Explained: क्या है G-7, क्यों भारत और ऑस्ट्रेलिया जैसे ताकतवर देश इसका हिस्सा नहीं?

जी-7 शिखर सम्मेलन की शुरुआत हो चुकी है

दुनिया की 7 सबसे मजबूत अर्थव्यवस्थाओं (most powerful economies in the world) से मिलकर बने समूह में भारत, चीन और ऑस्ट्रेलिया जैसे ताकतवर देश शामिल नहीं. न ही कोई अफ्रीकी देश इसका हिस्सा है. इसे लेकर जी-7 (G7) लगातार घिरा रहता है.

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    जी-7 शिखर सम्मेलन (G7 summit) की शुरुआत हो चुकी है. इसका बड़ा मकसद कोरोना वायरस से निपटने का है. लेकिन साथ ही पर्यावरण से लेकर कई दूसरे मुद्दों पर चर्चा हो रही है. लगभग सारी दुनिया का ध्यान इस सम्मेलन पर है. ऐसे में सवाल आता है कि आखिर ये जी-7 क्या है और क्या भारत भी इसका हिस्सा है? दरअसल ये वह संगठन है, जिसमें दुनिया के 7 विकसित देश सदस्य है. इन्हें ही जी-7 यानी ग्रुप ऑफ सेवन कहा जाने लगा.

    कौन से देश हैं शामिल 
    सात सबसे मजबूत अर्थव्यवस्थाओं से मिलकर बने इस समूह में अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, कनाडा, जापान, इटली और जर्मनी शामिल हैं. मानवाधिकारों की रक्षा, कानून बनाए रखना और लगातार विकास इसका लक्ष्य हैं. 25 मार्च 1973 को इस संगठन की शुरुआत हुई थी. असल में इससे ठीक पहले ग्लोबल तेल संकट पैदा हुआ, जिससे आर्थिक संकट भी पैदा हुआ. इसे और इसके साथ भविष्य में आने वाली चुनौतियों से वैश्विक स्तर पर निपटने के लिए संगठन की नींव रखी गई.

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    क्यों हटाया गया रूस 
    शुरुआत में रूस भी इस संगठन का हिस्सा था लेकिन फिर देशों में उसे लेकर मतभेद हो गया. रूस ने साल 2014 में यूक्रेन के काला सागर प्रायद्वीप क्रीमिया पर कब्जा कर लिया. इसके बाद तुरंत ही रूस को समूह से निकाल दिया गया. यहां बता दें कि रूस के साथ रहने पर इस समूह में 8 सदस्य देश थे और इसे जी-8 कहा जाता था.

    G7 summit
    साल 2014 से पहले रूस भी इस समूह का हिस्सा था लेकिन फिर इसे निकाल दिया गया- सांकेतिक फोटो


    मजबूत इकनॉमी के बाद भी चीन क्यों नहीं सदस्य 
    यहां एक सवाल ये भी आता है कि अगर ये संगठन आर्थिक तौर पर मजबूत देशों का है तो चीन का इसमें नाम क्यों नहीं, जबकि वो देश दुनिया की दूसरी बड़ी अर्थव्यवस्था कहला रहा है. इसका जवाब ये है कि चीन में अब भी जीडीपी के हिसाब से प्रति-व्यक्ति आय काफी कम है क्योंकि उनकी आबादी ज्यादा है. यही कारण है कि चीन को इसका हिस्सा नहीं बनाया जा रहा.

    भारत को संगठन में शामिल करने की बात हो रही 
    भारत भी जी-7 में शामिल नहीं हो सका लेकिन अब उसकी ग्लोबल पहचान बढ़ी है, और विदेशों से संबंध भी बेहतर हुए. यही कारण है कि भारत को इस साल गेस्ट नेशन के तौर पर सम्मेलन में बुलाया गया. इसके अलावा भारत के अलावा ऑस्‍ट्रेलिया, कोरिया और दक्षिण अफ्रीका को भी गेस्ट देशों की तरह आमंत्रित किया गया है.

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    सबसे पहली बार भारत ने साल 2019 में गेस्ट के तौर पर इसमें हिस्सा लिया था. तब फ्रांस में ये सम्मेलन हुआ था और वहां से देश को बुलावा आया था. बीते साल अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भारत को भी इस संगठन से जोड़ने की अपील की थी. उनका कहना था कि भारत एक ताकतवर और प्रभावशाली देश के तौर पर एशिया में उभरा. ऐसे में उसे इसका सदस्य होना ही चाहिए.

    G7 summit
    ट्रंप ने साल 2019 में भारत और ऑस्ट्रेलिया को भी इस संगठन में शामिल करने की बात की थी (Photo- news18 English via AP)


    क्या काम करता है ये संगठन 
    हर साल जी-7 की बैठक होती है, जिसकी अध्यक्षता बारी-बारी से सदस्य देश करते हैं. सम्मेलन दो दिनों तक चलता है, जिस दौरान ग्लोबल मुद्दों पर चर्चा होती है और रणनीति तय की जाती है. मुद्दों में इकनॉमी, देशों की सुरक्षा, बीमारियों और पर्यावरण पर चर्चा होती आई है. इस साल कोरोना से मचे हाहाकार के बीच देशों में वैक्सिनेशन तेज करने और संक्रमण खत्म करने पर बात होगी.

    कई बार घिरा आलोचनाओं से
    बीच-बीच में जी-7 की जरूरत और असर पर बात होती रहती है. कई बार ये कहा जा चुका कि ये संगठन खास महत्व का नहीं और इसे खत्म कर दिया जाना चाहिए. वहीं खुद ये संगठन अपने होने की ठोस वजहें गिनाता है. उसका दावा है कि उसी के कारण पेरिस जलवायु समझौता लागू हो सका. बता दें कि ये पर्यावरण की रक्षा के लिए हुआ समझौता है, जिसमें देशों को कार्बन उत्सर्जन कम करने को कहा गया है. इसके अलावा जी-7 का ये भी मानना है कि उसने एड्स और टीबी जैसी बीमारियों को खत्म करने के लिए ग्लोबल फंडिंग शुरू की, जिससे काफी मदद मिली.

    जी-7 की आलोचनाओं में एक बात ये भी है कि कथित तौर पर ग्लोबल समस्याओं पर बात करने का दावा करने वाले इस संगठन में अफ्रीका और लैटिन अमेरिका का कोई देश शामिल नहीं.

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