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भगत सिंह 19 साल के इस क्रांतिकारी को मानते थे अपना गुरु, ताउम्र साथ रखी उनकी तस्‍वीर

महान क्रांतिकारी करतार सिंह सराभा को 19 साल की उम्र में ब्रिटिश हुकूमत ने फांसी दे दी थी.

महान क्रांतिकारी करतार सिंह सराभा को 19 साल की उम्र में ब्रिटिश हुकूमत ने फांसी दे दी थी.

Today's History: पंजाब में लुधियाना के सराभा गांव में 24 मई, 1896 को जन्‍मे करतार सिंह सराभा को गुलामी का अहसास अमेरिका पहुंचकर हुआ. इसके बाद क्रांतिकारियों के दल में शामिल हो गए. महज 19 साल की उम्र में उन्‍हें फांसी दे दी गई थी. उनकी आखिरी ख्‍वाहिश थी कि मैं तब तक जन्‍म लेता रहूं, जब तक भारत आजाद नहीं हो जाता है.

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    ब्रिटिश हुकूमत (British Raj) की गुलामी से देश को आजाद कराने की जिद एक 19 साल के क्रांतिकारी में इस कदर थी कि उसने अपने केस की आखिरी सुनवाई के दौरान कोर्ट में पूछा, 'मुझे क्या सजा होगी? उम्रकैद या फांसी? मैं चाहता हूं कि मुझे फांसी मिले और मैं एक बार फिर जन्म लूं. जब तक भारत स्वतंत्र नहीं होता, तब तक मैं बार-बार जन्म लेता रहूंगा. ये मेरी आखिरी ख्वाहिश है.' कोर्ट में ऐसी इच्‍छा जाहिर करने वाले क्रांतिकारी करतार सिंह सराभा (Kartar Singh Sarabha) को सरदार भगत सिंह अपना गुरु मानते थे. भगत सिंह (Bhagat Singh) उन्‍हें इतना मानते थे कि पूरी जिंदगी उनकी तस्‍वीर अपने पास रखी. करतार सिंह को 16 नवंबर 1915 को लाहौर (Lahore) सेंट्रल जेल में फांसी दे दी गई. लेकिन, उनकी शहादत ने देश में भगत सिंह जैसे क्रांतिकारियों की पौध तैयार कर दी थी.

    अमेरिका पहुंचने पर हुआ भारत की गुलामी का अहसास
    करतार सिंह का जन्म पंजाब के लुधियाना जिले के सराभा गांव में 24 मई, 1896 को हुआ था. उनके पिता का निधन बचपन में ही हो गया था. इसके बाद उनकी देखरेख उनके दादा बदन सिंह ने की. करतार सिंह की शुरुआती शिक्षा लुधियाना में हुई. बाद में उन्‍हें चाचा के पास उड़ीसा भेज दिया गया. वहीं से उन्‍होंने हाईस्कूल की परीक्षा पास की. इसके बाद 1912 में उन्हें अमेरिका भेजा गया. उनका परिवार काफी संपन्‍न था, इसलिए भारत में रहते हुए कभी भी उन्‍हें गुलामी का अहसास नहीं हुआ था. लेकिन अमेरिका की धरती पर कदम रखते ही उन्‍हें भारत और भारतीयों के गुलाम होने का अहसास होने लगा. दरअसल, जब करतार सिंह जहाज से अमेरिका में उतरे तो उन्हें अधिकारियों ने रोक कर पूछताछ की. उनके सामान की तलाशी भी ली गई. जब उन्होंने इसकी वजह पूछी तो जबाव मिला कि तुम भारत से आए हो जो गुलाम देश है.'

    अमेरिका पहुंचने के बाद वह लाला हरदयाल से मिले और भारतीयों को देश की आजादी के लिए काम करने को प्रोत्‍साहित करने लगे.


    लाला हरदयाल के साथ रहकर करने लगे हर काम में मदद
    अमेरिका में पढ़ने आए करतार सिंह की सोच को इस घटना ने पूरी तरह से बदलकर रख दिया. वह बर्कले यूनिवर्सिटी में एडमिशन लेने के बाद भारतीय साथियों से आजादी और अमेरिका में रहकर देश के लिए कुछ करने की बातें करने लगे. उस वक्त यूनिवर्सिटी में नालंदा क्लब ऑफ इंडियन स्टूडेंट्स था, जिससे करतार सिंह जुड़ गए. करतार का संपर्क लाला हरदयाल से हुआ, जो अमेरिका में रहते हुए भारत की स्वतंत्रता के लिए कोशिश कर रहे थे. करतार हमेशा उनके साथ रहकर उनके हर काम में मदद करने लगे. उस समय अमेरिका में पढ़ने या काम करने आए भाारतीय युवा संगठित हो रहे थे. लाला हरदयाल ने भारतीय विद्यार्थियों के मन में ब्रिटिश सरकार के खिलाफ विद्रोह पैदा करने में बड़ी भूमिका निभाई.

    पहले विश्‍व युद्ध के दौरान देश में एकसाथ क्रांति की योजना
    साल 1913 में गदर पार्टी की स्थापना की गई, जिसका उद्देश्य 1857 की तरह एक और क्रांति कर देश को आजाद करना था. इसके बाद 'गदर' नाम से ही एक अखबार भी शुरू किया गया, जिसके मास्टहैड पर 'अंग्रेजी राज के दुश्मन' लिखा था. इसे कई भाषाओं में शुरू किया गया था. गुरुमुखी एडिशन की जिम्मेदारी करतार सिंह पर आई. साल 1914 में जब प्रथम विश्व युद्ध शुरू हुआ, तो अंग्रेज युद्ध में बुरी तरह फंस गए थे. ऐसी स्थिति में गदर पार्टी के कार्यकर्ताओं ने सोचा और योजना बनाई कि अगर इस समय भारत में विद्रोह हो जाए तो आजादी मिल सकती है. करतार और अन्य क्रांतिकारियों के प्रभाव में लगभग 4,000 लोग भारत के लिए निकल पड़े, लेकिन किसी ने इसकी सूचना ब्रिटिश सरकार को दे दी. सभी क्रांतिकारियों को भारत पहुंचने से पहले ही बंदी बना लिया गया.

    करतार सिंह सराभा ने छावनियों में जा-जाकर भारतीय सैनिकों को 1857 जैसी क्रांति के लिए तैयार किया.


    फौजियों को 1857 की तरह की क्रांति के लिए किया प्रभावित
    करतार सिंह अपने कुछ साथियों के साथ बच निकले और पंजाब पहुंच गए. उन्होंने लोगों को जागरूक करना शुरू कर दिया. उन्होंने सुरेंद्रनाथ बनर्जी, रासबिहारी बोस, शचीन्द्रनाथ सान्याल जैसे क्रांतिकारियों से मुलाकात की. उनके प्रयासों से जालंधर में क्रांतिकारियों की एक गोष्ठी हुई, जिसके बाद रासबिहारी बोस पंजाब पहुंचे और उन्होंने अपना एक दल बनाया. इस क्रांतिकारी दल ने भारतीय फौजियों को अंग्रेजी सरकार के खिलाफ क्रांति छेड़ने के लिए प्रभावित किया. योजना के अनुसार 21 फ़रवरी, 1915 का दिन पूरे भारत में एकसाथ क्रांति के लिए तय किया गया था, लेकिन पर ब्रिटिश सरकार को पहले ही इसका पता चल गया. इसके बाद देशभर में क्रांतिकारियों की गिरफ्तारियां होने लगीं. बंगाल और पंजाब में गिरफ्तारियों का तांता लग गया. रासबिहारी बोस लाहौर से वाराणसी होते हुए कलकत्ता (अब कोलकाता) चले गये और वहां से जापान चले गए.

    'लाहौर षड्यंत्र' के नाम से करतार सिंह पर चलाया गया केस
    रासबिहारी बोस ने करतार सिंह को भी अफगानिस्तान जाने की सलाह दी, लेकिन वह कहीं नहीं गए. उन्होंने आजादी के लिए क्रांति का अभियान जारी रखा. वह जगह-जगह फौजी छावनियों में जाकर सैनिकों को जागरूक करने लगे. लायलपुर की चक नंबर 5 में उन्होंने विद्रोह कराने की कोशिश की और गिरफ्तार हो गए. करतार सिंह सराभा पर हत्या, डाका, शासन को उलटने का आरोप लगाकर 'लाहौर षड्यंत्र' के नाम से मुकदमा चलाया गया. उनके साथ 63 दूसरे क्रांतिकारियों पर भी मुकदमा चलाया गया था. उन्हें फांसी की सजा सुनाते वक़्त ब्रिटिश जज ने कहा कि इतनी सी उम्र में ही यह लड़का ब्रिटिश साम्राज्य के लिए बड़ा खतरा है. 26 अप्रैल 1915 से शुरू होकर 13 सितंबर 1915 तक चलने वाले केस में सरकार ने 404 गवाह पेश किए. 16 नवंबर 1915 को महान क्रांतिकारी करतार सिंह सराभा, विष्णु गणेश पिंगले, हरनाम सिंह, जगत सिंह, बख्शीश सिंह, सुरैण सिंह को फांसी दे दी गई.

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