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कौन हैं वो हिंदू संत, जिनका समाधि स्थल पाकिस्तान में जला दिया गया?

खैबर पख्तूनख्वा के करक जिले में कट्टरपंथी लोगों ने एक हिंदू मंदिर में तोड़फोड़ की

खैबर पख्तूनख्वा के करक जिले में कट्टरपंथी लोगों ने एक हिंदू मंदिर में तोड़फोड़ की

पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा (Khyber Pakhtunkhwa) में परमहंस स्वामी अद्वैतानंद की समाधि (Shri Paramhans Swami Advaitanand shrine ) पर लगातार विवाद हो रहा है. पाकिस्तानी सुप्रीम कोर्ट ने समाधि के दोबारा बनाने की इजाजत दी थी लेकिन कई शर्तों समेत.

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    पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा के करक जिले में कट्टरपंथी लोगों ने एक हिंदू मंदिर में तोड़फोड़ की और पूरा मंदिर आग के हवाले कर दिया. इस हिंसा के खिलाफ इमरान सरकार धरपकड़ का दावा भी कर रही है. सरकार का कहना है कि जल्दी ही मंदिर और वहां स्थित समाधि का दोबारा निर्माण होगा. जिस समाधि की यहां बात हो रही है, वो दरअसल एक हिंदू संत की है. श्री परमहंस महाराज नाम के इस संत के पूरी दुनिया में समर्थक हैं लेकिन भारत की बड़ी आबादी उनसे अनजान है.

    परमहंस स्वामी के हिंदू संत होने के बाद पाकिस्तान जैसे कट्टरपंथी देश में उनकी समाधि क्या कर रही है, इस बारे में जानने से पहले थोड़ा परमहंस स्वामी के बारे में जानते हैं. उनका पूरा नाम परमहंस स्वामी अद्वैतानंद था. साल 1846 में उनका जन्म बिहार के छपरा में हुआ. रामनवमी के दिन जन्म के कारण उनका नाम राम याद पड़ा. बच्चे में शुरू से ही अद्भुत लक्षण थे. वो लोगों की सेवा में काफी आनंद पाता.

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    जल्द ही उनसे मिलने और उनके प्रवचन सुनने के लिए लोग दूर-दूर से आने लगे. इस बीच उनके निजी जीवन में कई मुसीबतें आईं. जन्म के महीनेभर बाद ही बालक की माता का देहांत हो गया. जब वे पांच साल के थे, तब पिता का निधन हो गया. इसके बाद भी बालक की आस्था और लिखना-पढ़ना कम नहीं हुआ. अकेले रहते हुए ही उन्होंने संस्कृत, हिंदी और अरेबिक का ज्ञान पाया.



    परमहंस स्वामी अद्वैतानंद


    लगभग 16 साल की उम्र में उन्होंने घर थोड़कर आध्यात्म की तलाश शुरू कर दी. सबसे पहले वे बिहार से चलते हुए जयपुर पहुंचे. वहां उनकी मुलाकात 90 साल के संत स्वामी आनंदपुरी से हुई, जिनसे उन्होंने योग और प्राणायाम की शिक्षा ली. इस दौरान परमहंस स्वामी को लोग जानने लगे थे और उनके अनुयायी बढ़ते ही गए. उन्हें अद्वैत मठ का पहला आध्यात्मिक गुरु माना जाने लगा. आज अमेरिका और कनाडा से लेकर गल्फ देशों में भी स्वामी अद्वैतानंद के लगभग 300 आश्रम हैं, जहां हजारों अनुयायी संन्यास और प्राणायाम सीखते हैं.

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    संन्यास का प्रचार-प्रसार करते हुए स्वामी जी देशभर में घूम रही थे. इसी दौरान वे टेरी पहुंचे. ये देश विभाजन से पहले की बात है, जब टेरी भारत का ही हिस्सा हुआ करता था. उन्होंने मृत्यु के बाद अपनी समाधि यहीं बनाने की इच्छा जताई थी. इसकी वजह ये बताई जाती है कि इसी जगह आकर उन्हें आध्यात्मक की अलौकिक ताकत का अहसास हुआ था.

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    लगभग 100 साल पहले जब वे टेरी पहुंचे थे तो यहां रहते हुए उनके लिए एक मंदिर बनाया गया. स्वामी जी की मृत्यु के बाद साल 1919 में उनकी समाधि वहीं बनाई गई और साथ में मंदिर भी रखा गया. हालांकि भारत विभाजन के बाद से लगातार इस समाधि पर विवाद होता रहा है. कट्टरपंथी समुदाय इस समाधि को जमीन पर जबरन कब्जा मानते हुए अनेकों बार नुकसान पहुंचाने की कोशिश कर चुका.

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    साल 1997 में इस समाधिस्थल को पूरी तरह से तोड़फोड़ दिया गया. इसके बाद हिंदुओं की मांग पर पाकिस्तान की सुप्रीम कोर्ट ने साल 2015 में इसके पुर्ननिर्माण की इजाजत दे दी. दूसरी ओर स्थानीय मुस्लिमों का कहना है कि समाधि की जगह उनके लिए घरों का निर्माण होना चाहिए.

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    यहां ये जानना दिलचस्प होगा कि भले ही पाकिस्तानी कोर्ट ने मंदिर और समाधि के दोबारा बनाने की अनुमति दी थी लेकिन साथ ही उनकी शर्त भी थी. इसके मुताबिक हिंदू कभी भी टेरी में अपने धर्म का प्रचार-प्रसार नहीं करेंगे. वे केवल जमा होकर प्रार्थना कर सकेंगे. समाधि पर उन्हें न तो बड़ी संख्या में लोगों को इकट्ठा करने की इजाजत होगी और न ही समाधि स्थल पर किसी बड़े निर्माण कार्य की मंज़ूरी दी जाएगी. इसके अलावा क्षेत्र में हिंदू समुदाय के लोग क्षेत्र में जमीन भी नहीं खरीद सकेंगे और उनका दायरा केवल समाधि स्थल तक ही सीमित रहेगा.

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