जिस स्वास्तिक को हिंदू पूजते हैं, उसके कारण मारे जा चुके हैं लाखों लोग

प्रतीकात्मक फोटो
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अलग-अलग देशों में स्वास्तिक को अलग नाम से पुकारा जाता है...

  • News18Hindi
  • Last Updated: December 4, 2018, 3:49 PM IST
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स्वास्तिक को उस इंसान ने अपनी पार्टी का चिह्न बना लिया, जिससे दुनिया सबसे ज्यादा नफरत करती है. हिटलर की नाजी पार्टी का निशान बनने के बाद स्वास्तिक की पहचान पर खून के धब्बे पड़ गए.

साल 1920 में नाजी पार्टी, जिसे नेशनल सोशलिस्ट जर्मन वर्कर्स पार्टी के तौर पर भी जाना जाता था, के नेता एडोल्फ हिटलर ने अपनी पार्टी का प्रतीक चुना. ये प्रतीक था स्वास्तिक. जर्मन में जिसे हेकेनक्रुएज़ कहा जाता है. पार्टी का ये चिह्न बहुत सोच-समझकर लिया गया, जिसके पीछे खुद को आर्यन यानी सर्वश्रेष्ठ नस्ल बताने की मंशा रही. इसके बाद हिटलर की अगुवाई में नरसंहार का सिलसिला चल पड़ा, नफरत के उस दौर ने पार्टी के प्रतीक चिह्न स्वास्तिक के हजारों सालों के इतिहास को धुंधला कर दिया. नाजी पार्टी के अपनाने से पहले स्वास्तिक दुनिया के कई देशों में सौभाग्य का प्रतीक रहा. यूरोप में भी इसका प्रमाण मिलता है, वहीं भारत में हजारों सालों से इसे ईश्वरीय प्रतीक माना जाता रहा है. नकारात्मक नाजी छाप से पहले क्या रहा स्वास्तिक का इतिहास, आइए जानें.

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संस्कृत में स्वास्तिक का अर्थ है सौभाग्य. प्राचीन समय में पश्चिमी देशों से आ रहे यात्रियों ने इस चिह्न को अपना लिया और उसे अपनी संस्कृति तक लेकर गए. दुनिया के एकदम अलग कोनों पर बसे देशों और एकदम अलग संस्कृति में भी ये प्रतीक चिह्न दिखता है. पुरातत्ववेत्ताओं के अनुसार खुदाई में ये चीन, मंगोलिया से लेकर जापान, ब्रिटेन और यहां तक कि अमेरिका में भी मिल चुका है. ये केवल ज्यामिति नहीं रहा, बल्कि इसकी सकारात्मकता की वजह से देश इसे कहीं युद्ध तो कहीं विज्ञापनों में भी इस्तेमाल करते रहे. अलग-अलग देशों में इसे अलग नाम से पुकारा जाता है, जैसे चीन में वान, जापान में मंजी, ब्रिटेन में फिलफिट, ग्रीस में टेट्रागैमेडिअन और जर्मनी में हेकेनक्रुएज़. पहले विश्वयुद्ध के दौरान अमेरिकी सेना ने इसे प्रतीक बनाया जो 1939 तक उनके लड़ाकू जहाजों पर भी दिखता रहा. बाद में नाजियों के इसे पार्टी प्रतीक बनाए जाने के बाद से स्वास्तिक के लिए लोगों की आस्था कुछ कम हुई.
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दस्तावेज बताते हैं कि जर्मनों द्वारा स्वास्तिक को अपनाए जाने की घटना महज एक संयोग है. 19वीं सदी में एक जर्मन शोधकर्ता प्राचीन भारतीय शास्त्रों का अध्ययन कर रहा था, इसी दौरान उसे संस्कृत और जर्मन भाषा में कई समानताएं दिखीं. शोधकर्ताओं का एक दल इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि दोनों देश जरूर एक इतिहास रखते हैं और एक पिता की संतानें हैं. आर्यन संतानें. आर्यों से अपने संबंध को पक्का करने के लिए नाजी पार्टी ने स्वास्तिक का आइडिया ले लिया और तभी से उनके लाल झंडे पर ये चिह्न आ गया, जिसके बाद हुए रक्तपात ने इस प्रतीक को भी खूनी रंग दे दिया.

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जर्मनों के आक्रमण के दौरान बच गए एक व्यक्ति ने कहा- हमें हमेशा याद रहेगा कि स्वास्तिक ने हमारी जिंदगी पर क्या कहर ढाया- ये शैतानी ताकत का चिह्न है. आततातियों की उस याद को मिटाने के लिए जर्मनी ने काफी कोशिश की. वहां स्वास्तिक के इस्तेमाल पर रोक लग गई. यहां तक साल 2007 में जर्मनी ने पूरे यूरोप में इस प्रतीक पर बैन लगवाने की कोशिश की, जो कि नाकामयाब रही.

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स्वास्तिक को हम भारतीय जितना अपना मानते हैं, उससे कहीं ज्यादा इसके होने के प्रमाण प्राचीन यूरोप में मिलते रहे हैं, कम से कम दस्तावेज तो यही कहते हैं. यूक्रेन के नेशनल म्यूजियम में झांकें तो इसकी झलक मिल जाती है. इस म्यूजियम की सबसे कीमती चीजों में से एक है एक चिड़िया की प्रतिकृति. साल 1908 में रूस की सीमा के पास खुदाई में मिली इस आकृति की धड़ पर स्वास्तिक का चिह्न है, जो लगभग 12 हजार साल पुराना बताया जा रहा है. यूक्रेन की राजधानी कीव में इस तरह के कई प्रतीक मिलते रहे हैं. यही वजह है कि जब नाजियों ने द्वितीय विश्वयुद्ध के दौरान यहां कब्जा किया तो उन्हें यकीन हो गया ये कि उनके आर्य पूर्वजों की निशानियां हैं जो किसी तरह से यहां आ गईं. युद्ध खत्म होने के बाद जर्मन सेना यूक्रेन से इन प्रतीकों को लेकर वापस लौटी.

प्राचीन ग्रीक में घरेलू वस्तुओं को सजाने के लिए भी स्वास्तिक का चिह्न इस्तेमाल होता था, इसके प्रमाण 12वीं सदी के अवशेषों से मिलते हैं. यहां तक कि द्वितीय विश्वयुद्ध से पहले तक स्वास्तिक की लोकप्रियता इतनी ज्यादा थी कि एम्ब्रॉयडरी में भी स्वास्तिक बनाया जाता था, मान्यता थी कि इससे पहने जाने वाले कपड़े खुशकिस्मती लाएंगे. विश्वयुद्ध के दौरान नाजी पार्टी का प्रतीक चिह्न बनने के बाद से लोग स्वास्तिक को रक्तपात से जोड़कर देखने लगे. हेकेनक्रुएज़ यानी स्वास्तिक को मानने वाले नाजियों ने यूक्रेन की राजधानी को खून से रंग दिया. दस्तावेज बताते हैं कि यहां 35 हजार के आसपास यहूदियों को बेहद क्रूरता से मार दिया गया था. इसके बाद से लोग इस चिह्न से दूरी बरतने लगे.



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साल 1979 में संस्कृत के एक शोधार्थी ने शोधों के आधार पर कहा कि मूल संस्कृत में स्वास्तिक का अर्थ है संपूर्ण विजय यानी पूरी जीत. हिंदुओं में भी स्वास्तिक को दो तरह से बनाया जाता है, सीधे हाथ के स्वास्तिक को भगवान विष्णु और सूर्य से जोड़कर देखा जाता है, वहीं बाएं हाथ के स्वास्तिक को देवी काली और काले जादू से जोड़ा जाता है. तंत्र साधना में उल्टे हाथ का स्वास्तिक बनाया जाता है.

सौभाग्य के प्रतीक माने जाने वाले स्वास्तिक पर जर्मन अत्याचार के कलंक को मिटाने के लिए यूरोप में कई जगहों पर प्रयास होते रहे हैं. जैसे 2013 में 13 नवंबर को कोपेनहेगन में स्वास्तिक दिवस मनाया गया, जहां दुनियाभर से टैटू कलाकार स्वास्तिक को पूरी दुनिया तक पहुंचाने के लिए इकट्ठा हुए. आयोजकों का कहना था कि हिटलर की पार्टी ने इस चिह्न पर जो धब्बा लगा दिया, उसे साफ करने की जरूरत है. स्वास्तिक पर लगे नाजी धब्बे को धोने के लिए दुनियाभर में प्रयास हो रहे हैं. भारत, जो स्वास्तिक को अपना प्रतीक मानता है, वो भी पीछे नहीं. विदेशों में रह रहे भारतीय स्कूलों और धार्मिक स्थलों पर इस प्रतीक की महत्ता समझाने की कोशिश कर रहे हैं.
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