तस्वीर: Wikimedia Commons/ NASA)

हेलियोस्फियर की भूमिका तो पहले से पता थी, लेकिन इसका आकार का पता नहीं था. (तस्वीर: Wikimedia Commons/ NASA)

    पृथ्वी (Earth) पर एक साथ बहुत ही परिस्थितियां हैं जिनसे इस ग्रह पर जीवन संभव हो पाया है. इसमें अन्य कारकों के अलावा पृथ्वी का विशेष वायुमंडल (Atmosphere) और मैग्नेटोस्फियर भी है जिससे अंतरिक्ष से आने वाली हानिकारण विकिरण पृथ्वी तक नहीं पहुंच पाती हैं. लेकिन इसके अलावा भी एक और आवरण है जो पृथ्वी से बहुत दूर है और हमारी पृथ्वी के साथ पूरे सौरमंडल तक की रक्षा कर रहा है. यदि ये ना होता तो अभी तक सौरमंडल से बाहर होने वाले सुपरनोवा और तारों के विस्फोटों से निकली खतरनाक किरणें पृथ्वी के जीवन को खत्म कर चुकी होतीं. इस विशेष आवरण को हेलियोस्फियर (heliosphere)  कहते हैं.

    क्या पृथ्वी काफी नहीं
    पृथ्वी का वायुमंडल और मैग्नेटोस्फियर ही सूर्य और अंतरिक्ष से आने वाले अन्य बहुत से हानिकारक विकिरणों को रोकने सक्षम है. सूर्य से आने वाली पराबैंगनी किरणों को अवशोषित करने का काम हमारे वायुमंडल की ओजन परत करती है. लेकिन वैज्ञानिक यह भी जानते हैं कि सौरमंडल के बाहर से आने वाले विकिरणों को काफी हद तक रोकने में हेलियोस्फियर की भूमिका है.

    अभी तक नहीं था आकार का पता
    वैज्ञानिक इस रक्षा आवरण का अध्ययन काफी समय से कर रहे हैं. वे यह तो समझ सके हैं कि यह आवरण सौरमंडल के बाहर से आने वाले खगोलीय विकिरण को बड़ी मात्रा में रोक देते हैं,  लेकिन अभी तक वे इसका आकार नहीं समझ सके हैं.  इसके आकार प्रकार को लेकर वैज्ञानिकों में कई धारणाएं रखी हैं.

    एक प्रयास यह भी
    बोस्टन यूनिवर्सिटी के खगोलविद मेरव ओफेर की अगुआई में अंतरराष्ट्रीय खगोलविदों की टीम ने एक अध्ययन में इस हेलियोस्फियर का आकार निर्धारित करने का प्रयास किया है. ओफेर का कहना है कि जिस तरह से गैलेक्सी की खगोलीय किरणें इस हेलियोस्फियर में आती हैं, वे इसके आकार से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकती हैं. उसमें जरूर सिलवटें या तहों जैसा कुछ होना चाहिए.

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    हेलियोस्फियर (Heliosphere) सुदूर अंतरिक्ष से आने वाले खगोलीय विकरणों को भी बड़ी मात्रा में रोकता है. (तस्वीर: NASA/JPL)

    हाइड्रोजन के कणों की भूमिका
    ओफेर ने  अवलोकित  किए गए आंकड़ों और सैद्धांतिक खगोलभैतिकी के आधार पर बने मॉडल के जरिए हेलियोस्फियर के कम्प्यूटर सिम्यूलेशन्स बनाए. उनका अध्ययन एस्ट्रोफिजिकल जर्नल में प्रकाशित हुआ है. टीम ने इस बात का खुलासा किया है कि हमारे सौरमंडल से बाहर से आने वाले तटस्थ हाइड्रोजन कणों ने हेलियोस्फियर को आकार प्रदान करने में भूमिका अदा की है.

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    क्या होता है हेलियोस्फियर
    नासा के मुताबिक सूर्य लगातार अवेशित कणों की बौछार करता रहते हैं. इन्हें सौरपवन कहते हैं, जो ग्रहों को पार कर प्लूटो तक की दूरी के करीब तीन गुना दूरी तक जाती हैं. इसके आगे अंतरतारकीय माध्यम से वे रुक जाती हैं. इस तरह से यह सौरमंडल के आसपास एक बड़ा सा बुलबुला बन जाता है. इसी को हेलियोस्फियर कहते हैं.

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    यह अध्ययन हमारे सौरमंडल (Solar System) के अंदर तक आने वाले विकरणों को समझने में मददगार हो सकता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर: Pixabay)

    कैसे मिला आकार
    शोधकर्ताओं ने पाया कि हेलियोस्फियर का आकार क्रॉसिएंट या फ्रेच रोल या फिर किसी डोनट के आकार हो सकता है.  उन्होंने बताया कि सौरमंडल से बहने वाले तटस्थ हाइड्रोजन के कणों के बहाव के कारण हेलियोस्पियर के लिए यह असंभव हो गया कि उसका आकार गिरते हुए धूमकेतु की तरह हो पाता.

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    इस अध्ययन के सहलेखक जेम्स ड्रेक ने बताया कि यह मॉडल पहली बार हेलियोस्फियर के आकार की इतनी स्पष्ट व्याख्या करता है और बताता है कि यह उत्तरी और दक्षिणी इलाकों में इतना टूटा हुआ क्यों है. यह जानकारी गैलेक्सी से पृथ्वी की ओर आने वाली खगोलीय विकरणों के बारे में समझ को प्रभावित करेगी. अभी तक सौरमंडल की इस सीमा को मानव निर्मित वॉयेज 1,2 अंतरिक्ष यान ही पार कर सके हैं.

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