हिंदी को लेकर दक्षिण भारत में बार-बार क्यों होता है बवाल, क्या हिंदी नहीं बन सकती राष्ट्रभाषा?

भारत के 29 में से 20 राज्यों में हिंदी बोलने वाले बहुत कम हैं. बाकी जिन राज्यों को हम हिंदी भाषी मान लेते हैं उनमें भी जनजातीय और क्षेत्रीय भाषाएं बोलने वाले बहुतायत हैं.

News18Hindi
Updated: June 3, 2019, 9:43 PM IST
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सरकार की नई शिक्षा नीति में तीन भाषा का फॉर्मूला लागू करने के प्रस्ताव के चलते विवाद उठ खड़े हुए थे. इस प्रस्ताव के बाद दक्षिण भारतीय राज्यों में उनके ऊपर हिंदी को थोपे जाने के आरोप के साथ प्रदर्शन शुरू हो गए थे. नए ड्राफ्ट में हिंदी अनिवार्य होने वाली शर्त को हटा दिया गया है. तीन जून की सुबह केंद्र सरकार ने शिक्षा नीति के ड्राफ्ट में बदलाव की घोषणा की है. नई शिक्षा नीति के संशोधित ड्राफ्ट में अनिवार्य की जगह 'फ्लेक्सिबल' शब्द का उपयोग किया गया है यानि स्कूल खुद तीसरी भाषा का चयन कर सकते हैं. ऐसे में यह तय हो गया है कि ज्यादातर दक्षिण भारतीय स्कूलों में हिंदी अभी भी तीसरी भाषा के तौर पर नहीं पढ़ाई जाएगी.

तमिलनाडु और कर्नाटक अक्सर हिंदी के खिलाफ होने वाले ऐसे विरोध प्रदर्शनों के केंद्र में रहते हैं. लेकिन हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने और उसे बढ़ावा देने के लिए अनिवार्य करने जैसे प्रयास कई बार होने के बावजूद भी बार-बार वापस लेने पड़े?

महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू जैसे कद्दावर नेता भी हिंदी को भारत की राष्ट्रभाषा बनाना चाहते थे. तब भी दक्षिण भारतीय हिंदी विरोधी गुट इसके विरोध में था. हालांकि देशभर में अंग्रेजी के प्रयोग को लेकर यह दक्षिण भारतीय गुट सहमत था. 1949 में संवैधानिक समिति ने एक समझौता किया. इसे मुंशी-आयंगर समझौता कहा जाता है. इसके बाद देवनागरी लिपि वाली हिंदी को राष्ट्रभाषा के बजाए राजभाषा बना दिया गया था.

फिलहाल संविधान में देश की केवल दो ऑफिशियल भाषाएं हैं लेकिन इनमें से कोई 'राष्ट्रीय भाषा' नहीं है. संविधान समिति ने मात्र 15 साल के लिए अंग्रेजी के ऑफिशियल भाषा के बतौर प्रयोग का लक्ष्य रखा था. यह 15 साल का समय 26 जनवरी, 1965 को खत्म हो गया था.

संविधान के लागू होने पर भी बहुत बवाल हुआ था
हिंदी समर्थक नेता बालकृष्ण शर्मा और पुरुषोत्तम दास टंडन थे. ये अंग्रेजी के कट्टर विरोधी थे. इसे वे साम्राज्यवाद का अवशेष कहते थे. उन्होंने हिंदी को राष्ट्रीय भाषा बनाए जाने की मांग करते हुए कई प्रदर्शन किए लेकिन दक्षिण और पूर्वी भारत की भाषाई स्थिति का हवाला देते हुए उनकी मांग खारिज होती रही. बाद में मुंशी-आयंगर समझौता हुआ.

हिंदी में लिखे नाम पर कालिख लगाता एक प्रदर्शनकारी (फाइल फोटो)

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इसके बाद 1965 में अंग्रेजी की ऑफिशियल भाषा की समयसीमा खत्म होने पर जब हिंदी को ऑफिशियल भाषा बना दिया गया तो फिर से तमिलनाडु में हिंसक आंदोलन होने लगे. फिर तय किया गया कि हिंदी एकमात्र ऑफिशियल भाषा नहीं हो सकती. इससे कुछ दिन पहले ही राजभाषा अधिनियम, 1963 बना था. इसे 1967 में संशोधित किया गया. इसके जरिए द्विभाषीय पद्धति अपना ली गई. ये दो ऑफिशियल भाषाएं थीं, अंग्रेजी और हिंदी.

क्षेत्रीय भाषाएं भी बनाना चाहती थीं पहचान
1971 के बाद भारत में क्षेत्रीय भाषाओं ने संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल होने के लिए एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया. ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि राज्यों ने जान लिया था कि जो भी भाषाएं ऑफिशियल लैंग्वेज कमीशन में जगह पाएंगी, उसे ही राज्य की ऑफिशियल भाषा के तौर पर प्रयोग किया जाएगा. यह कदम बहुभाषाई जनता का भाषा को लेकर गुस्सा कम करने के लिए उठाया गया था. आजादी के वक्त इसमें 14 भाषाएं थीं, जो 2007 तक बढ़कर 22 हो गई थीं.

25 जनवरी, 2010 को गुजरात हाईकोर्ट ने अपने एक फैसले में कहा, भारत की बड़ी जनसंख्या हिंदी को राष्ट्रभाषा मानती है. जबकि ऐसा किसी रिकॉर्ड में नहीं है. न ही ऐसा कोई आदेश पारित हुआ है, जो हिंदी के देश की राष्ट्रीय भाषा होने की घोषणा करता हो.

हिंदी को लेकर गलत है ज्यादातर भारतीयों की सोच
अक्सर कहा जाता है कि करीब 125 करोड़ से ज्यादा की जनसंख्या वाले भारत के आधे से ज्यादा लोग हिंदी बोलते हैं और गैर हिंदी भाषी राज्यों के 20 फीसदी लोग भी हिंदी समझते हैं इसलिए हिंदी भारत की आम भाषा है लेकिन कई भाषाविदों का कहना है कि हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, राज्यस्थान, बिहार, झारखंड, छत्तीसगढ़ के लोगों को हिंदी भाषी नहीं कहा जाना चाहिए. वे हिंदी भाषी नहीं हैं और उनमें से बहुत से लोग जनजातीय या क्षेत्रीय भाषाएं बोलते हैं.

दक्षिण भारतीय राज्यों में अक्सर ही हिंदी विरोधी प्रदर्शन होते रहते हैं (फाइल फोटो)


इसके अलावा भारत के दक्षिण में केरल, तमिलनाडु, आंध्रप्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक. पश्चिम में गोवा, महाराष्ट्र और गुजरात. भारत के उत्तर-पश्चिम में पंजाब और जम्मू-कश्मीर. पूर्व में ओडिशा और पश्चिम बंगाल. उत्तरपूर्व में सिक्किम, अरुणाचल प्रदेश, मिजोरम, त्रिपुरा, नगालैंड, मणिपुर, मेघालय और असम. ये इस देश के 29 में से 20 राज्य हैं जिनमें हिंदीभाषी बहुत कम हैं. ऐसे में हिंदी राष्ट्रभाषा कैसे हो सकती है?

इसके अलावा भारत में ही हिंदी से कहीं पुरानी भाषाएं तमिल, कन्नड़, तेलुगू, मलयालम, मराठी, गुजराती, सिंधी, कश्मीरी, ओड़िया, बांग्ला, नेपाली और असमिया हैं. ऐसे में एक नई भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा दे देना क्या सही होगा?

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First published: June 3, 2019, 9:06 PM IST
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