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क्या बांंग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में चुनाव लड़ सकते हैं हिंदू-सिख

Sanjay Srivastava | News18Hindi
Updated: January 23, 2020, 2:03 PM IST
क्या बांंग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में चुनाव लड़ सकते हैं हिंदू-सिख
पाकिस्तान में वर्ष 2018 में नेशनल असेंबली के चुनाव हुए. इससे पहले पाकिस्तान चुनाव आयोग ने घोषणा की कि हिंदू वोटरों की संख्या पिछले चुनाव की तुलना में दो फीसदी बढ़ गई है

अक्सर ये चर्चाएं होती रही हैं कि अफगानिस्तान, पाकिस्तान और बांग्लादेश में रहने वाले हिंदू और सिख ना तो चुनाव लड़ सकते हैं और ना ही वोट दे सकते हैं. ऐसा नहीं है. बांग्लादेश की संसद में 17 हिंदू सीधे चुनाव जीतकर पहुंचे हैं. पाकिस्तान में पहली बार एक हिंदू नेशनल असंबेली के लिए जीता जबकि सात रिजर्व सीटों से संसद में पहुंचे. अफगानिस्तान में भी दो सिख सांसद हैं

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  • Last Updated: January 23, 2020, 2:03 PM IST
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देश में ये बहस जोर पकड़ रही है कि भारत के पड़ोसी देशों बांग्लादेश, पाकिस्तान और अफगानिस्तान में हिंदू-सिख चुनाव नहीं लड़ सकते हैं. लेकिन हकीकत ये है कि ना केवल तीनों देशों में हिंदू-सिख चुनाव लड़ सकते हैं और वोट दे सकते हैं बल्कि तीनों देशों की राष्ट्रीय संसद में उनके चुने हुए प्रतिनिधि भी हैं.

बांग्लादेश में एक साल पहले ही वहां की पार्लियामेंट जातियो सोंसद यानि जातीय संसद के लिए आम चुनाव हुए थे. जिसमें बांग्लादेश की सभी सियासी दलों से हिंदुओं ने भी चुनाव लड़ा था, जिसमें 17 हिंदू चुनाव जीतकर संसद में भी पहुंचे हैं. ये बांग्लादेश अवामी लीग से जीतकर जयतो संसद में पहुंचे हैं. एक हिंदू निर्विरोध भी जीता है.
बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यक हैं. आबादी में उनकी हिस्सेदारी 8.5 फीसदी है. उन्हें आमतौर पर दशकों से अवामी लीग का समर्थक माना जाता है, जो बांग्लादेश की सत्ताधारी पार्टी है. ये माना जा रहा है कि ये संख्या आने वाले समय में और बढ़ सकती है.

हालांकि पिछले कुछ समय प्रधानमंत्री हसीना की अवामी लीग ने हिंदुओं का दिल जीतने के लिए बहुत कुछ किया भी है. उन्होंने कुछ समय पहले दाकेशी मंदिर को लंबी चौड़ी जमीन दी. अन्य मंदिरों की भी मदद की ताकि उन्हें बेहतर किया जा सके. हालांकि वर्ष 1951 में यहां हिंदुओं की आबादी 22 फीसदी थी, जो बाद में घटती चली गई.

बांग्लादेश में इस बार 17 हिंदू सांसद 
पिछले दो संसदीय चुनावों में यहां से 16 हिंदू चुनाव जीतकर संसद में पहुंचते रहे हैं लेकिन इस बार के चुनाव में उनकी संख्या एक की बढोतरी हुई है. अब 11वीं संसद में 17 हिंदू सांसद हैं. इन सभी ने सीधा चुनाव लड़ा था.

ये है बांग्लादेश की नेशनल पार्लियामेंट जातीयो संसद, जिसमें इस बार 17 हिंदू सांसद चुनकर पहुंचे हैं
इनके नाम और संसदीय सीटें इस तरह हैं
रमेश चंद्र सेन                - ठाकुरगांव
मनोरंजन शील गोपाल     -दिनाजपुर
सदन चंद्र मजुमदार        - नौगांव
रंजीत कुमार रे               - जैसोर
स्वप्न भट्टाचार्य                 - जैसोर (स्वतंत्र)
बीरेन सिकदर                 - मागुरा
पंचानन विस्वास              - खुलाना प्रथम
नारायण चंद्र चंदा            - खुलाना पंचम
धीरेंद्र देबनाथ शंभु           - बरगुना
पंकज नाथ                      - बरिशाल
मनु मजुमदार                   - नेत्रोकोना
अमीम कुमार उकील         - नेत्रोकोना तृतीय
मृणाल कांति दास              - मुंसीगंज
जया सेनगुप्ता                   - सुनमगंज
कुजेंद्र लाल त्रिपुरा            - खग्राचारी
दीपांकर तालुकदार          - रंगामाटी
बीर बहादुर उश्वे सिंह         - बर्दवान

पाकिस्तान में पहली बार नेशनल असेंबली के लिए जीता हिंदू 
पाकिस्तान में भी हिंदू और सिख ना केवल वोट दे सकते हैं बल्कि चुनाव लड़ भी सकते हैं. इस बार पाकिस्तान की नेशनल असेंबली के लिए हुए चुनाव में पहली बार महेश मलानी ने जनरल सीट पर चुनाव जीता. वो थारपरकार से चुनाव जीतकर नेशनल असेंबली में पहुंचे हैं.

थारपरकार हिंदू बहुल इलाका है लेकिन ये पहली बार हुआ है जबकि कोई हिंदू सीधे चुनाव जीतकर नेशनल असेंबली में पहुंचा है. उन्होंने ये चुनाव पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी की ओर से लड़ा था. हालांकि पिछले साल पाकिस्तान में हुए चुनावों में कई और हिंदुओं ने भी उम्मीदवार के तौर पर शिरकत की थी लेकिन वो चुनाव नहीं जीत सके.

ये हैं महेश मलानी, जो पाकिस्तान में सीधे चुने गए पहले हिंदू सांसद हैं. वो थारपरकार से चुनकर नेशनल असेंबली पहुंचे हैं. उन्हें पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी ने चुनावों में खड़ा किया था


पाकिस्तान नेशनल असंबेली में सात हिंदू रिजर्व सीटों पर चुने गए
साथ ही पाकिस्तान के संविधान के अनुच्छेद 51 (2A) के मुताबिक़ पाकिस्तान की संसद के निचले सदन नेशनल असेंबली में 10 सीटें अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षित हैं. साथ ही चार प्रांतों की विधानसभा में 23 सीटों पर आरक्षण दिया गया है.
पाकिस्तान की नेशनल असेंबली की आरक्षित सीटों पर जो हिंदू चुने गए हैं, उनके नाम इस तरह हैं

1. लाल चंद (पाकिस्तान तहरीक ए इंसाफ)
2. सुनियाला रुथ (पाकिस्तान तहरीक ए इंसाफ)
3. रमेश कुमार वांकवानी (पाकिस्तान तहरीक ए इंसाफ)
4. जय प्रकाश उक्रानी (पाकिस्तान तहरीक ए इंसाफ)
5. दर्शन पुंशी (पाकिस्तान मुस्लिम लीग)
6. खेलदास कोहिस्तानी (पीएमएल)
7. रमेश लाल (पाकिस्तान पीपुल्स पार्टी)

इन आरक्षित 10 सीटों का विभाजन राजनीतिक पार्टियों को उन्हें 272 में से कितनी सीटों पर जीत मिली है इसके आधार पर होता है. इन सीटों पर पार्टी खुद अल्पसंख्यक उम्मीदवार तय करती है और संसद में भेजती है.
दूसरा विकल्प ये है कि कोई भी अल्पसंख्यक किसी भी सीट पर चुनाव लड़ सकता है. ऐसे में उसकी जीत जनता से सीधे मिले वोटों पर आधारित होगी.

कोई भी वोट करने के लिए स्वतंत्र
कोई भी अल्पसंख्यक अपने चुनावी क्षेत्र से चुनाव लड़ रहे किसी भी उम्मीदवार को वोट करने के लिए स्वतंत्र है. यानी वोटिंग का अधिकार सभी के लिए समान है. 2018 के चुनाव में हरीराम किश्वरीलाल और ज्ञान चंद असरानी सिंध प्रांत से विधानसभा की अनारक्षित सीटों से चुनाव लड़े और संसद पहुंचे.

अफगानिस्तान की राष्ट्रीय संसद में सिख सांसद नरिंदरपाल सिंह


अफगानिस्तान में हिंदू और सिखों की स्थिति
अब बात अफ़गानिस्तान की. 1988 से अफ़गानिस्तान गृह युद्ध और तालिबान की हिंसा का शिकार है. चरमपंथी संगठन अल-क़ायदा का ठिकाना भी अफ़गानिस्तान रहा. साल 2002 में यहां अंतरिम सरकार बनाई गई और हामिद करज़ई राष्ट्रपति बने. इसके बाद साल 2005 के चुनाव में देश की निचली सदन और ऊपरी सदन में प्रतिनिधि चुन कर पहुंचे और अफ़गानिस्तान की संसद मज़बूत बनी.
वर्ल्ड डायरेक्टरी ऑफ माइनोरिटीज कहती है कि अब वहां हिंदुओं और सिखों की संख्या 1000 रह गई है जबकि अमरीका के डिपार्टमेंट ऑफ़ जस्टिस की रिपोर्ट की मानें तो जिसमें हिंदू-सिख अल्पसंख्यकों की संख्या यहां महज़ 1000 से 1500 के बीच हैं. अन्य रिपोर्ट उनकी आबादी 2000 के आसपास बताती हैं.

अफगानिस्तान के दोनों सदनों में एक एक सिख
अफ़ग़ानिस्तान की निचली सदन यानी जहां प्रतिनिधियों का सीधा चुनाव जनता करती है वहां 249 सीट हैं. यहां अल्पसंख्यकों को चुनाव लड़ने की आज़ादी है. लेकिन नियमों के मुताबिक अफ़ग़ानिस्तान में संसदीय चुनाव में नामकरण भरते वक़्त कम से कम 5000 लोगों को अपने समर्थन में दिखाना पड़ता था. लिहाजा इस नियम के कारण हिंदू और सिख सीधे चुनाव नहीं लड़ सकते. 2014 में अशरफ़ ग़नी सत्ता में आए और उन्होंने हिंदू-सिख अल्पसंख्यकों के समीकरण को देखते हुए निचले सदन में एक सीट रिज़र्व की है.

इस वक़्त इस सीट पर नरिंदर पाल सिंह सांसद हैं. इसके अलावा अफ़गानिस्तान की ऊपरी सदन में एक सीट धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए रिज़र्व है. इस वक़्त अनारकली कौर होनयार इस सदन में सांसद हैं. अल्पसंख्यक समुदाय की ओर से ये नाम तय किए जाते हैं जिसे राष्ट्रपति की ओर से सीधे संसद में भेजा जाता है.

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First published: January 23, 2020, 2:03 PM IST
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